
कोरबा।Cleaning Commander and Municipal Storm सुशासन के दावों के बीच, नगर निगम के ‘त्रिदेव’ एक से बढ़कर एक बवंडर मचा रहे हैं। स्वच्छता रैंकिंग और चकाचक सफाई के नाम पर बकायदा ‘सफाई कमांडर’ तैनात किए गए हैं। विडंबना देखिए, ये कमांडर फील्ड में कम और बिलों के पन्नों पर ज्यादा नजर आते हैं। अफसरों की इस तिकड़ी के शातिर अंदाज को भांपकर अब आम जनमानस भी चटखारे लेकर कहने लगा है— “सफाई कमांडर के बहाने, अफसर मचा रहे बवंडर!”
कहते हैं कि ‘सोच’ से बड़ा कोई हथियार नहीं होता, और सरकारी सिस्टम में बैठे हुक्मरानों की सोच ही विकास की दिशा तय करती है। लेकिन जब यह सोच सिर्फ दिखावे की रील्स और फोटो खिंचाने तक सिमट जाए, तो जन-कल्याण सीधे ‘स्व-कल्याण’ में तब्दील हो जाता है। शहर का भ्रमण करने पर यह हकीकत साफ दिखाई देती है। चमचमाती सड़कों के दावे चुनावी वादे की तरह देखने में तो बड़े हसीन लगते हैं, लेकिन धरातल की कड़वी सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है।
कागजी सफाई और ‘थ्री-लेयर’ का खेल
अगर शहर की सफाई व्यवस्था का पोस्टमार्टम किया जाए, तो कचरा साफ करने के लिए ‘थ्री-लेयर’ (तीन स्तरीय) फौज तैनात है:
- जमीनी हकीकत (स्वच्छता दीदियाँ): इस पूरी व्यवस्था में सबसे मुस्तैद और काबिले-तारीफ काम डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन करने वाली ‘स्वच्छता दीदियों’ का है, जो ईमानदारी से पसीना बहा रही हैं।
- ठेकेदारी का खेल: दूसरी तरफ, जिन्हें नाली और सड़कों की सफाई का जिम्मा मिला है, वे ठेकेदार सिर्फ कागजी कोरम पूरा करने और साहबों का ‘कल्याण’ करने में मशगूल हैं।
- लेबर शिफ्टिंग का सर्कस: सफाई के नाम पर बजट का भारी-भरकम पहिया घूमने के बावजूद जमीन पर सफाईकर्मियों का ऐसा टोटा (कमी) है कि ठेकेदार और उनके सुपरवाइजर सिर्फ इस गली से उस गली लेबर शिफ्ट करने का ‘सर्कस’ खेल रहे हैं।
तिजोरी पर ‘कमांडर’ का डाका
इस पूरी अव्यवस्था पर ‘सफाई कमांडर’ के नाम पर चालीस-चालीस लोगों की फौज की तैनाती, ‘करेला और वो भी नीम चढ़ा’ या यूं कहें कि ‘सोने पर सुहागा’ साबित हो रही है।
शहर में चर्चा सरेआम है: “नगर का कचरा साफ हो न हो, लेकिन सफाई के नाम पर मची इस खुली लूट से निगम की तिजोरी का साफ होना बिल्कुल तय है।”



