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थाने में नहीं मिल रहे थानेदार, अब की बार… आईजी से गुहार!

कोरबा। SHO Missing From Police Station Complaint to IG “अब की बार…” भाजपा का यह चुनावी नारा भले ही सियासत में सुपरहिट रहा हो, लेकिन कोरबा में साइबर ठगी के पीड़ितों ने अपनी बेबसी को बयां करने के लिए इसे एक नया और बेहद तीखा रूप दे दिया है। इन दिनों शहर के चौक-चौराहों और पीड़ित परिवारों के बीच बस एक ही चर्चा आम है “थाने में नहीं मिल रहे थानेदार, अब की बार आईजी से गुहार!”

​दरअसल, साइबर अपराधियों के जाल में फंसकर अपनी गाढ़ी कमाई गंवाने वाले लोग जब न्याय की आस में नए-नवेले साइबर थाने पहुंच रहे हैं, तो उन्हें राहत की जगह सिर्फ ‘तारीख पर तारीख’ और ‘इंतजार’ मिल रहा है।

​अच्छी थी सोच, पर सिस्टम ने फेरा पानी

​प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप ‘मिनी भारत’ कहे जाने वाले औद्योगिक शहर कोरबा में साइबर थाना स्थापित किया गया था। मकसद साफ था— ऑनलाइन ठगी के शिकार लोगों को त्वरित राहत मिले और डिजिटल डकैतों पर नकेल कसी जा सके। सोच बेहतरीन थी और व्यवस्था भी खड़ी की गई, लेकिन अब इस पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

शिकायत लेकर पहुंच रहे पीड़ितों का दर्द:

“जब हमारी गाढ़ी कमाई चंद मिनटों में उड़ गई, तब हमें लगा कि साइबर थाना हमारी मदद करेगा। लेकिन यहां आने पर पता चलता है कि साहब तो हैं ही नहीं। अब हम साइबर ठगों से लड़ें या थाने के चक्कर काटें?”

 

​वीआईपी ड्यूटी और ट्रेनिंग में उलझा न्याय!

​विश्वस्त सूत्रों और पीड़ित नागरिकों की मानें तो साइबर थाने में पदस्थ थाना प्रभारी (TI) अक्सर अपनी मूल कुर्सी से नदारद रहते हैं। कभी विधानसभा ड्यूटी, कभी आईपीएल की सुरक्षा व्यवस्था, तो कभी ट्रेनिंग के नाम पर वे जिले से बाहर या अन्य व्यस्तताओं में रहते हैं।

​जब कोई ऑनलाइन फ्रॉड का शिकार खून-पसीने की कमाई डूबने के गम में शिकायत लेकर थाने पहुंचता है, तो उसे अमूमन यही रटा-रटाया जवाब मिलता है:

  • “साहब अभी ट्रेनिंग में गए हैं…”
  • “साहब की वीआईपी ड्यूटी लगी है…”

​नतीजा यह है कि ठगी का शिकार आम नागरिक एफआईआर दर्ज कराने और अपनी बात कहने के लिए थाने की चौखट पर चप्पलें घिसने को मजबूर है।

​’गोल्डन ऑवर’ की अहमियत को नहीं समझ रहा अमला

​साइबर एक्सपर्ट्स और खुद पुलिस के आला अधिकारी हमेशा कहते हैं कि साइबर अपराध में ‘गोल्डन ऑवर’ (शुरुआती कुछ घंटे) सबसे अहम होते हैं। अगर ठगी के तुरंत बाद पुलिस एक्टिव हो जाए, तो बैंक खातों को होल्ड कराकर पैसे वापस मिलने की उम्मीद 90% तक होती है। लेकिन कोरबा में आलम यह है कि जब तक कार्रवाई की फाइल आगे बढ़ती है, तब तक साइबर ठग पैसे को कई लेयर्स में ट्रांसफर कर रफूचक्कर हो चुके होते हैं।

​जनता में आक्रोश: अब सीधे बिलासपुर आईजी से उम्मीद

​शहर में अब यह सवाल खुलकर और बेहद तल्खी के साथ उठने लगा है कि जब कोरबा जैसे बड़े जिले में साइबर अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है, तब इस संवेदनशील थाने में एक जिम्मेदार और नियमित अधिकारी की मौजूदगी सुनिश्चित क्यों नहीं की जा पा रही?

​जनमानस के बीच अब यह साफ चर्चा है कि यदि स्थानीय स्तर पर पुलिसिया ढर्रे में सुधार नहीं हुआ और पीड़ितों की सुनवाई नहीं हुई, तो ठगी के शिकार लोग एकजुट होकर सीधे बिलासपुर आईजी कार्यालय का दरवाजा खटखटाएंगे और अपनी गुहार सीधे बड़े साहब तक पहुंचाएंगे।

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