खाकी के ‘तेज’ बनाएंगे इमेज या…
वैसे तो खाकी की काबिलियत थानेदार की ‘चाल’ तय करती है, लेकिन इन दिनों पुलिस महकमे में चाल से ज्यादा ‘तेज’ दौड़ने वालों का सिक्का चल रहा है। हाल ही में हुए तबादलों और नई पोस्टिंग के बाद गलियारों में एक ही यक्ष प्रश्न तैर रहा है—क्या ‘तेज’ दागदार गलियों में बेदाग इमेज बना पाएंगे?
पब्लिक का यह सवाल लाजिमी भी है और मौजूं भी। अब तक साहब ट्रैफिक में मखमली कुर्सियां तोड़कर ‘शान की सवारी’ का लुत्फ उठा रहे थे। यह पहला मौका है जब उन्हें ‘दर्री’ जैसे भारी-भरकम थाने का सेहरा पहनाया गया है।
कहने को तो दर्री की तासीर शांत है और यहां शरीफ लोग रहते हैं। लेकिन, शराफत के इसी ओट में कोयला, राखड़ और रेत का “काला-पीला” खेल सबसे ज्यादा फलता-फूलता है। यही वजह है कि दर्री हमेशा से थानेदारों के लिए ‘हॉट केक’ रहा है। चुनौती सिर्फ मालपुआ हजम करने की नहीं है। दर्री अमूमन ट्रेनी IPS अफसरों की पहली पसंद रहा है। यानी, नए थानेदार साहब को केवल जनता और अपराधियों पर ही नहीं, बल्कि ‘सीएसपी’ साहब की पैनी नजरों और मीडिया के कैमरों से भी खुद को बचाकर रखना होगा। रही बात अवैध कारोबार की, तो डीजल से लेकर कोयले की ‘लूट’ तक… सारे रसूखदार और धन्नासेठ इसी इलाके में अपनी जड़ें जमाए बैठे हैं।
ऐसे ‘अंधेर नगरी’ वाले माहौल में, जहां चारों तरफ कालिख बिखरी हो, बिना दाग लगे दमदार थानेदारी कर जाना वाकई बड़े जिगरे का काम है। ‘पुलिस के पंडित’ भी अब चुटकी लेते हुए कह रहे हैं—काजल की इस कोठरी में कोई मौका पाकर ‘निखर’ जाता है, तो कोई ‘बिखर’ जाता है। अब देखना यह है कि ‘तेज’ अपनी इमेज चमकाकर बाजी मारते हैं, या फिर इस कालिख में ‘नौ दो ग्यारह’ हो जाते हैं!
इंजीनियर साहब का ‘सर्वव्यापी’ अवतार!
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) में इन दिनों एक ऐसे ‘सुपरह्यूमन’ इंजीनियर साहब अवतरित हुए हैं, जिनकी कार्यशैली देखकर आधुनिक विज्ञान भी कोमा में चला जाए। आम इंसान तो एक वक्त पर एक ही जगह रह सकता है, लेकिन इन साहब का जलवा ऐसा है कि वे एक ही समय पर चार-चार जिलों के क्षितिज पर चमक रहे हैं। कागज़ों की दुनिया देखिए—मूल पदस्थापना बिलासपुर में, अटैचमेंट जांजगीर में, महात्वाकांक्षी योजना का जिम्मा शक्ति में और अतिरिक्त प्रभार चौथे कोरबा जिले में! अब आम जनता पंचांग लेकर बैठी है कि साहब आज किस ग्रह (जिले) में गोचर कर रहे हैं।
विभाग की इस अगाध श्रद्धा को देखकर लगता है मानो उन्होंने एक अकेले अधिकारी में ही ‘चतुर्भुज भगवान’ की क्षमताएं तलाश ली हैं। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि जब साहब की आत्मा चार दिशाओं में बंटी हो, तो काम में ‘क्वालिटी’ आएगी या सिर्फ गाड़ी का ‘डीजल बिल’? क्या साहब सचमुच ‘टाइम ट्रैवल’ करके हर जगह प्रकट होते हैं, या फिर उनकी अनुपस्थिति में फाइलें खुद ही समझदार होकर दस्तखत कर लेती हैं?
विभाग का उन पर विश्वास भी कमाल का है। लगता है जैसे पूरी इंजीनियरिंग बिरादरी में योग्य अधिकारियों का अकाल पड़ गया हो और विभाग को चार जिलों का भाग्य एक ही कंधे पर टिका दिखाई दे रहा हो। ऐसा विश्वास तो शायद माता-पिता भी अपने होनहार बच्चों पर नहीं करते, जितना विभाग साहब पर कर रहा है।
दिलचस्प विरोधाभास यह भी है कि जहां एक तरफ कई योग्य और डिग्रीधारी इंजीनियर दफ्तरों में मक्खियां मार रहे हैं और काम मिलने की प्रतीक्षा में बूढ़े हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विभाग का ‘अंधविश्वास’ कुछ चुनिंदा कंधों पर इतना भारी है कि पूरा तंत्र उन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहा है। इससे तो यही संदेश जाता है कि विभाग में या तो अकाल पड़ा है, या फिर ‘सिटिंग-सेटिंग’ का खेल इतना तगड़ा है कि दूसरा कोई उस जादुई घेरे में एंट्री ही नहीं पा सकता।
‘सुशासन’ के इस अद्भुत और चमत्कारी मॉडल ने कम से कम इतना तो सिद्ध कर ही दिया है कि यहाँ एक अकेला अधिकारी चार जिलों का बोझ अपनी रीढ़ की हड्डी पर उठा सकता है और अंधा सिस्टम इसे ‘दक्षता’ मानकर ताली बजा सकता है। अब यह साहब की मजबूरी है, विभाग की लाचारी है या फिर मलाईदार विभागों को आपस में बांटने की कोई नई ‘इंजीनियरिंग’, इसका जवाब तो खुद विभाग के नियंता ही दे सकते हैं। तब तक जनता तो बस यही गा रही है—“कण-कण में व्यापे हैं भगवान, और जिले-जिले में इंजीनियर साहब महान!”
आबकारी मंत्री का अर्थशास्त्र
प्रदेश के आबकारी मंत्री लखनलाल देवांगन के अर्थशास्त्र की इस वक्त सोशल मीडिया में जबरदस्त चर्चा है। इसका एक वीडियो सामने आया है, जिसमें आबकारी मंत्री शराब बिक्री की वकालत करते हुए यह कहते नजर आ रहे हैं कि शराब से कमाई होगी तभी तो योजनाएं चलेंगी। जितनी ज्यादा शराब बिकेगी, उतना ज्यादा विकास होगा?
शराब की बिक्री से जो कमाई होती है, उससे महतारी वंदन योजना, एमएसपी और आवास योजना में गरीबों के लिए घर बनाने पर खर्च किया जा रहा है। आबकारी मंत्री की मानें तो अगर शराब नहीं बेचें, तो योजनाएं कैसे चलेंगी? जिसके बाद सोशल मीडिया में कमेंट्स की बाढ़ आ गई है। लोग आबकारी मंत्री के अर्थशास्त्र पर सवाल उठा रहे हैं। एक ने लिखा है कि महतारी वंदन योजना को माताओं-बहनों के सम्मान और आर्थिक संबल का माध्यम बताया गया था, लेकिन मंत्री जी के बयान ने भाजपा सरकार की सोच उजागर कर दी। क्या प्रदेश के विकास का आधार उद्योग, शिक्षा, रोजगार और निवेश नहीं होना चाहिए था? भाजपा सरकार उसे शराब की बिक्री से जोड़कर आखिर क्या संदेश देना चाहती है?
अब INC Chhattisgarh ने मंत्री लखनलाल देवांगन के इसी बयान को लेकर सवाल उठाए हैं। जिसमें एक महिला ने लिखा है कि, “चुनाव के समय बीजेपी ने वादा किया था कि विवाहित महिलाओं को पैसे मिलेंगे। सरकार की तरफ से हर महीने पैसे भी मिल रहे हैं। लेकिन, हम अपने बेटे, पति और भाइयों को शराब के कारण मरते नहीं देख सकते। शराब की दुकानें बंद कर दो, हमें योजना के पैसे नहीं चाहिए।” अब देखना है कि आबकारी मंत्री के अर्थशास्त्र पर सरकार क्या कदम उठाती है।
माली से इंजीनियर तक का चमत्कार!
नगर निगम में इन दिनों ‘सुशासन’ का एक अनोखा प्रयोग देखने को मिल रहा है, जहाँ तकनीकी कार्यों की कमान विशेषज्ञों के बजाय गैर-तकनीकी हाथों में सौंप दी गई है। हालात यह हैं कि कल तक जो अधिकारी उद्यान और पौधों की देखरेख में मसरूफ था, वह आज महत्वपूर्ण तकनीकी फाइलों का ‘भाग्यविधाता’ बन बैठा है।
कहते हैं कि जब व्यवस्था में सिस्टम, सिटिंग और सेटिंग का त्रिवेणी संगम हो जाए, तो पद और पात्रता की परिभाषाएं बदलते देर नहीं लगती। परिणामतः, डिग्रीधारी इंजीनियर मूकदर्शक बने हुए हैं और बड़े फैसलों का रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि यदि तकनीकी ज्ञान और अनुभव की कोई अहमियत ही नहीं बची, तो फिर बरसों की पढ़ाई, विशेषज्ञता और डिग्रियों का क्या औचित्य? ऐसा प्रतीत होता है कि निगम में अब प्रशासनिक योग्यता नहीं, बल्कि ‘कृपा-दृष्टि’ ही सबसे बड़ी डिग्री बन चुकी है। यहाँ नियम-कायदे सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ा रहे हैं और व्यवस्थाएं रसूखदारों की सुविधानुसार नया चोला ओढ़ रही हैं।
दिलचस्प विरोधाभास यह भी है कि जिस तंत्र में पौधों की छंटाई का अनुभव, इंजीनियरिंग के तकनीकी परीक्षण पर भारी पड़ जाए, वहाँ फाइलें भी योग्यता के बल पर नहीं, बल्कि रसूख और रजामंदी देखकर आगे बढ़ती हैं। सिविल इंजीनियरिंग के सिद्धांत भले ही कुछ और कहते हों, लेकिन निगम का अपना एक अलग ही ‘पॉलीटिकल साइंस’ चल रहा है।
सुशासन के इस नए मॉडल ने कम से कम इतना तो सिद्ध कर ही दिया है कि निगम प्रशासन में “होनी को अनहोनी और अनहोनी को होनी” करने की अद्भुत कला विकसित हो चुकी है। आखिर चमत्कार भी तो वहीं होते हैं, जहाँ व्यवस्था से सवाल पूछने वाले मौन हों और मनमानी करने वाले प्रधान!
राहुल की चुनावी क्लास
Rahul’s Election Masterclass दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद से कांग्रेस पूरी तरह चुनावी मोड में नजर आ रही है। छत्तीसगढ़ में भी दो साल बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और करीब छह महीने बाद लोकसभा चुनाव। यूथ कांग्रेस के चुनाव और अभनपुर में डीसीसी अध्यक्षों के प्रशिक्षण कार्यक्रम के साथ इसकी शुरुआत भी हो रही है। संगठन के साथ-साथ नए युवा चेहरों पर दांव लगाने के लिए पार्टी तैयार दिख रही है। खुद राहुल गांधी भी इसमें शामिल होंगे।
मल्लिकार्जुन खरगे, केसी वेणुगोपाल के अलावा प्रदेश के बड़े नेता भी डीसीसी अध्यक्षों को चुनाव जीतने के गुर सिखाएंगे। हालांकि, पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज का कार्यकाल पूरा होने के बाद नए अध्यक्ष के चुनाव को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच पेंच फंसा हुआ है। मगर बैज जिस आत्मविश्वास के साथ पीसीसी चला रहे हैं, उससे लगता है कि वे आगे भी इस पद पर बने रह सकते हैं।
यूथ कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के लिए दिल्ली में इंटरव्यू चल रहे हैं। जो इसमें सफल होंगे, उन्हें पार्टी आने वाले चुनावों के लिए तैयार करेगी। दिल्ली की ओर से साफ संकेत दिया गया है कि इस बार संगठन और टिकट वितरण में प्रदेश के बड़े नेताओं के कोटा सिस्टम की जगह डीसीसी अध्यक्षों की राय को अधिक महत्व दिया जाएगा। कुल मिलाकर, राहुल की क्लास में मिशन 2028 का सिलेबस तैयार है। जो डीसीसी अध्यक्ष इसमें ज्यादा नंबर लाएगा पार्टी उसी को आगे बढ़ाएगी।
✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा





