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Worry or Contemplation : ​​खाकी ‘वर्क फ्रॉम होम’ पर, अपराधियों का ‘बंपर अप्रेजल’, वो तो भला हो ‘बड़े साहब’ का, जो बालको का कान पकड़कर..​मंत्री और साहब की जोड़ी से किसकी बढ़ी टेंशन? पीएचक्यू में तबादले की हलचल

खाकी ‘वर्क फ्रॉम होम’ पर, अपराधियों का ‘बंपर अप्रेजल’

 

Korba Law and Order कहते है ​समाज के मजबूत स्तंभ के लिए तीन टॉनिक जरूरी हैं जेब में पैसा, नाम में रुतबा और खाकी का खौफ। पहले दो न मिलें तो इंसान कमजोरी झेल लेता है, लेकिन तीसरा टॉनिक एक्सपायर हो जाए तो कानून की किताबें दीमकों का और शहर के चौराहे अपराधियों का ठिकाना बन जाते है और फिर सभ्यता और अराजकता के बीच की रेखा धुंधली पड़ने लगती है।

​’पॉवर सिटी’ कोरबा इन दिनों इसी ‘पावरफुल’ दौर से गुजर रही है। रामसागर पारा कांड ने शहर को झकझोर दिया है। जो इलाका कभी शांति का ब्रांड एंबेसडर था, वह अब अपराधियों का ‘लॉन्चिंग पैड’ है। हालात देख जनता कह रही है “अपराधियों को अब पुलिस का खौफ नहीं, बस थाने का गूगल मैप पता है।

​यह कोई सिंगल-रिलीज फिल्म नहीं, बल्कि पूरी वेब सीरीज है। बीजेपी नेता से सरेआम ‘सद्भावना मारपीट’ से लेकर एएसआई के बेटे को कुचलने तक, किरदारों की लंबी फेहरिस्त है। जब पुलिस का अपना परिवार ही असुरक्षित हो, तो आम आदमी चैन की नींद सोए या रतजगा करे? कहा  तो यह भी जा रहा है कि कभी खाकी का सायरन सुनकर ‘बैक गियर’ लगाने वाले तत्व, आज खाकी को देख ‘फ्रंट गियर’ लगा रहे हैं। लगता है अपराधियों का कॉर्पोरेट प्रमोशन हो गया है और पुलिस विभाग हाथ में ट्रांसफर ऑर्डर लिए ‘नो-सिग्नल’ जोन में बैठा है।

​चाय दुकानों पर नया सर्वे है कि क्या पुलिसिंग अब सिर्फ वीआईपी ड्यूटी, धरना-प्रदर्शन और प्रोटोकॉल तक सिमट गई है? क्योंकि मैदान पर अपराधी क्रीज पर टिककर धुआंधार बल्लेबाजी कर रहे हैं और कानून की फील्डिंग बार-बार बाउंड्री के बाहर गेंद ढूंढ रही है। कमोबेश सार यही है कि कहीं पुलिस व्यवस्था अपनी प्राथमिकताओं से भटक तो नहीं गई? ऐसा लगता है मानो अपराधी मैदान में पूरे आत्मविश्वास के साथ चौके-छक्के जड़ रहे हों और कानून व्यवस्था गेंद खोजने में ही व्यस्त हो।

सुशासन के विज्ञापनों के बीच कोरबा का ‘मार्केट सेंटीमेंट’ साफ है अपराधियों का हौसला ‘निफ्टी’ की तरह हाई है, खाकी का खौफ ‘सेंसेक्स’ की तरह लो है, और जनता का भरोसा सीधे ‘ईश्वर’ के खाते में ट्रांसफर हो चुका है। अब प्रश्न केवल अपराध का नहीं, बल्कि कानून की प्रतिष्ठा का है। क्योंकि अपराधी तब तक शक्तिशाली नहीं होता, जब तक कानून कमजोर दिखाई न देने लगे। कोरबा की जनता इसी प्रतीक्षा में है कि खाकी अपनी खोती हुई धार को पुनः प्राप्त करेगी या फिर अपराधियों का यह स्वर्णकाल यूं ही निर्बाध चलता रहेगा।

 

 

वो तो भला हो ‘बड़े साहब’ का, जो बालको का कान पकड़कर…

 

 

राजनीति का एक पुराना नियम है, निशाना कहीं और लगाया जाता है और तीर कहीं और जाकर लग जाता है। हाल ही में एक पूर्व मंत्री की प्रेस वार्ता में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जहां विरोधियों पर हमला करते-करते उन्होंने व्यवस्था का पूरा एक्स-रे जनता के सामने रख दिया।

 

 

पिछले दिनो नेताजी अपने कार्यकाल का बखान करते हुए बता रहे थे कि कैसे वे बालको, एनटीपीसी और एसईसीएल जैसी कंपनियों से करोड़ों रुपये का सीएसआर फंड लाकर विकास कार्य कराते थे। लेकिन वर्तमान व्यवस्था पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि आज के नेता जनहित छोड़कर स्वहित में उलझ गए हैं।

इस बयान ने जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया। अगर पहले सीएसआर से विकास की गंगा बहती थी और आज उसकी रफ्तार धीमी है, तो आखिर विकास का रास्ता बदल कहां गया?

पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब नेताजी ने कोरबा कलेक्टर की तारीफ करते हुए कहा, “वो तो भला हो बड़े साहब का, जिन्होंने बालको का कान पकड़कर 30 करोड़ रुपये सड़क के लिए निकलवा लिए।”

बस, यही एक लाइन पूरे घटनाक्रम की जान बन गई। कॉर्पोरेट दुनिया जिसे सीएसआर समन्वय कहती है, नेताजी ने उसे ठेठ देसी अंदाज में “कान-पकड़ू कूटनीति” का नाम दे दिया।

अब जनता की आंखों के सामने एक ही दृश्य घूम रहा है कि बंद कमरे में कंपनी के अधिकारी बैठे हैं और बड़े साहब सिंघम स्टाइल में कह रहे हैं, “निकालो 30 करोड़!” और अगले ही पल चेक तैयार हो जाता है।

अब जनता असमंजस में है कि शहर के विकास के लिए ज्यादा जरूरी क्या है सीएसआर नीति, नेताओं के वादे या फिर ऐसा कोई “बड़ा साहब”, जिसके पास जरूरत पड़ने पर बड़े-बड़ों का कान उमेठने का हुनर हो।

 

 

​मंत्री और साहब की जोड़ी से किसकी बढ़ी टेंशन?

 

 

 

​नगर निगमनगर निगम के गलियारों में इन दिनों चर्चा किसी टेंडर, ट्रांसफर या ठेके की नहीं, बल्कि एक ऐसी जोड़ी की है जिसने सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा रखी है। एक तरफ मंत्री जी का राजनीतिक वरदहस्त, दूसरी तरफ साहब की बढ़ती सक्रियता। दोनों की जुगलबंदी ऐसी चली कि जनता के बीच सीधे पहुंच और त्वरित समाधान की छवि बन गई।

कहते है ​जब प्रशासनिक पावर को राजनीतिक पावरहाउस (मंत्री जी) का साथ मिल जाए, तो जनता का भरोसा बढ़ना लाजिमी है।

 

यही वजह है कि साहब की लोकप्रियता इन दिनों परवान चढ़ रही है। अब हालात यह हैं कि निगम के कई कमरों में कामकाज से ज्यादा इसी बात की चर्चा है कि आखिर इस जोड़ी के खाते में इतनी वाहवाही कैसे जमा हो रही है। राजनीति का यह पुराना नियम है कि राजनीति में तालियों की गूंज अक्सर किसी को “भूंज” देती है, किसी न किसी की नींद उड़ा देती है

 

​यहीं से कहानी में एक दिलचस्प मोड़ आता है। निगम की एक महत्वाकांक्षी नेत्री, जिन्होंने स्थानीय राजनीति को विधानसभा की सीढ़ी बनाने का सपना संजो रखा है, इस ‘पावर कपल’ (मंत्री और साहब) की बढ़ती स्वीकार्यता से बेहद असहज नजर आ रही हैं। विधानसभा की राह देख रही मैडम को अब लगने लगा है कि जनता के बीच यदि यही माहौल बना रहा तो भविष्य की राजनीतिक पटकथा में उनका किरदार कमजोर पड़ सकता है।

 

​सियासत में लोकप्रियता सिर्फ प्रशंसा नहीं लाती, बल्कि अपने साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या भी लेकर आती है। यही वजह है कि मंत्री और साहब की यह सक्रियता जहां आम जनता को राहत दे रही है, वहीं कई लोगों के राजनीतिक कैलकुलेटर का हिसाब बिगाड़ दिया है।

​अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि यह जुगलबंदी आगे क्या नया समीकरण बनाती है। क्या साहब, मंत्री जी के साथ मिलकर जनता के इस भरोसे को और मजबूत कर पाएंगे, या फिर मैडम की राजनीतिक घेराबंदी इस रफ्तार पर ब्रेक लगाने में कामयाब होगी? फिलहाल, निगम के गलियारों में मंत्री जी और साहब की कार्यशैली मिलकर ऐसा समीकरण बना रहे हैं, जिससे इस सियासी ड्रामे के नए अध्याय पर चाय की टेबल से लेकर बंद कमरों तक चर्चाओं का बाजार गर्म है।

 

 

पीएचक्यू में तबादले की हलचल

 

 

बैकुंठपुर के नगौई में रेत ठेका विवाद में बीजेपी नेता की हत्या से सरकार बैकफुट पर आ गई है। कांग्रेस प्रदेश की बिगड़ी कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रही है। छोटे जिलों में पुअर पुलिसिंग को लेकर सरकार और पुलिस मुख्यालय में मंथन हो रहा है। सूत्रों की मानें तो इस महीने के अंत तक महकमे में बड़े फेरबदल की खबर है, जिसमें कई जिलों के एसपी प्रभावित होंगे।

वैसे भी बस्तर आईजी सुंदरराज पी. की एनआईए में पोस्टिंग और दो जिलों में प्रभारी एसपी होने की वजह से यहां भी पदस्थापना होनी है। चर्चा है कि इसी दौर में आधा दर्जन जिलों के एसपी बदले जा सकते हैं।

पीएचक्यू में भी अलग-अलग सेल के पद खाली हैं। यहां नई पदस्थापनाएं की जा सकती हैं। विशेषकर सरगुजा संभाग के जिलों में हाल की लॉ एंड ऑर्डर की घटनाओं के बाद पुलिस महकमे में फेरबदल हो सकते हैं। खबरीलाल की मानें तो जल्द ही पीएचक्यू सहित कई जिलों में आईपीएस पदस्थापना के नए आदेश जारी हो सकते हैं।

 

 

चिंता या चिंतन

 

 

चुनाव में अभी दो साल से ज्यादा समय बाकी है, मगर छत्तीसगढ़ में सरकार और विपक्ष दोनों को अभी से चुनाव की चिंता सता रही है। राजधानी रायपुर में चिंता और चिंतन का दौर चल रहा है। इसी सप्ताह सरकार अपने मंत्रियों को आईआईएम के चिंतन शिविर में लेकर जाने वाली है, जहां ‘विषय विशेषज्ञ’ मंत्रियों को सरकार कैसे चलानी है, इसका पाठ पढ़ाएंगे।

 

वो भी तब जब ढाई साल तक सरकार चल चुकी है.. अब आगे के ढाई साल सरकार कैसे चलानी है, इसी का चिंतन होना है। डिप्टी सीएम का कहना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। सीखने-सिखाने का दौर चलता रहना चाहिए। लेकिन सरकार के मंत्री यह न भूलें कि जनता सयानी है। वह बिना चिंतन शिविर के भी… सब कुछ सिखा देती है।

 

रही बात कांग्रेस की, तो वह यह सबक पिछले चुनाव में सीख चुकी है। पिछली बार राहुल गांधी चूक गए थे, मगर इस बार पूरी तैयारी के साथ रायपुर पहुंचे हैं। डीसीसी और शहर अध्यक्षों को चुनाव जीतने तथा बीजेपी का मुकाबला करने के लिए तैयार किया जा रहा है।

 

कुल मिलाकर दोनों ओर चिंता और चिंतन का दौर चल रहा है। सरकार या कोई दल अगर अपने मंत्रियों या पार्टी वर्कर्स को प्रशिक्षण दे रहा है, तो इसमें किसी को हर्ज नहीं होना चाहिए। मगर असली खिलाड़ी तो सयानी जनता है। दलों को उन्हीं की चिंता करनी चाहिए, नहीं तो चिंतन केवल शिविर बन कर रह जाएगा।

 

 ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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