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Two-day visit 3-month extension: पुलिस पोस्टिंग पुराण : सरहद, सिस्टम, संकेत..ब्रांड एंबेसडर की प्रतीक्षा या एक्सटेंशन की दीक्षा,प्रेस क्लब के बाद बरबसपुर: मंच बदला..खिलाड़ी नहीं,डीईओ का डमरू और…


पुलिस पोस्टिंग पुराण : सरहद, सिस्टम, संकेत

 

Korba Police Posting Puran “देखन में छोटे लगे, घाव करे गंभीर”… पुलिस महकमे में इन दिनों यही कहावत सबसे ज्यादा प्रासंगिक दिखाई दे रही है। साहब को कोयलांचल में पदस्थ करने के लिए सरहद की जिम्मेदारी एक सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) के हवाले कर दी गई। उधर, सरहदी थानेदार की कबाड़ जंक्शन में एंट्री होते ही कोयलांचल के कई थानों की कुर्सियां हिलने लगी हैं।

सरहद हमेशा से केवल भौगोलिक रेखा नहीं रही, वह अनुभव, धैर्य और निर्णय क्षमता की परीक्षा भी मानी जाती है। इसलिए वहां तैनाती अक्सर उन कंधों को मिलती थी, जिन्होंने समय की धूप और जिम्मेदारियों की धूल साथ-साथ झेली हो। मगर समय का स्वभाव है कि वह परंपराओं से ऊब जाता है। इस बार उसने नया अध्याय लिख दिया।

इस बार सरहद की जिम्मेदारी एएसआई के भरोसे छोड़ने का फैसला महकमे में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। सवाल फैसले से ज्यादा उसके संदेश पर उठ रहे हैं, क्योंकि एक आदेश ने यह एहसास करा दिया कि अब महकमे में कुछ भी “असंभव” नहीं रहा लेकिन व्यवस्था का अपना दर्शन है, वह हर निर्णय को प्रशासनिक आवश्यकता कहती है ।

चर्चा तो इस बात की है कि अब पोस्टिंग फाइलों से कम और “सिस्टम के मूड” से ज्यादा तय होती है। वर्षों तक धूप, धूल और जोखिम के बीच सेवा देने वाले अधिकारी अब अपनी सीआर से ज्यादा तबादला सूची का अध्ययन कर रहे हैं। उन्हें अपनी उपलब्धियों से अधिक अगली सूची में अपने नाम का इंतजार है।सबसे दिलचस्प बात यह है कि हर नई पोस्टिंग कुछ चेहरों पर मुस्कान और कई चेहरों पर बेचैनी छोड़ जाती है। किसी की पदस्थापना दूसरे की चिंता बन जाती है। महकमे की सबसे असुरक्षित चीज अगर कोई है, तो वह कुर्सी है, क्योंकि उसे भी नहीं पता कि उसका अगला मालिक कौन होगा।
फिलहाल पुलिस महकमे का संदेश साफ नजर आता है। योग्यता, अनुभव और वरिष्ठता आज भी सम्मानित शब्द हैं, लेकिन पोस्टिंग की शब्दावली में उनका महत्व हर नई सूची के साथ बदलता दिखाई देता है। काबिल अफसर अब भी कतार में खड़े हैं और इंतजार सिर्फ एक आदेश का नहीं, बल्कि उस तर्क का भी कर रहे हैं जो कभी इन आदेशों की पहचान हुआ करता था। महकमे में चल रहे प्रयोग को देख जनमानस कहने लगे है पुलिसिंग में कम होते की धार की असली वजह पोस्टिंग है।

 

ब्रांड एंबेसडर की प्रतीक्षा या एक्सटेंशन की दीक्षा ?

 

Korba Brand Ambassador Extension नगर निगम की अपनी एक अलग लोककथा है। यहां विकास की कहानी धरातल पर कम और कुर्सियों पर अधिक लिखी जाती है। एक खास कुर्सी है अधीक्षण अभियंता की, जिसे निगम का “ब्रांड एंबेसडर” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सुरेश बरुआ के सेवानिवृत्त होते ही निगम के गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक एक ही सवाल खुसुर-फुसुर में तैर रहा है, भूषण उरांव बनेंगे नए ब्रांड एंबेसडर या फिर बरुआ की वापसी होगी?

असल में नगर निगम में इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा चर्चा इसी कुर्सी की है। यह कोई साधारण पद नहीं, बल्कि ऐसा पावर सेंटर है जहां बैठते ही इंजीनियर कम और सिस्टम के “ब्रांड एंबेसडर” ज्यादा नजर आने लगते हैं। कहते हैं यहां सीमेंट, सरिया और सड़क से ज्यादा ठेकेदारों की किस्मत की ढलाई होती है।

बरुआ के रिटायर होते ही भूषण उरांव की उम्मीदों ने उड़ान भर ली है। समर्थक तो उन्हें अभी से बधाइयां देने की तैयारी में हैं। लेकिन सरकारी कुर्सियां शादी के मंडप की दुल्हन नहीं होतीं कि जयमाला पड़ते ही विदा हो जाएं। यहां तो फेरों से पहले ही दूल्हा बदल जाने का भी इतिहास रहा है।

इधर सुरेश बरुआ भी कथा से पूरी तरह विदा नहीं हुए हैं। वे भले रायपुर की ओर प्रस्थान कर गए हों, किंतु निगम के गलियारों में “एक्सटेंशन महापुराण” का पाठ अब भी जारी है। यदि कृपा का कोई नया अध्याय खुल गया, तो उरांव के सपने किसी नोटशीट के कोने में लगी पिन बनकर रह सकते हैं।

और अगर एक्सटेंशन नहीं भी मिला, तब भी राह आसान नहीं है। इस कुर्सी तक पहुंचने के लिए सिर्फ इंजीनियरिंग की डिग्री काफी नहीं होती। यहां तो ऐसी विलक्षण प्रतिभा चाहिए जो नियमों की किताब भी पढ़े और समीकरणों की भाषा भी समझे। पानी में उतरकर भी कपड़े सूखे रखने की कला हो, हर ठेकेदार मुस्कुराता रहे और हर फाइल बिना शोर-शराबे के मंजिल तक पहुंच जाए।

उधर प्रदेश स्तर के कई दावेदार भी इस मलाईदार कुर्सी पर नजरें गड़ाए बैठे हैं। किसी के पास अनुभव का दावा है, किसी के पास संपर्कों की ताकत, तो कोई आशीर्वाद की सीढ़ी लेकर दौड़ में शामिल है। ऐसे में नगर निगम में विकास कार्यों की गति चाहे जैसी हो, अधीक्षण अभियंता की कुर्सी तक पहुंचने की दौड़ पूरे वेग से चल रही है।अब देखना यह है कि नगर निगम को सचमुच नया “ब्रांड एंबेसडर” मिलता है या फिर पुराने चेहरे पर समय का नया पोस्टर चिपकाकर व्यवस्था एक बार फिर यह साबित कर देती है कि यहां बदलती केवल तारीखें हैं, कथाएं नहीं।

 

प्रेस क्लब के बाद बरबसपुर: मंच बदला..खिलाड़ी नहीं

 

Press Club Barbaspur Politics कोरबा के बरबसपुर में नई शराब दुकान खोलने के प्रस्ताव से भड़के पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल का गुस्सा केवल बरबस बोल नहीं थे, बल्कि उसके पीछे उन महिलाओं का अपार समर्थन भी था, जो वहां रात-दिन भूखी-प्यासी बैठी थीं। हालांकि उन्होंने गुस्सा आबकारी विभाग के अफसर पर निकाला, मगर असल निशाना कहीं और था।

अभी हाल ही में कोरबा प्रेस क्लब के शपथ ग्रहण समारोह में जयसिंह और डिप्टी सीएम अरुण साव के सामने विकास और चुनावी नतीजों को लेकर तीखी नोकझोंक हुई थी। तब उस मंच पर लखनलाल देवांगन भी मौजूद थे। पूर्व मंत्री के तेवर से डिप्टी सीएम भी असहज हो गए थे। चूंकि मामला प्रेस क्लब का था, इसलिए बात संभल गई। अब बरबसपुर में नई शराब दुकान खोलने के मामले में फिर से पूर्व मंत्री के निशाने पर लखनलाल देवांगन आ गए हैं।

इस बार मामला प्रेस क्लब का नहीं, बल्कि पब्लिक प्लेस का है। पूर्व मंत्री का साफ कहना है कि बरबसपुर में किसी भी कीमत पर शराब दुकान नहीं खुलने दी जाएगी और जरूरत पड़ने पर बड़ा आंदोलन किया जाएगा। अब आबकारी मंत्री लखनलाल देवांगन सफाई देते फिर रहे हैं कि अभी तक दुकान खोलने का कोई निर्णय नहीं हुआ था। आबकारी विभाग की टीम केवल संभावित जगह देखने गई थी।

चाहे जो हो, अब मामला केवल जगह देखने या दिखाने से आगे निकल गया है। कोरबा में इस बात की चर्चा है कि प्रेस क्लब के बाद बरबसपुर में केवल मंच बदला..खिलाड़ी नहीं। अब देखना होगा कि बरबसपुर में किसकी कितनी चलती है।

डीईओ का डमरू और…

 

DEO Damru Korba शिक्षा विभाग में इन दिनों डीईओ का डमरू पूरे सुर में बज रहा है। ताल ऐसी कि एक खास वर्ग शिव तांडव में मग्न है और उसकी गूंज सीधे बड़े साहब के दफ्तर तक सुनाई दे रही है।

यहां डमरू की थाप पर नृत्य ज्ञान का नहीं, कृपा का हो रहा है, और जो इस लय से बाहर हैं, वे ताल खोजते साहब के दरबार पहुंच गए। फिर क्या था..बड़े साहब ने अनुशासन का त्रिशूल उठाते हुए कारण बताओ नोटिस थमा दिया, लेकिन बीईओ से डीईओ बने पंडित जी ने उसे ऐसे किनारे रख दिया, मानो सरकारी आदेश नहीं, व्हाट्सऐप पर आया कोई “देख लीजिए” वाला संदेश हो।

अब विभाग के गलियारों में यही कथा लोकगीत बनकर गूंज रही है कि साहब अपने ही राग के साधक हैं। टीएल बैठक की फटकार हो, कारण बताओ नोटिस हो या ऊपर से आदेश..सब उनकी दृष्टि में एक ही आलाप के अलग-अलग स्वर हैं। इसलिए न डमरू की थाप बदली, न तांडव का उत्साह।

सूत्रधार की माने तो पूरा खेल सरकारी किताबों के वितरण का है। नियम कहता है कि सभी निजी स्कूलों को बराबरी का हक मिले, लेकिन चर्चा है कि बराबरी का तराजू कुछ स्कूलों के दरवाजे पर जाकर ही रुक गया। वहां किताबें मानो “होम डिलीवरी” से पहुंचीं, जबकि बाकी स्कूलों से कहा गया, “जरूरत है तो खुद ले जाइए।” शिक्षा विभाग यहां बच्चों को समानता का पाठ पढ़ाने से पहले शायद सुविधा का नया पाठ्यक्रम लागू करने में जुटा दिखा।
जब उपेक्षित स्कूल संचालकों का धैर्य जवाब दे गया तो शिकायत कलेक्टर दरबार पहुंची। बड़े साहब ने मामला गंभीर मानते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया और व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए। लेकिन विभाग में चर्चा है कि नोटिस फाइल में जरूर चढ़ा, असर जमीन पर उतरने से पहले ही कहीं गायब हो गया।
अब शिक्षा भवन के गलियारों में सिर्फ एक सवाल घूम रहा है। बड़ा कौन? साहब का आदेश या डमरू की धुन? क्योंकि जब नोटिस के बाद भी चाल, चरित्र और चेहरा जस का तस रहे, तो लोग यह पूछने लगते हैं कि आखिर यह आत्मविश्वास है या किसी अदृश्य संरक्षण का प्रसाद?देखना दिलचस्प होगा कि आखिर अनुशासन का त्रिशूल भारी पड़ता है या डमरू की थाप पर चलता यह पूरा खेल। फिलहाल डमरू बज रहा है। तांडव अपने चरम पर है।

 

दो दिन का दौरा… 3 महीने का एक्सटेंशन

 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय दो दिन पहले दो दिवसीय दिल्ली यात्रा से लौटे हैं। दिल्ली में उनकी मुलाकात पीएम, गृहमंत्री और पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से हुई। इस मुलाकात में साय छत्तीसगढ़ के लिए कई सौगातें तो लेकर आए, मगर सबसे बड़ी सौगात उन मंत्रियों के लिए लेकर आए, जिन्हें अपना परफॉर्मेंस सुधारने के लिए दो महीने का अल्टीमेटम मिला था। खबरीलाल की मानें तो जिन मंत्रियों पर कैबिनेट विस्तार में हटाए जाने की तलवार लटक रही थी, उन्हें तीन महीने का एक्सटेंशन मिल गया है।

सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में सरकार और संगठन के बीच समन्वय को लेकर पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ लंबी चर्चा हुई। इसके बाद सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि कैबिनेट विस्तार फिलहाल नवंबर तक टल गया है। राज्योत्सव के बाद कैबिनेट विस्तार होगा।

दिल्ली में सरकार और संगठन के समन्वय को लेकर हुई चर्चा का असर सीएम के रायपुर लौटते ही दिखने लगा है। पार्टी के प्रदेश कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में कार्यकर्ताओं की बात सुनने के लिए मंत्रियों की ड्यूटी लगा दी गई है।

आज यानी 3 से 7 अगस्त तक कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में कैबिनेट मंत्रियों के बैठने का सिलसिला चलेगा। यहां मंत्री दोपहर 3 से 5 बजे तक प्रदेशभर से आने वाले कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनेंगे। कार्यकर्ताओं को परेशानी न हो, इसके लिए पंजीयन और टोकन जारी किए जाएंगे। किस मंत्री के विभाग में कितनी शिकायतें मिलीं, इसका बहीखाता दिल्ली तक भेजा जाएगा। इसी आधार पर अगले कैबिनेट विस्तार में मंत्रियों का हिसाब-किताब होगा।

     ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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