
पटाखा की दुकान में मंत्रीजी का क्या काम!
CM’s Dhoni Style controversy : फिल्म लावारिस में अमिताभ बच्चन की आवाज़ में एक गाना फिल्माया गया था…मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है। कुछ ऐसा ही हाल अंबिकापुर का है, जहां पब्लिक पूछ रही है पटाखा की दुकान में मंत्रीजी का क्या काम है! वैसे तो सरगुजा में बड़ी घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है, मगर वहां मंत्रीजी शायद ही कभी नज़र आए हों। इसी सवाल का जवाब अब पब्लिक में चर्चा का विषय बन गया है।
खैर… मंत्रीजी पटाखा की दुकान पर पहुंचे, अच्छी बात है। और अगर बात बिरादरी वाली हो तो उनका पहुंचना वाजिब भी है। मगर दो किलोमीटर तक पहुंची पटाखों की आवाज़ को मामूली बताकर वो क्या कहना चाहते थे, ये समझ से परे है। अब इन पटाखों की आंच पुलिस तक पहुंच रही है। पुलिस की जांच आगे बढ़ती, उससे पहले ही नोटिस पहुंच गया।
जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने दर्ज अपराध में गैर-जमानती और विस्फोटक अधिनियम की धाराएँ जोड़ दीं…इसमें गलत क्या है? पुलिस जांच के भी अपने तरीके होते हैं। FSL रिपोर्ट में पटाखों के अवशेष और उनकी डेसिबल जांच विवेचना के लिए अहम हैं।मगर जिस तरीके से मामले में मंत्रीजी की एंट्री हुई, उससे कुछ सवाल ज़रूर उठ खड़े हुए।
जो भी हो, आईजी साहब ने सरगुजा एसपी को पत्र लिखकर कोतवाली थाना प्रभारी से स्पष्टीकरण मांगा है। किसी बड़ी घटना के लिए पुलिस प्रशासन का संवेदनशील होना अच्छी बात है। जांच के बाद आगे की कार्रवाई भी होगी। मगर जांच से पहले मंत्री जैसे पद पर बैठे जनप्रतिनिधि अगर यह कहने लगें कि यह मामूली घटना है, तो पुलिस के लिए जांच करना मुश्किल हो जाएगा जैसा कि इस मामले में हुआ।
पुलिस की जांच… डिस्को पैड या डील के लिए ढील?
पुलिस की जांच भी गजब की होती है, शुरुआत में इतनी तेज़ कि लगता है इस बार तो सचमुच “कोयले से हीरा” निकालकर रहेगी लेकिन कुछ समय में सबकुछ हाथों से रेत की तरह निकलता नजर आता है।
फिल्म “हम दिल दे चुके सनम” का एक लोकप्रिय गाना “ढील दे रे भैया” को काले हीरे को तराशने वाले सफेदपोश कारोबारी गुनगुनाने लगे है। एशिया की शान कहे जाने वाले एसईसीएल खदानो में कोयला चोरी के खुलासे के बाद पुलिस जांच के नाम पर ढील दी है जिससे सफेदपोश कारोबारी दबाव और प्रभाव बना डील कर सके। कोयला तस्करो के स्लीपर सेल के रूप काम करने वाले डिस्को पैड की गिरफ्तारी के बाद पुलिस कोल की किंग तलाश कर रही है। कोयला माफिया को पकड़ने मे रही देरी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मूल प्रश्न तो यही है कि अगर ये स्लीपर सेल है, तो असली “रिमोट कंट्रोल” किसके हाथ में है? और वो कब ऑन होगा? असल में पुलिस की जांच को लेकर महकमे के मंझे खिलाड़ी गुप्त सवाल दागने शुरू कर दिए है कि जांच की आंच सच में कोयला चोरी के असली सरगनाओं तक पहुंचेगी, या फिर मामला वहीं तक सीमित रहेगा, जहां तक “सुविधाजनक कार्रवाई” संभव है। क्योंकि इस खेल में जिन बड़े कोल माफियाओं के नाम दबे स्वर में लिए जा रहे हैं, वे फिलहाल जांच की आंच से काफी दूर नजर आ रहे हैं।
सूत्र तो यहां तक कह रहे हैं कि पर्दे के पीछे “सेटिंग और डील” का दौर जारी है। शायद यही वजह है कि छोटे मोहरे सलाखों के पीछे हैं, लेकिन असली खिलाड़ी अब भी सिस्टम की आंखों में धूल झोंकते घूम रहे हैं।
जनता भी अब तंज कसने लगी है “दीपका में कोयला चोरी पकड़ना मुश्किल नहीं, असली मुश्किल है चोरी के पीछे खड़े सफेदपोश चेहरों तक पहुंचना।”
अब देखना यह है कि यह जांच सच में किसी “किंग” तक पहुंचती है या फिर हमेशा की तरह फाइलें भी कोयले की तरह धीरे-धीरे धूल में बदल जाएंगी और कहीं पीछे से फिर वही आवाज़ आएगी,,“ढील दे रे भैया… ताकि डील हो जाए।”
“मोहरा” के जिंदल से लेकर शहर के ‘विकास पुरुष’ तक… खेल वही, किरदार नए!
अगर आपको लगता है कि मोहरा का जिंदल सिर्फ फिल्मी दुनिया का किरदार था, तो शहर की सड़कों पर एक चक्कर लगा लीजिए, आपको समझ आ जाएगा कि असली पटकथा तो यहां लिखी जा रही है। शहर के जागरूक नागरिक अब नगर निगम की कार्यशैली को सीधे “मोहरा” के जिंदल से जोड़कर देखने लगे हैं।
फिल्म में जिंदल नेत्रहीन होने का मुखौटा लगाकर रोमा और विशाल को अपने इशारों पर नचाता था। यहां भी कुछ वैसा ही खेल चलता दिख रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब “विकास” का मुखौटा पहनकर जनता को सपने दिखाए जा रहे हैं और अंदरखाने “कल्याण” के नाम पर अलग ही पटकथा लिखी जा रही है।
नगर निगम का विकास अब “चयनित दृष्टि” पर चलता है, जहां से बड़े लोगों की गाड़ियां गुजरती हैं, वहीं सड़कें चमकती हैं। बाकी शहर? वो तो जैसे किसी ‘डिलीटेड सीन’ का हिस्सा हो, टूटी सड़कें, उफनती नालियां और बदबूदार हकीकत.. वास्तव में शहर की असली तस्वीर मोहल्लों में दिखती है।
हैरानी की बात यह है कि जो सड़कें अभी ठीक-ठाक और स्मूथ हैं, उन्हें भी खोदकर “गौरवपथ” बनाने की होड़ मची है। जनता पूछ रही है कि यह विकास है या फिर टैक्स के पैसों का ऐसा मेकओवर, जिसमें चेहरे पर पाउडर ज्यादा और बीमारी अंदर ज्यादा है।
शहर अब समझने लगा है कि विकास का मतलब सिर्फ चमकती टाइल्स और रंगीन डिवाइडर नहीं होता। असली विकास वहां दिखता है जहां आम आदमी बिना गड्ढे में उतरे घर पहुंच जाए, नाली सड़क पर न बहे और सफाई फोटोशूट से बाहर भी नजर आए।
आग, राख और उस्ताद..काले है तो क्या हुआ दिलवाले…
“जली को आग और बुझी को राख कहते हैं… और जो इसी राख से ग्रामीणों की जिंदगी से खेल जाए, उसे “तेलगा” उस्ताद कहते हैं…”यह किसी फिल्म का डायलॉग नहीं, बल्कि इन दिनों सीएसईबी के राखड़ डेम से जुड़े कारोबार पर लोगों की जुबान चढ़ी चर्चा है।
मामला सीएसईबी के झाबू और डिंडोलभांठा राखड़ डेम का है, जहां राख निकालने के नाम पर ऐसा खेल चल रहा है कि लो-प्रोफाइल दिखने वाला एक ठेकेदार देखते ही देखते करोड़ों का खिलाड़ी बन बैठा। कागजों में चल रही राख ट्रांसपोर्टिंग ने किस्मत ऐसी चमकाई कि राख अब उनके लिए “सोने की खान” बन गई है। चर्चा है कि संबंधित ठेकेदार अफसरों से रिश्ते मजबूत रखने के लिए हर दांव खेलने में माहिर है। दफ्तरों में उसकी मौजूदगी और अफसरों से बढ़ती नजदीकियों को लेकर तरह-तरह की बातें तैर रही हैं। लोग तंज कसते हुए फिल्मी अंदाज में कहते फिर रहे हैं…“हम काले हैं तो क्या हुआ, दिलवाले हैं…” सूत्रधार कि माने तो इधर गांवों में हल्की बारिश से कीचड़ फैल रहा है, उधर राख के इस खेल में क्या ठेकेदार, क्या अफसर सभी “धन वर्षा” के मानसून में मस्त भीगे हुए हैं। ग्रामीण बदहाली में फंसे हैं, कागजों में ट्रांसपोर्टिंग और जमीन पर अलग खेल होने के आरोपों ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। फर्जी बिलिंग और ट्रांसपोर्टिंग की खबरें जब गुगल इंजन में सर्च करने लगीं तो ठेकेदार की बेचैनी भी बढ़ गई है। अब मैनेज सिस्टम को फॉलो करते हुए जांच टीम को“मानसून ऑफर” देकर शांत रखने की कोशिशें चर्चा में हैं, ताकि फर्जीवाड़े पर तिरपाल डालकर मामला फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। अब उर्जाधानी में लोग तंज कस रहे हैं…“यहां राख कम उड़ रही है, सेटिंग का धुआं ज्यादा उठ रहा है।”
सीएम का धोनी स्टाइल
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का सुशासन तिहार चल रहा है। सुशासन बना रहे, इसके लिए पंचायतों में समाधान पेटियां रखवा दी गई हैं। अफसरों को ताकीद दी जा चुकी है और सीएम भी फुल फॉर्म में हैं। जब जशपुर के चंदागढ़ के स्कूल मैदान में क्रिकेट खेलते हुए सीएम धोनी वाले स्टाइल में बल्लेबाजी करते दिखे, तो… यह ब्यूरोक्रेसी के लिए सीधा संदेश है। अब सरकार 2028 के टी-20 मैच की तैयारी कर चुकी है।
ब्यूरोक्रेसी में इस बात की चर्चा है कि अभी तो यह सद्भावना वाली बल्लेबाजी है… अफसर भी अपना फॉर्म सुधार लें, नहीं तो टी-20 वाले स्टाइल में सांय-सांय बल्लेबाजी हो सकती है। मामला एकदम क्लियर है। सरकार और अफसरों को दोनों छोर से फील्डिंग संभालनी होगी… एक छोर से सुशासन और दूसरे छोर से समाधान… बीच के लिए कोई जगह नहीं होगी।
वैसे भी लंबे समय से अफसरशाही में तबादले नहीं हुए हैं। मंत्रालय में कई सचिवों और जिलों में कलेक्टर, एसपी सालों से एक ही जगह जमे हुए हैं। अब सरकार विधानसभा सत्र से फुर्सत पा चुकी है, तो एक तबादला ट्रेन तैयार है। वैसे जून का महीना ट्रांसफर सीजन होता है और सुशासन तिहार में पूरा फीडबैक तैयार हो जाएगा। ऐसे में जो अफसर फील्डिंग में कमजोर होंगे, वो मैदान छोड़ने के लिए तैयार रहे।



