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सियासत का ‘पटाखा’ और बारूद की ‘बिरादरी’: जब माननीय ने धमाके को संगीत समझ लिया!

न्यूज पॉवर जोन। अंबिकापुर की आबोहवा में इन दिनों बारूद की गंध से ज्यादा राजनीति की ‘जुगलबंदी‘ चर्चा में है। अमिताभ बच्चन ने कभी परदे पर पूछा था— “मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है?” आज सरगुजा की जनता यही सवाल एक रसूखदार कुर्सी से पूछ रही है। सवाल वाजिब है कि जब शहर के किसी कोने में बड़ी वारदात होती है, तो ‘माननीय’ के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं, लेकिन एक पटाखा दुकान में चिंगारी क्या उठी, मंत्रीजी की संवेदनशीलता ‘रॉकेट’ की रफ्तार से जाग गई!

बिरादरी का ‘मोह’ और दो किलोमीटर का ‘मौन’

कहते हैं कि सियासत में ‘अपनों’ का साथ देना धर्म है, लेकिन जब यह धर्म कानून के आड़े आने लगे, तो उसे ‘अधर्म’ कहते हैं। दो किलोमीटर तक जिस धमाके ने शहर की नींद उड़ा दी, मंत्रीजी के लिए वह महज एक ‘मामूली शोर’ था। शायद सत्ता के गलियारों में रहने वाले कान इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें बारूद की गूंज भी किसी मधुर शहनाई जैसी लगने लगती है।

सत्ता का चश्मा: सरगुजा की बड़ी घटनाओं की फेहरिस्त धूल फांक रही है, वहाँ मंत्रीजी के कदम कभी नहीं पड़े। मगर यहाँ ‘बिरादरी’ का मामला क्या आया, साहब खुद ‘फायर ब्रिगेड’ बनकर पहुँच गए—आग बुझाने नहीं, बल्कि पुलिस की जाँच पर पानी डालने!

खाकी की मजबूरी और नोटिस की ‘दिवाली’

बेचारी पुलिस! कानून के दायरे में रहकर धाराएँ (Explosive Act) जोड़ रही थी, FSL की रिपोर्ट का इंतजार कर रही थी ताकि शहर की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को सबक मिल सके। लेकिन पुलिस की कलम अभी कागज पर चली ही थी कि ऊपर से ‘नसीहत’ का नोटिस टपक पड़ा।

जब जाँच की दिशा और दशा कुर्सी पर बैठे लोग तय करने लगें, तो निष्पक्षता ‘फुस्स पटाखा’ होकर रह जाती है। आईजी साहब ने एसपी से स्पष्टीकरण मांगा है, थाना प्रभारी की ‘जवाबदेही’ तय हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जवाबदेही सिर्फ उनकी है जो वर्दी पहने हैं? उनकी कोई जवाबदेही नहीं, जो शपथ लेकर कानून को अपनी सुविधा से परिभाषित कर रहे हैं?

सिस्टम का ‘धमाका’

किसी बड़ी अनहोनी के लिए पुलिस का चौकन्ना होना अच्छी बात है, लेकिन जाँच मुकम्मल होने से पहले ही ‘सर्टिफिकेट’ बाँट देना कि”यह मामूली घटना है

लब्बोलुआब अंबिकापुर में इस बार पटाखे दुकान में नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर फूटे हैं। और याद रखिएगा, बारूद जब राजनीति की ओट में पलता है, तो वह किसी नियम-कायदे को नहीं मानता। जब जनप्रतिनिधि ही ‘इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर’ बन जाएं, तो समझ लीजिए कि इंसाफ अब केवल ‘किस्मत’ के भरोसे है। जनमानस तंज कसते हुए कहने लगे है साहब, अगली बार जब धमाका हो, तो जनता को बता दीजिएगा कि यह ‘विस्फोट’ है या ‘मनोरंजन’, ताकि लोग डरने के बजाय तालियां बजा सकें!

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