नई दिल्ली

Sabarimala Case : सबरीमला सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बात…! धर्म और आस्था पर दिया ऐतिहासिक बयान…कहा- यह सिर्फ पूजा नहीं, जीवनशैली है

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

नई दिल्ली, 13 मई। Sabarimala Case : सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू धर्म की प्रकृति और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पाठ, मंदिर जाने या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या विशेष कर्मकांड करना अनिवार्य नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी या घर में दीपक जलाकर आस्था व्यक्त करता है, तो वही उसके धर्म और विश्वास को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।

सुनवाई में क्या कहा कोर्ट ने?

संविधान पीठ सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय की धार्मिक प्रथाओं और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रोफेसर जी मोहन गोपाल ने अदालत के समक्ष कहा कि पहले की न्यायिक व्याख्याओं में हिंदू धर्म को वेदों को सर्वोच्च मानने वाले धर्म के रूप में बताया गया था। इस पर न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा कि यही कारण है कि हिंदू धर्म को “जीवन जीने का तरीका” कहा जाता है। उन्होंने कहा कि मंदिर जाना या धार्मिक अनुष्ठान करना किसी व्यक्ति के हिंदू होने की अनिवार्य शर्त नहीं है। व्यक्ति बिना कर्मकांड के भी हिंदू रह सकता है।

झोपड़ी में दीपक जलाना ही काफी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “लोग अपनी झोपड़ी में दीपक जलाते हैं, बस इतना ही काफी है।” अदालत ने कहा कि आस्था को केवल बाहरी धार्मिक गतिविधियों से नहीं मापा जा सकता और हर व्यक्ति को अपनी तरह से धर्म का पालन करने का अधिकार है।

धार्मिक स्वतंत्रता पर भी अहम टिप्पणी

अदालत ने यह भी कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करने के लिए नहीं किया जा सकता। संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार दूसरों की समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता।

सबरीमला मामले से जुड़ा संदर्भ

गौरतलब है कि सबरीमला मंदिर प्रवेश फैसला 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटाते हुए उसे असंवैधानिक करार दिया था। उस फैसले के बाद धार्मिक परंपरा, महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर देशभर में बड़ी बहस छिड़ गई थी। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियों को धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आस्था के अधिकार के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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