
खाकी के खिलाड़ी और गरम केतली का कमाल!
कहावत है कि “चाय से ज्यादा केतली गरम नहीं होनी चाहिए।” लेकिन खाकी महकमे में यह कहावत अब पुरानी पड़ चुकी है। यहां तो कई केतलियां ऐसी गरम हैं कि चाय खुद सोच रही होगी, “भाई, मैं आखिर हूं कहां?”
करीब दो महीने पहले बड़े साहब ने व्यवस्था में कसावट लाने के इरादे से तबादलों की लंबी फेहरिस्त जारी की। सोच यह थी कि जहां जरूरत है वहां जवान पहुंचेंगे, काम में तेजी आएगी और अनुशासन की चाय अच्छी तरह खौलेगी। लेकिन महकमे के कुछ पुराने खिलाड़ी आदेश को आदेश नहीं, “विचारार्थ सुझाव” समझ बैठे।
खबरीलाल की माने तो कुछ ने नियम के मुताबिक नई जगह आमद देकर ड्यूटी संभाल ली। मगर कुछ महारथियों ने ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला कि तबादला भी हो गया, रिलीव भी नहीं हुए और ड्यूटी आज भी उसी पुराने ठिकाने पर जारी है। यानी कागज पर एक जगह, हाजिरी दूसरी जगह और प्रभाव तीसरी जगह। मतलब साफ है.. “हम जहां हैं, वहीं सिस्टम है।”
महकमे के जानकार पंडित मुस्कुराकर कहते हैं कि यहां ट्रांसफर सिर्फ फाइलों में होता है, मैदान में नहीं। जिनकी पकड़ मजबूत है, उनके लिए आदेश भी रबर की तरह खिंच जाता है। और जिनकी नहीं, वे बैग उठाकर अगले ही दिन नई पोस्टिंग पर पहुंच जाते हैं।
सबसे दिलचस्प हाल तो थर्ड लाइन के उन महारथियों का है, जिनकी सक्रियता देखकर लोग कह उठते हैं, “यहां तो चाय से ज्यादा केतली गरम है।” असली जिम्मेदारी किसके पास है और असर किसका चलता है, यह समझने में नए अफसरों को भी वक्त लग जाता है।
अब सवाल यह है कि जब दो महीने बाद भी खिलाड़ी पुराने मैदान में ही चौके-छक्के लगा रहे हैं, तो फिर एसपी के स्थानांतरण आदेश का मतलब क्या रह गया? अगर नियम सबके लिए बराबर हैं, तो कुछ खिलाड़ियों को यह “विशेष छूट” आखिर किस अदृश्य शक्ति का आशीर्वाद है?
फिलहाल खाकी के गलियारों में यही चर्चा है कि आदेश जारी करने से ज्यादा मुश्किल उसे जमीन पर उतारना है। वरना यहां तो केतली पहले से गरम है, चाय कब बनेगी… यह कोई नहीं जानता।
राष्ट्रीय फाइलोद्यान मिशन…जहां ‘आम’ हो गए ‘खास’
भ्रष्टाचार के मामले में कोरबा जिले का नवाचार एक बार फिर चर्चा में है, जहां फाइलों में आम के बाग लहलहा रहे हैं। जिले के पाताढी और कटघोरा के डिंडोलभांठा में तीन साल पहले सरकारी खजाने से करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च कर ढाई लाख आम के पौधे लगाए जाने का दावा किया गया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि अब पूरा इलाका आम की खुशबू से महकेगा। लेकिन जमीन पर पहुंचिए, तो आम का एक पेड़ ढूंढ़ने में भी पसीना छूट जाएगा। इस नवाचार का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि फाइलों में आज भी वही पौधे पूरे जोश के साथ लहलहा रहे हैं और विभागीय उपलब्धियां हर साल नई पत्तियां निकाल रही हैं।
इस योजना की सबसे बड़ी सफलता यही मानी जाएगी कि पौधे तो आम के थे, मगर अब वे ‘खास‘ हो गए हैं। लोगों ने इस योजना का नाम बदलकर ‘राष्ट्रीय फाइलोद्यान मिशन’ रख दिया है। इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां पेड़ मिट्टी में नहीं, बल्कि फाइलों में उगते हैं। किसान आज भी उस बाग की तलाश में है, जिसे सरकारी रिपोर्टें वर्षों से हरा-भरा बता रही हैं। शायद यही नई सरकारी कृषि तकनीक है—जहां पौधे धरती पर नहीं, प्रतिवेदनों में फलते हैं और बजट का पेड़ कभी नहीं सूखता।
EPL गुरुओं की बोली और छात्रावास में होली…
कोरबा में एक ओर स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के कमी का रोना रोते हुए टीचरों की संविदा नियुक्ति की जा रही है तो दूसरी तरफ आईपीएल में लगने वाले खिलाड़ियों की बोली से अधिक शिक्षा विभाग की बोली चर्चा में है। EPL यानी “एजुकेशन प्रीमियर लीग” में खिलाड़ी बल्ला-बॉल नहीं चल रहे, बल्कि सिफारिश, जुगाड़ और कथित बोली के दम पर मनचाहा कुर्सी हासिल कर रहे है। पोस्टिंग के इस खेल में खिलाड़ी कोई और नहीं, बल्कि गुरुजी हैं और ट्रॉफी है छात्रावास अधीक्षक की कुर्सी।
सूत्रधार की माने तो जिले के 44 शिक्षक छात्रों को पढ़ना छोड़ छात्रावास में बच्चे खेला रहे है। लंबे समय से चल रहे खेल में अधीक्षक बनने की चाह रखने वाले कुछ शिक्षक ऐसे सक्रिय हैं, जैसे टीम मालिक ऑक्शन टेबल पर बैठे हों। कोई सिफारिश का सिक्का उछाल रहा है, तो कोई पहुंच का पावरप्ले खेल रहा है।
बाजार में चर्चा है कि इस कुर्सी का “रेट” भी तय हो चुका है। कोई एक पेटी की बात कर रहा है, तो कोई डेढ़ पेटी तक का आंकड़ा बता रहा है। सच क्या है, इसकी पुष्टि तो जांच ही करेगी, लेकिन चर्चाओं का बाजार खूब गर्म है।
सबसे दिलचस्प मुकाबला शहर से लगे छात्रावासों के लिए बताया जा रहा है। आखिर जहां सुविधा, वहीं सबसे ज्यादा “प्रतिभा” उमड़ेगी। ऐसे में योग्यता, अनुभव और शिक्षा जैसे शब्द शायद ड्रेसिंग रूम में बैठे अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
इस पूरे खेल में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर शिक्षक पढ़ाने से ज्यादा पोस्टिंग की जुगाड़ में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों का भविष्य कौन संवारेगा? ब्लैकबोर्ड खाली रहेगा और फाइलों में “शिक्षा सुधार” के दावे लिखे जाते रहेंगे।
लगता है अब शिक्षा विभाग को भी आधिकारिक रूप से “एजुकेशन प्रीमियर लीग” शुरू कर देनी चाहिए। नियम भी आसान हों… सबसे ऊंची बोली लगाइए, मनचाही पोस्टिंग पाइए और फिर शिक्षा की गुणवत्ता पर लंबी-लंबी बातें कीजिए। आखिर जब गुरुजी ही नीलामी के मैदान में उतर जाएं, तो क्लासरूम में ज्ञान नहीं, सिर्फ सन्नाटा ही गूंजता है।
अंगाकर रोटी और पहलवानी
अभनपुर में कांग्रेस का प्रशिक्षण शिविर चल रहा है, लेकिन यह पिछले प्रशिक्षण शिविरों से कुछ अलग है। 40 जिला अध्यक्ष सुबह पांच बजे बिस्तर छोड़कर योगा और मार्शल आर्ट में पसीना बहा रहे हैं। इसके बाद हाथ में फावड़ा थामकर मनरेगा कार्यस्थल पर गांव वालों के साथ मजदूरी भी करनी पड़ रही सो अलग। पहले कांग्रेस के प्रशिक्षण शिविर एयरकंडीशंड हॉल में हुआ करते थे, जहां पसीना बहाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। मगर जब से कांग्रेस विपक्ष में बैठी है, तब से बहुत कुछ बदल गया है।
अब अध्यक्षों को भी समझ में आने लगा है कि नेतागिरी चलाने के लिए योग और मार्शल आर्ट के साथ-साथ पहलवानी भी आनी चाहिए, तभी तो बीजेपी को पटकनी दी जा सकेगी। पार्टी ने अपने राष्ट्रीय महासचिव सचिन राव को इसकी निगरानी में लगा रखा है, ताकि कौन कितना दंड-बैठक लगा रहा है और किसने कितना पसीना बहाया, इसका रिकॉर्ड दिल्ली तक पहुंचे।
पार्टी की ओर से एक संदेश देने की भी कोशिश की गई है कि सत्ता की मलाई तभी मिल सकती है, जब नेताओं को अंगाकर रोटी, खपुरी रोटी, चीला, भाजी, सब्जी और पताल चटनी का स्वाद भी पता हो। इसके लिए जरूरी है कि वे एयरकंडीशन कमरों से बाहर निकलकर खेत-खलिहानों तक पहुंचें और किसान-मजदूरों की समस्याओं को करीब से समझें।
कुल मिलाकर, कांग्रेस का यह प्रशिक्षण शिविर ‘एयरकंडीशन वाली कांग्रेस’ को जमीन पर उतारने की एक कोशिश है। अब देखना यह है कि कौन-सा जिला अध्यक्ष पहलवानी के कितने गुर सीख पाता है।
एल्डरमैन के बाद निगम-मंडलों में नियुक्तियों का इंतजार
नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्तियों की सूची को लेकर बीजेपी में रार मची हुई है। सोशल मीडिया पर कार्यकर्ता खुलकर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। इस बीच सरकार में निगम-मंडलों में नियुक्तियों को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के दिल्ली दौरे के बाद निगम-मंडलों में लंबित नियुक्तियों के लिए पार्टी संगठन से हरी झंडी मिलने की खबर है।
खबरीलाल की मानें तो सत्ता और संगठन के गलियारों में चर्चा है कि कुछ प्रमुख निगमों में अध्यक्ष के अलावा उपाध्यक्ष और अन्य पदों के लिए भी नाम लगभग तय कर लिए गए हैं। अब सिर्फ औपचारिक घोषणा का इंतजार है।
बीजेपी सूत्रों के अनुसार, पार्टी संगठन की ओर से जिन नामों पर सहमति बनी है, उनकी सूची सरकार को भेज दी गई है। यदि अंतिम समय में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ, तो अगले सप्ताह नियुक्तियों की सूची जारी हो सकती है।
लंबे समय से इन नियुक्तियों का इंतजार कर रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं की निगाहें अब इसी सूची पर टिकी हैं। वैसे भी सरकार के ढाई वर्ष पूरे हो चुके हैं और पार्टी स्तर पर सत्ता एवं संगठन के बीच समन्वय की बात लगातार कही जा रही है। अब देखना यह होगा कि अंतिम सूची में किसे जगह मिलती है।






