बालकोनगर

BALCO : बालको की ‘उन्नति’ परियोजना से बदली गंगोत्री की ज़िंदगी…! मजदूरी से बन गईं ‘मशरूम दीदी’

200 बैग तक मशरूम उत्पादन

बालको, 05 मार्च। BALCO : भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की सामुदायिक विकास पहल ‘उन्नति’ परियोजना महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभा रही है। इसी पहल से जुड़ी एक प्रेरणादायक कहानी लालघाट की निवासी गंगोत्री विश्वकर्मा की है, जिन्होंने रोज़ की मजदूरी से निकलकर मशरूम उत्पादन के माध्यम से आत्मनिर्भरता की नई पहचान बनाई है।

बालको के प्रशिक्षण और सहयोग से गंगोत्री आज क्षेत्र में ‘मशरूम दीदी’ के नाम से जानी जाती हैं। वे न केवल अपने परिवार का सहारा बनी हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने की राह दिखा रही हैं।

2019 में ज़िंदगी में आया बड़ा बदलाव

गंगोत्री बताती हैं कि कुछ साल पहले तक उनका जीवन रोज़ की मजदूरी पर निर्भर था। कई बार काम न मिलने पर परिवार चलाना मुश्किल हो जाता था। वर्ष 2019 में उनकी ज़िंदगी में बड़ा बदलाव आया, जब वे जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह से जुड़ीं और बालको की ‘उन्नति’ परियोजना के तहत मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया।

प्रशिक्षण के बाद उन्होंने उसी वर्ष मशरूम की खेती शुरू की। शुरुआत में उन्होंने 16 बैग लगाए, लेकिन पहले प्रयास में सिर्फ 2 बैग में ही मशरूम उग पाए। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी गलतियों से सीखते हुए दोबारा प्रयास किया। धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ता गया और आज उनकी इकाई में करीब 200 बैग तक मशरूम उत्पादन हो रहा है।

मशरूम की खेती में लगभग 20 से 25 दिनों में उत्पादन शुरू हो जाता है और सप्ताह के अंतराल पर तीन बार फसल मिलती है। लगातार उत्पादन बनाए रखने के लिए गंगोत्री रोज़ाना लगभग दो नए बैग तैयार करती हैं। मशरूम उत्पादन की प्रक्रिया में पैरा-कुट्टी को भिगोकर हल्की नमी में सुखाया जाता है और पोषण के लिए बायो-स्टिमुलेंट पाउडर व रोग से बचाव के लिए फॉर्मूलिन पाउडर का उपयोग किया जाता है।

गंगोत्री अपनी पूरी उपज खुद बाजार में बेचती हैं। शुरुआत के कठिन समय में उन्हें बालको की सीएसआर टीम से काफी सहयोग मिला, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा। आज वे खुद बीज मंगवाती हैं और अपने समूह की अन्य महिलाओं को भी उपलब्ध कराती हैं। वर्तमान में वे जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह की सचिव के रूप में भी कार्य कर रही हैं।

हर महीने करीब 15 हजार रुपये का लाभ

कोविड काल उनके परिवार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा, क्योंकि उनके पति की आमदनी लगभग बंद हो गई थी। उस समय मशरूम की खेती ही उनके परिवार का सहारा बनी। इसी आमदनी से घर का खर्च चला और बचत कर उन्होंने एक ऑटो भी खरीदा, जिसे अब उनके पति चलाते हैं।

आज मशरूम उत्पादन से गंगोत्री को औसतन हर महीने करीब 15 हजार रुपये का लाभ हो रहा है। वे कहती हैं कि अब उन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता नहीं है। उनका सपना है कि आने वाले समय में 200 बैग से बढ़ाकर 5 हजार बैग तक मशरूम उत्पादन करें, ताकि उनके साथ-साथ अन्य महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें।

गंगोत्री की कहानी यह साबित करती है कि सही प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और मजबूत हौसलों के साथ एक साधारण महिला भी अपनी ज़िंदगी की दिशा बदल सकती है।

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