
मामा-भांजे की खबर छत्तीसी
mama-bhanja-dispute : विक्रम और बेताल की कहानियां (बैताल पच्चीसी) तो आपने सुनी होगी। जिसमें न्यायप्रिय राजा विक्रम एक तांत्रिक के लिए बेताल को पीपल के पेड़ से उतारकर लाते हैं। रास्ते में बेताल एक पहेलीनुमा कहानी सुनाता है, और शर्त रखता है कि उत्तर जानने के बावजूद न बोलने पर उनका सिर फट जाएगा, और बोलने पर वह वापस पेड़ पर उड़ जाएगा।
कुछ ऐसी ही कहानी (खबर छत्तीसी) खबरीलाल ने सुनाई है। फर्क इतना है कि किरदार बदल गए हैं। कहानी कुछ अंदाज में है… एक राज्य के मुख्यमंत्री के साले साहब हैं और उनकी अपने भांजे के साथ जमीन के सौदों के लिए बकझक हुई। मामा-भांजे के बीच विवाद इतना बढ़ा कि मुख्यमंत्री जी ने बेटे और साले दोनों को साथ बुला भेजा.. दोनों की मीटिंग कराई, दोनों को मिल बांटकर माल उड़ाने की सलाह दी। लेकिन मुख्यमंत्री जी की सलाह का ना तो बेटे पर असर हुआ है और ना ही साले पर.. भांजा अपने मामा को खोज रहा है जो मोटा माल लेकर भूमिगत हो गया है।
कहानी के अंत में बेताल पूछता है… हे राजन आपने दोनों को साथ साथ क्यों बुलाया! अब शर्त के अनुसार अगर राजा बेताल की बात का जवाब देता है तो बेताल उड़कर पीपल के पेड़ पर उल्टा लटक जाएगा। और अगर जवाब नहीं दिया तो मामा-भांजे का क्या होगा। कैसी लगी ये कहानी अब आप ही बताएं वह मुख्यमंत्री है कौन…राजा ने बेटा और साला में सुलह करा के क्या सही न्याय किया और बेताल अब क्या करेगा…।
कुसमुंडा की पहरेदारी और पड़ोसी जिले की थानेदारी…
सुपर स्टार राजकुमार के तिरंगा का डायलॉग “हम आंखों से सुरमा नहीं चुराते.. हम आंखें ही चुरा लेते हैं” को सबरीधाम के थानेदार ने सच कर दिखाया । घटनाक्रम के बाद कोरबा के कुछ ओवर स्मार्ट टाइप थानेदार कुसमुंडा थाने की पहरेदारी पर मुस्कराते हुए कह रहे है जो न कर सके जिले के पहरेदार वो कर गया पड़ोसी जिले का थानेदार…! यूं कहें कि पड़ोसी जिले के थानेदार यहां आकर सुना गए..हम आंखों से सुरमा नहीं चुराते.. हम आंखें ही चुरा लेते हैं ..!
बात कुछ यूं है जिले के कोयलांचल में बैठे थानेदार सिर्फ अपने विजन के लिए काम कर रहे है, तभी तो पड़ोस जिले के एक थानेदार ने ऐसा जादू की छड़ी घुमाई कि कुसमुंडा जैसे पारखी नजर वाले थानेदार के थाना क्षेत्र से भारी भरकम वसूली कर गए। सूत्रधार की माने तो मामला स्वर्ण आभूषण की चोरी से जुड़ा है। सबरीधाम के थानेदार ठहरे चतुर सुजान..! सो उन्होंने ऐसी चकरी घुमाई कि रिपोर्ट लिखाने वाले से लेकर चोरी करने वाले और चोरी का माल खरीदने वाले कुसमुंडा के खरीददार तक से जबरना वसूला गया। कहा तो यह भी जा रहा कि चोरी 25 हजार कीमती स्वर्णाभूषण की हुई और वसूली सात गुना यानी 1.75 लाख की हो गई। थानेदारी करने वाले लाला के लेबल को गुनकर महकमे के लोग कहने लगे है कुसमुंडा की पहरेदारी और पड़ोसी जिले की थानेदारी..! वाकई तारीफे काबिल है।
साहब गुनगुना रहे , हमें तो अपनो ने लुटा ,गैरो में..
फिल्म दिलवाले का फेमस संवाद ” हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था, मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था।” को सीएसईबी के रिटायर्ड साहब कश मारते हुए करीबियों को बता रहे हैं लेकिन फर्क बस इतना है कि फिल्म में दर्द असली था, और यहां दर्द में भी कमीशन की खुशबू है।
बात फ्लाई ऐश परिवहन से रकम बनाने वाले ठेकेदार और एक अधिकारी की है। जो सिक्के की खनक के आगे अपना सिद्धांत बेचकर ठेकेदार से फिफ्टी फिफ्टी का समझौता किया था। राख डैम से निकलता गया और बिल की रकम दुगुनी होकर इंजीनियरिंग वाले शंकरजी के पास जमा होता गया। सब कुछ ठीक चल ही रहा था कि साहब अपना हिस्सा ठेकेदार से मांग बैठे..! सिद्धांत? वो तो सिक्कों की खनक में पहले ही विसर्जित हो चुका था।
सो हिस्से की बात इंजीनियरिंग वाले ट्रांसपोर्ट को रास नही आया और उल्टा सीधा किस्सा सुनाकर साहब को धमकाने लगे। कमीशन का रिश्ता अब कुश्ती में बदल गया। सूत्रधार की माने दो नंबर की कमाई के लिए ऑफिस में हाथा पाई तक हुई थी। साहब जब रिटायर्ड के अंतिम दौर में ठेकेदार ने लगभग 2 खोखा हजम कर डकार भी नही मारा …साहब करे भी क्या कमीशन और एड्रजेस्टमेंट का पैसा जो था। जहर का घूंट पी कर रिटायर्ड होकर चले तो गए लेकिन कोई राख से रकम खड़ा करने का पुराने जख्म को कुरेदता है तो साहब कश लगाते हुए अजय देवगन का डायलॉग हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था, मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था।” को बोलकर चुप हो जाते है। असलियत ये भी है कि कश्ती वहां नहीं डूबी जहां पानी कम था…कश्ती तो वहीं डूबी, जहां लालच ज्यादा था।
17 और 18 की चर्चा, सफाई का खर्चा
शहर की राजनीति दो कद्दावर नेता के इर्द गिर्द घूमती है। आरोप प्रत्यारोप तो लगते ही रहते है । इन सब चर्चाओं के बीच विकास और कल्याण को परखने वाले जागरूक नागरिक 17 और 18 पेटी की चर्चा कर रहे है और राजेश खन्ना के गीत ये पब्लिक है जो सब जानती है को गुनगुना रहे है।
दरअसल सरकारी दफ्तरो का अपना अलग सिस्टम है जो सरकारी काम करते है उन्हें सिस्टम फॉलो करना पड़ता है। सिस्टम में कहीं 10 परसेंट कही 20 परसेंट और कहीं जबराना वसूली का रिवाज है। पिछले दिनो निगम के सफाई कार्य के लिए हुए अनुबंध की खबर अंदरखाने से छनकर आई तो उत्सुकतावश एग्रीमेंट के लिए चढ़ावा की भी चर्चा होने लगी।
सूत्रधार की माने तो शहर को साफ रखने से पहले “सिस्टम” को साफ करना पड़ा और इसके लिए कांट्रेक्टरों ने 17 और 18 पेटी का “स्वच्छ योगदान” दिया। किसके हिस्से में 17 पेटी आया और किसे 18 पेटी नजराना पेश किया गया इसकी खोज खुफिया विभाग के दरोगा जी खोज रहे है। उधर निगम का “कमीशन कलेक्शन मंडल” यानी त्रिदेव तनाव में जरूर हैं, लेकिन गिलास हाथ में है और फिलॉसफी भी कमाल की है, “जेब में मनी हो, तो शनि भी कुछ नहीं बिगाड़ते!”
इधर आ… इधर-उधर मत जा
आप में से कई लोगों की बचपन की याद ताज़ा हो गई होगी। जब हम कक्षा पहली में थे और हिंदी की क्लास लगती थी, तब सभी बच्चे पाठ को ज़ोर-ज़ोर से दोहराते थे “अमर घर चल… चल घर अमर…”याद है ना? समय के साथ वही बच्चे आज नेतागिरी में नाम रोशन कर रहे हैं। बस पाठ एक की मीनिंग बदल गई है“अमर घर चल… चल घर अमर…”आगे की लाइन “राघव चड्ढा इधर आ… पाठक, स्वाति तू भी आ… इधर-उधर मत जा…” बीजेपी की पॉलिटिकल साइंस की क्लास में आज यही पाठ पढ़ाया जा रहा है। विपक्षी दलों से दलबदल करने वाले नेताओं के साथ आम आदमी के लिए लड़ाई करने की बात करने वाले राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजेंद्र गुप्ता बालभारती के इसी पाठ को दोहरा रहे हैं।
एक फर्क और है पहले कक्षा में गुरुजी यह पाठ पढ़ाया करते थे, अब यह काम ईडी और सीबीआई वाले कर रहे हैं “अमर घर चल… चल घर अमर… इधर आ… इधर-उधर मत जा। इधर आया तो मज़े करेगा, उधर गया तो हम आएंगे।”असल में यह बीजेपी का आजमाया हुआ फार्मूला है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश में सौ प्रतिशत रहा और छत्तीसगढ़ में इसे विधानसभा चुनाव में लागू किया जा चुका है। यही मॉडल अब देश में लागू है।



