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Korba: मोहरा का ‘जिंदाल’ और शहर का ‘विकास पुरुष’: अभिनय वही, बस मंच नया

कोरबा।Korba Vikas Purush  अगर आप अब भी इस मुगालते में हैं कि फिल्म ‘मोहरा’ का वह शातिर जिंदाल केवल रुपहले पर्दे तक सीमित था, तो एक बार अपने शहर की धूल भरी सड़कों पर निकल कर देखिए। आपको समझ आ जाएगा कि कालजयी पटकथाएं केवल सिनेमाघरों में नहीं, बल्कि नगर निगम की फाइलों और चौराहे के होर्डिंग्स पर भी लिखी जाती हैं। आज शहर का जागरूक नागरिक जब निगम की कार्यशैली को देखता है, तो उसे फिल्म के उस अंधे खलनायक की याद आती है, जो नेत्रहीन होने का ढोंग कर अपनों को ही शतरंज की बिसात पर मोहरा बना देता था।

मुखौटा ‘विकास’ का, दृष्टि ‘चयनित’

फिल्म में जिंदाल अपनी कथित लाचारी की आड़ में रोमा और विशाल को अपने इशारों पर नचाता था। यहाँ भी दृश्य कुछ अलग नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब ‘विकास’ का मुखौटा पहनकर जनता की आंखों में सुनहरे सपने झोंके जा रहे हैं। नगर निगम की दृष्टि अब ‘चयनित’ (Selective) हो चुकी है। चकाचौंध सिर्फ उन रास्तों पर है जहाँ से रसूखदारों के काफिले गुजरते हैं, मानो शहर की परिभाषा बस चंद किलोमीटर का वह ‘VIP कॉरिडोर’ ही रह गई हो।

बाकी का शहर? वह तो जैसे किसी फिल्म के ‘डिलीटेड सीन’ की तरह है उपेक्षित, गुमनाम और बदहाल। गलियों में टूटी सड़कें, उफनती नालियां और बदबूदार हकीकत चीख-चीख कर कह रही है कि असली शहर ‘फोटोशूट’ वाले गौरवपथों से कोसों दूर सिसक रहा है।

 

 

मरम्मत की जगह ‘मेकओवर’ का खेल

 

 

हैरानी और अफसोस की बात यह है कि जो सड़कें अभी पूरी तरह ठीक और आवाजाही के लायक हैं, उन्हें उखाड़कर फिर से ‘गौरवपथ’ बनाने की सनक सवार है। जनता ठगी सी खड़ी पूछ रही है: यह विकास है या टैक्स के पैसों का वह ‘कॉस्मेटिक मेकओवर’ जिसमें चेहरे पर पाउडर की परत तो मोटी है, लेकिन अंदर बीमारी और गहरी होती जा रही है?

“विकास का अर्थ केवल टाइल्स की चमक और डिवाइडर का रंग नहीं होता। असली विकास वह है जो आम आदमी के जूतों पर कीचड़ न लगने दे और जिसके प्रमाण के लिए किसी विज्ञापन की जरूरत न पड़े।”

 

 

फोटोशूट से आगे की हकीकत

 

 

शहर अब जाग चुका है। वह समझ रहा है कि असली प्रगति वह नहीं जो केवल ड्रोन कैमरों से अच्छी दिखे, बल्कि वह है जो मोहल्लों की तंग गलियों में सुलभ जीवन बनकर उतरे। जब तक सफाई और सुव्यवस्था केवल कैमरों के सामने की नुमाइश रहेगी, तब तक जनता प्रशासन में उस ‘जिंदाल’ को ढूंढती रहेगी, जो अंधे होने का स्वांग रचकर अपनी ही प्रजा के भविष्य के साथ खेल रहा है। किरदार बदल गए हैं, लेकिन पटकथा आज भी वही है!

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