
खटियाखड़ी और IPS की फिल्मी एंट्री
Khatiyakhadi IPS Entry : कोरबा की सियासत में इन दिनों एक शब्द खूब सुर्खियां बटोर रहा है… “खटियाखड़ी।”कभी आंदोलन में खटिया बिछती है, कभी प्रबंधन की खटिया खड़ी होती है और अब तो लगता है कि इस ट्रेंड ने शहर के ट्रैफिक सिस्टम को भी अपनी चपेट में ले लिया है।
बीते शुक्रवार को जूनियर जोगी के खटियाखड़ी आंदोलन से ट्रैफिक सिस्टम की खटियाखड़ी हो गई । दर्री पुल के पास ऐसा जाम लगा कि लोगों को लगा मानो सड़क पर गाड़ियां नहीं, किसी फिल्म का क्लाइमेक्स शूट हो रहा हो। हर तरफ गाड़ियां ही गाड़ियां… आगे जाने का रास्ता बंद… पीछे से हॉर्न की ऐसी संगत कि कोई चाहे तो वहीं खड़े-खड़े एक पूरा ऑर्केस्ट्रा तैयार कर दे। ड्राइवरों के चेहरे देखकर लग रहा था जैसे किसी ने सबको एक ही डायलॉग पकड़ा दिया हो “भाई साहब, आज तो ये ट्रैफिक कहीं का नहीं छोड़ेगा…” तभी अचानक कहानी में ट्विस्ट आता है। फिल्मों की तरह एक नई एंट्री होती है आईपीएस साहब की।
साहब गाड़ी से उतरे। चारों तरफ हालात देखे और बिना देर किए सीधे सड़क पर उतर गए। ना कोई दिखावा, ना कोई लंबी फौज, बस खुद ही मोर्चा संभाल लिया। फिर शुरू हुआ ट्रैफिक कंट्रोल का असली “लाइव शो”। हाथ के इशारे से गाड़ियों को ऐसे निकालना शुरू किया।जैसे कोई डायरेक्टर सीन सेट कर रहा हो।“तुम आगे… तुम रुको… अरे भाई, एक-एक करके निकलो…”
कुछ ही देर में जो सड़क जाम से कराह रही थी, वहां गाड़ियों के पहिए धीरे-धीरे घूमने लगे।ट्रैफिक में फंसे लोगों को भी यह नजारा थोड़ा अलग लगा।किसी ने मोबाइल निकालकर वीडियो बना लिया, तो किसी ने बगल वाले से मुस्कुराते हुए कहा “लगता है आज पुलिस नहीं, हीरो खुद मैदान में उतर आया है।”वैसे शहर में यह नजारा रोज देखने को नहीं मिलता कि एक आईपीएस अफसर खुद सड़क पर खड़े होकर ट्रैफिक संभालता नजर आए।इस घटना ने बस इतना जरूर याद दिला दिया कि कभी-कभी सिस्टम की खटिया सीधी करने के लिए कुर्सी छोड़कर सड़क पर उतरना पड़ता है। जनमानस तो यह भी कह रहे कि यह सिर्फ एक दिन का सीन था या कोरबा ट्रैफिक की कहानी में ऐसे हीरो आगे भी कभी-कभी एंट्री लेते रहेंगे।क्योंकि शहर की सड़कों का हाल देखकर कई लोग धीरे से यही कहते सुने गए…“भाई… पिक्चर अभी बाकी है।”
कपल का दो मकान वाला प्यार, ये क्या हो रहा सरकार…
“बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं…”राज कुमार मल्होत्रा का यह मशहूर डायलॉग अगर सरकारी दफ्तरों के लिए लिखा जाता, तो शायद नगर निगम के कपल का दो मकान वाला प्यार पर बिल्कुल फिट बैठता। फर्क बस इतना है कि यहां बात छोटी नहीं, बल्कि सरकारी मकानों की “डबल स्टोरी” बन गई है।
सरकारी नियम साफ कहते हैं कि अगर पति और पत्नी दोनों सरकारी नौकरी में हों और एक ही शहर में पदस्थ हों, तो उन्हें एक ही सरकारी आवास मिलेगा। वजह भी साफ है, सरकारी संपत्ति सीमित है और बाकी कर्मचारियों को भी उसका लाभ मिलना चाहिए। लेकिन नगर निगम के गलियारों में इन दिनों एक ऐसी “लव स्टोरी” चर्चा में है, जिसमें साथ तो जिंदगी बिताई जा रही है, मगर सरकारी रिकॉर्ड में प्यार का गणित कुछ अलग ही चल रहा है।
दफ्तर की चाय पर चर्चा करने वाले कहते हैं कि बिना मजबूत सेटिंग के सरकारी मकान का एक कमरा तक मिलना मुश्किल है, लेकिन यहां पूरा मकान भी और उसका जुड़वां भाई भी मौजूद है।निगम के पुराने जानकार बताते हैं कि यह कोई पहला कारनामा नहीं है। पहले भी एक बोल-बच्चन वाले अफसर ने डुप्लेक्स मकान अलॉट कराया और उसके ऊपरी हिस्से को किराए पर चढ़ा दिया। सरकारी सुविधा का ऐसा “रियल एस्टेट मॉडल” शायद किसी ट्रेनिंग मैनुअल में नहीं पढ़ाया जाता।
अब सवाल वही पुराना है… क्या निगम के जिम्मेदार अफसरों को यह सब दिखाई नहीं दे रहा, या फिर फाइलों के बीच सब कुछ देखकर भी अनजान बने रहने की कला का अभ्यास चल रहा है।फिलहाल निगम के गलियारों में यही चर्चा है कि जब नियम एक मकान का है, तो दो मकानों वाला यह प्यार आखिर किस सरकारी नीति के तहत पनप रहा है।
और आखिर में जनता का वही मासूम सवाल “सरकार, ये क्या हो रहा है… कहीं “एक के साथ एक फ्री” वाली स्कीम तो सरकारी मकानों पर भी लागू नहीं हो गई ?”
सफेद सूट पर द्वंद्व युद्ध…
कहते हैं अति का भी एक अंत होता है। मरीजों की मजबूरी को अवसर समझकर धंधा चलाने वालों पर यह कहावत इन दिनों खूब फिट बैठती दिख रही है। शहर में एक नया अस्पताल क्या खुला , पुराने और नए सफेद सूट वालों के बीच ऐसा द्वंद्व शुरू हो गया है मानो इलाज नहीं, इज्जत और इलाका दांव पर लगा हो।
दुनिया भर में लोग इन दिनों मिडिल ईस्ट के युद्ध की चर्चा कर रहे हैं, लेकिन कोरबा के बुद्धिजीवी वर्ग की अपनी अलग ही बहस चल रही है। यहां चर्चा बम और मिसाइल की नहीं, बल्कि सफेद कोट और सफेद सूट के बीच चल रहे एक अदृश्य युद्ध की है। यहां बम नहीं फूट रहे, लेकिन आरोप जरूर फूट रहे हैं। यहां मिसाइल नहीं चल रहीं, लेकिन गुगल इंजन में ताबड़तोड़ पोस्ट सर्च हो रही है।
असल कहानी पुरानी है। धंधे की दुनिया में एक कहावत खूब चलती है कि अंधेरे का डर दिखाओ और फिर टॉर्च बेचो। कोरबा में भी यह कला वर्षों से चलती रही। मरीजों को डर, जांच, पैकेज और सलाह के अंधेरे में घुमाकर इलाज की टॉर्च बेची जाती रही। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब इसी बाजार में एक नया खिलाड़ी उतर आया। और जैसे ही पुराने कारोबार की रोशनी पर हल्की सी सेंध लगी, अचानक सोशल मीडिया पर नियम-कानून की किताबें खुलने लगीं। दिलचस्प बात यह है कि शहर में शायद ही कोई ऐसा अस्पताल हो जो हर नियम और हर मानक पर पूरी तरह खरा उतरता हो। फिर भी कुछ लोगों को अचानक नियमों की इतनी तीव्र याद क्यों आने लगी, यह सवाल अब चाय की मेज से लेकर व्हाट्सऐप ग्रुप तक घूम रहा है।
लोग मुस्कुराकर बस इतना कहते हैं कि असली दर्द मरीजों का नहीं, मुनाफे का है। जब टॉर्च बेचने का पुराना बाजार खतरे में पड़ता है, तब नियमों की याद अचानक बहुत तेज हो जाती है।
यहां असली बीमारी नियमों की नहीं, मुनाफे की है। और जब मुनाफे को हल्का सा बुखार आता है तो नियमों का थर्मामीटर तुरंत बाहर निकाल लिया जाता है। इसी बहस के बीच किसी ने मजाक में एक पुराना गीत भी याद दिला दिया। राजेश खन्ना की फिल्म रोटी का वह मशहूर गीत… “यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो, जिसने पाप ना किया हो…” गीत की पंक्ति जैसे ही चर्चा में आई, कई लोग हल्की मुस्कान के साथ चुप हो गए। क्योंकि शहर में सफेद सूट के इस द्वंद्व में शायद ही कोई ऐसा योद्धा होगा जो पूरी तरह बेदाग हो। फिलहाल कोरबा में यह लड़ाई इलाज की कम और इल्जामों की ज्यादा लग रही है। मरीज अब भी अस्पतालों में लाइन में हैं, लेकिन सफेद सूट वाले अपने-अपने मोर्चे पर डटे हुए हैं। और शहर के लोग दूर खड़े होकर बस यही देख रहे हैं कि इस “द्वंद्व युद्ध” में आखिर किसकी टॉर्च ज्यादा तेज रोशनी देती है।
एसपी लेवल पर माइनर सर्जरी
विधानसभा के बजट सत्र के बाद एसपी की एक और ट्रांसफर लिस्ट जारी हो सकती है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में अफीम की खेती से सरकार की किरकिरी हो चुकी है। ट्रांसफर लिस्ट में खास कर बलरामपुर और दुर्ग जिला के अलावा करीब आधे दर्जन से अधिक पुलिस अधीक्षकों के नाम शामिल हैं।
पीएचक्यू में चर्चा है कि प्रदेश में अभी सात एसपी ऐसे हैं जिन्हें एक ही जगह पर कप्तानी संभालते डेढ़ से दो साल पूरे हो गए हैं। उन्हें इधर-से-उधर किया जाएगा।
खबरीलाल की मानें तो रजनेश सिंह, भोजराज पटेल प्रशांत ठाकुर, शलभ सिन्हा, सिद्धार्थ तिवारी, गौरव राय नए जिले में नई पारी की शुरुआत कर सकते हैं।
बताया जा रहा है कि ट्रांसफर लिस्ट में इन अफसरों को ठीकठाक जिले में पोस्टिंग दिलाने के लिए सरकार गुंजाइश बना सकती है।
वीआईपी फार्म हाउस
VIP Farm House : छत्तीसगढ़ में अफीम की खेती का मामला सामने आने के बाद सुशासन वाली सरकार की नजर वीआईपी फार्म हाउस पर टेढ़ी हो गई है।कलेक्टरों से कहा गया है कि वो सभी फार्म हाउस की रिपोर्ट लेकर आएं। अब इसी बात की अफसर बिरादरी में जमकर चर्चा है।
सरकार की टेढ़ी नजर से सबसे ज्यादा परेशानी उन अफसरों को हो रही है जिन्होंने रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग जैसे बड़े जिलों में अपने फार्म हाउस बना रखे हैं।
खबरीलाल की मानें तो प्रदेश में ऐसे कई अफसर हैं जिनके रिश्तेदारों के नाम फार्म हाउस हैं। वैसे तो आईएएस और आईपीएस अफसरों को हर साल अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना होता है, मगर अब की बार मामला सीरियस हो गया है।
कलेक्टरों के सामने परेशानी इस बात की है कि सरकार ने कहा तो जांच करनी ही पड़ेगी, लेकिन बात बिरादरी पर आ गई और जहमत हो जाएगी।फिलहाल देखने वाली बात तो ये होगी कि इन वीआईपी फर्म हाउस की जांच कैसे होने वाली है और रिपोर्ट कब तक सरकार तक पहुंचेगी।




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