
राम की शरण में ‘खाकी’… और खुल गया राज!
Korba Raj Jewellers Loot Case कहते हैं, संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर सही “राम” मिल जाएं तो राह निकल ही आती है। कोरबा के चर्चित छुरी ज्वेलर्स लूटकांड ने कई दिनों तक ‘खाकी’ की नींद उड़ा रखी थी। शहर में चर्चाओं का बाज़ार गर्म था, पुलिस पर चौतरफा दबाव था और सवालिया निशान भी खड़े हो रहे थे। फिर अचानक कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि दो आरोपी दबोच लिए गए और लूटकांड की उलझी गुत्थी सुलझने लगी। बस… यहीं से शुरू हुई शहर की एक नई राजनीतिक-प्रशासनिक लोककथा!
महकमे में लोग अब मंद-मंद मुस्कुराते हुए कह रहे हैं “देखा! राम की शरण में जाते ही सारे संकट कट गए।” लेकिन ठहरिए… यहाँ बात अयोध्या वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की नहीं हो रही है। चर्चा तो खाकी के उस “राम” की है, जिन्हें साइबर दुनिया का माहिर खिलाड़ी माना जाता है।सूत्रधार की माने तो जब जांच की गाड़ी बार-बार पटरियों से उतरने लगी और सुराग हाथ नहीं आ रहे थे, तब खाकी ने इसी “राम” की शरण ली। इसके बाद बिसात बदली गई, साइबर के धुरंधरों को फिर से मोर्चे पर उतारा गया और कहानी ने नया मोड़ ले लिया। देखते ही देखते जांच की धीमी बैलगाड़ी ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि बुलेट ट्रेन की गति भी कम पड़ जाए।
अब इस किस्से में कितनी सच्चाई है और कितना प्रशासनिक गलियारों की गप्प, यह तो विभागीय लोग ही जानें। लेकिन शहर की हवाओं में यह व्यंग्य ज़रूर तैर रहा है कि आज के डिजिटल दौर में हर विभाग का अपना एक अलग “राम” होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि त्रेतायुग के राम धनुष-बाण चलाते थे और कलयुग के ये राम डेटा चलाते हैं।इस पूरे घटनाक्रम ने खाकी के गलियारों में एक नई कहावत को भी जन्म दे दिया है “कलयुग में संकटमोचन बनने के लिए हमेशा तीर-कमान की ज़रूरत नहीं होती; कभी-कभी लैपटॉप, आईपी एड्रेस और लोकेशन ट्रेसिंग ही काफी होती है।”
यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि बदलते समय में अपराध भी हाईटेक हो रहे हैं तो पुलिस को भी उसी गति से खुद को तैयार करना होगा। केवल संसाधन नहीं, बल्कि तकनीकी दक्षता और सही समय पर सही निर्णय ही कानून व्यवस्था को मजबूत बना सकते हैं।
इस पेचीदा लूटकांड का पर्दाफाश करने वाले खाकी के वीर सिपाहियों के लिए बस यही पंक्तियाँ मौजूं बैठती हैं “राम जी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को डरे…!”
उजड़ी रियासत के 44 राजा और…
Korba Administrative System कहते हैं, जब सल्तनत मजबूत करनी हो तो सिपाही बढ़ाए जाते हैं। लेकिन जब विकास सिर्फ कागजों पर सरपट दौड़े और जमीन पर गड्ढे ही गड्ढे हों, तो समझदारों का मानना है कि वहां सीधे ‘राजाओं‘ की फौज उतार दी जाती है। कोरबा नगर निगम का ताजा सियासी नजारा इसी अद्भुत और अनोखे फॉर्मूले पर चल रहा है।
असल में कोरबा निगम यानी इस स्थानीय रियासत में पहले से ही सत्ता पक्ष के 44 राजा मौजूद हैं। इनका बारहमासी राग सिर्फ एक ही रहता है “बजट नहीं है, अधिकार नहीं हैं और विकास की गाड़ी पूरी तरह पंचर है!” कोरबा की जनता बरसों से नेताओं के इस ‘करुण रस’ वाले विलाप के बीच अपनी बदहाल सड़कें, बंद स्ट्रीट लाइटें और ठप पड़े विकास कार्यों को ढूंढ रही थी।
जनता को उम्मीद थी कि इस बार बीमारी का कोई ठोस इलाज होगा। लेकिन हमारे लोकतंत्र का जादू तो देखिए! हकीमों ने बीमारी ठीक करने के बजाय अस्पताल का कमरा ही बड़ा कर दिया। जो 44 राजा पहले से व्यवस्था का रोना रो रहे थे, उनका दिल बहलाने और सियासी संतुलन साधने के लिए 11 नए राजा और भर्ती कर दिए गए। नया सियासी गणित: 44 पुराने + 11 नए = दरबार में रौनक पूरी 55!
मतलब कोरबा की रियासत में अब कुल 55 राजा हैं। यानी हर समस्या के लिए अब पहले से ज्यादा लोग चिंतित दिखाई देंगे। सड़क टूटेगी तो चिंता करने वालों की संख्या बढ़ेगी, नाली जाम होगी तो बयान देने वालों की कतार लंबी होगी, लेकिन स्थिति जस की तस रहेगी। तेज क्या होगा,विकास की रफ्तार या फिर नई बैठकों की संख्या, इस पर मंथन चाय की चुस्कियों के बीच जारी है।
अब सवाल यह है कि क्या इस भारी-भरकम फौज के आने के बाद शहर की एक भी सड़क चमकेगी? क्या पानी और सफाई की किल्लत दूर होगी? या फिर यह भी राजनीति का वही पुराना घिसा-पिटा अध्याय साबित होगा, जहां पद तो थोक के भाव बांटे जाते हैं, लेकिन जनता की मूलभूत अपेक्षाएं अगली पंचवर्षीय योजना के लिए टाल दी जाती हैं। फिलहाल, कोरबा की समझदार जनता चौक-चौराहों पर चाय की चुस्कियां लेते हुए मंद-मंद मुस्कुरा रही है और सत्ता के गलियारों की तरफ देखकर धीरे से पूछ रही है “हुजूर! दरबार तो अब पूरा ‘हाउसफुल’ हो गया है… अब बस इतना बता दीजिए कि जनता के हित का असली राजकाज कब शुरू होगा?”
जुगाड़ टेक्नोलॉजी से पानी सप्लाई
Korba Water Supply प्रदेश के तकनीकी विभागों की कार्यशैली अब किसी परिचय की मोहताज नहीं रही। यहाँ इंजीनियरिंग से ज़्यादा भरोसा ‘जुगाड़ टेक्नोलॉजी’ पर दिखता है। योजनाएँ बाद में बनती हैं और काम पहले शुरू हो जाता है। जब कोई बड़ी चूक सामने आती है, तो उसे “इमरजेंसी एक्शन” का नाम देकर मामला संभाल लिया जाता है।
नगर निगम पहले करोड़ों की सड़क बनाता है, फिर याद आता है कि पानी की पाइपलाइन डालनी बाकी है और नई सड़क दोबारा खोद दी जाती है। पीडब्ल्यूडी को भी गड्ढे तभी दिखाई देते हैं, जब मानसून दस्तक दे देता है।अब जल संसाधन विभाग ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है।
15 जुलाई से हसदेव बांगो बांध का पानी किसानों के लिए छोड़ा जाना है, लेकिन अग्रसेन तिराहा से इमलीडुग्गू तक नहर लाइनिंग का काम तीन में से सिर्फ एक हिस्से में ही पूरा हो पाया है। बाकी हिस्सों से रिसाव की आशंका साफ दिखाई दे रही है। पूर्व में इमलीडुग्गू के पास नहर का तटबंध (बंड) टूट चुका था,जिससे खेतों और घरों में पानी घुस चुका है, जिसे तब भी मिट्टी की बोरियों, पत्थरों और जेसीबी के सहारे ‘जुगाड़’ से रोका गया था।अब देखना यह है कि पानी किसानों के खेतों तक ज़्यादा पहुँचता है या अधूरी नहर से बाहर बह जाता है।
यदि फिर रिसाव हुआ, तो वही पुराना सरकारी फॉर्मूला सक्रिय होगा, मिट्टी की बोरियाँ, पत्थर, जेसीबी और ‘त्वरित कार्रवाई’। ऐसे में सवाल यही है कि क्या अधिकारियों को किसी बड़े हादसे का इंतज़ार है..? जो भी हो विभाग और ठेकेदारों के बीच चाय पर चर्चा तो यही है, “काम अधूरा सही, जुगाड़ पूरा है..”
पोस्टर के पीछे क्या है…
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में इन दिनों पीसीसी अध्यक्ष के पद को लेकर शुरू हुए पोस्टर वार को केवल समर्थकों की ‘मन की बात’ मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने अपने समर्थकों से ऐसा करने से मना किया है। मगर इसके साथ ही वे पार्टी हाईकमान के फैसले की बात भी कर रहे हैं। सिंहदेव का कहना है कि कुछ लोग अपनी मन की बात रोक नहीं पाते, लेकिन ऐसे निर्णय हाईकमान के होते हैं और उन्हें वही लेने देना चाहिए।
वहीं, बैज समर्थक भी यह मानकर चल रहे हैं कि विधानसभा चुनाव तक वे ही प्रदेश अध्यक्ष बने रहेंगे। बैज का कहना है कि वे आलाकमान के आशीर्वाद से काम कर रहे हैं। लेकिन राजनीति में कई बार नेताओं के बयान और समर्थकों की सक्रियता अलग-अलग संदेश देती हैं। समर्थक माहौल बनाते हैं, जबकि नेता संयमित भाषा में अपनी दावेदारी खुली छोड़ देते हैं।
कुल मिलाकर, विधानसभा चुनाव से पहले पीसीसी चीफ बदले जाने की चर्चा संगठन के भीतर चल रही नई शक्ति-संतुलन की लड़ाई का संकेत है। पोस्टर और सोशल मीडिया अभियान से यह संदेश दिया जा रहा है कि पार्टी का एक वर्ग संगठन में बदलाव चाहता है।
इस वक्त कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से मुकाबले के साथ-साथ संगठन को एकजुट बनाए रखने की है। इसलिए फिलहाल सार्वजनिक बयान संयमित हैं, लेकिन अंदरखाने राजनीतिक गतिविधियां तेज मानी जा रही हैं। जबकि, इस मामले में प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेताओं ने चुप्पी साध रखी है। लेकिन, राजनीति में कई बार यही चुप्पी सबसे बड़ा संकेत होती है।
फिलहाल तस्वीर यही बताती है कि पीसीसी अध्यक्ष को लेकर अंतिम फैसला रायपुर में नहीं, बल्कि दिल्ली में होगा। पोस्टर वार ने केवल इस बहस को हवा दी है। अभी पोस्टर भले ही सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहे हों, लेकिन उनकी असली गूंज दिल्ली के दरबार तक पहुंच चुकी है। अब देखना ये है कि इस पोस्टर वार के पीछे जो संदेश दिल्ली तक पहुंचा है उस पर पार्टी हाईकमान क्या फैसला लेता है।
समन्वय से ट्रांसफर
Chhattisgarh Transfer News 8 जुलाई को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की कैबिनेट बैठक हुई। बैठक से पहले कयास लगाए जा रहे थे कि सरकारी कर्मचारियों की ट्रांसफर नीति पर मुहर लगेगी और करीब ढाई साल बाद तबादलों पर लगी रोक हट जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। सरकार ने फिलहाल समन्वय के भरोसे ही ट्रांसफर की व्यवस्था चला रखी है।
खबरीलाल की मानें तो सिस्टम में जबरदस्त समन्वय काम कर रहा है। समझदार अफसर समन्वय साधकर मनचाहे जिलों में पोस्टिंग पा रहे हैं, जबकि जो लोग ट्रांसफर पर लगी रोक हटने का इंतजार कर रहे हैं, उनके हिस्से में फिलहाल सिर्फ इंतजार ही आया है।
वैसे भी भाजपा सरकार पार्टी नेताओं को उनकी कद-काठी के हिसाब से निगम, मंडलों और आयोगों में एडजस्ट कर चुकी है। आगे नई नियुक्तियों की संभावना भी कम ही नजर आती है। ऐसे में जिला और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं के पास अब बचा ही क्या है? ट्रांसफर-पोस्टिंग भी बंद है।
सरकार की इस व्यवस्था से पार्टी संगठन के जिला स्तर के कार्यकर्ता खासे परेशान हैं। जिलों में अफसर उनकी सुनते ही नहीं। चुनाव में अब दो साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में अगर अफसर कार्यकर्ताओं की छोटी-छोटी सिफारिशों पर भी ध्यान नहीं देंगे, तो वे जनता के बीच आखिर किस बात का दम भरेंगे?
सोमवार से विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हो रहा है। सभी मंत्री और विधायक राजधानी में रहेंगे। ऐसे में मंत्रियों के बंगलों पर ट्रांसफर-पोस्टिंग की सिफारिशी चिट्ठियां लेकर पहुंचने वाले कार्यकर्ताओं की भीड़ बढ़ रही है। अब देखना यह है कि इन चिट्ठियों का समन्वय कितना सफल रहता है। अगर समन्वय ठीक रहा, तो कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी कुछ कम होगा और मंत्रियों को भी राहत मिल जाएगी।






