
निरीक्षण देवो भव.. थानों में राग भैरवी
inspection culture Chhattisgarh : बिलासपुर रेंज के थानेदारों के टेबल की सूरत अचानक बदलने लगी है। हिसाब-किताब की डायरी की जगह भजन पुस्तिका रखी जा रही है। थानों में अचानक आया यह आध्यात्मिक जागरण बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक के दौरे से पहले हो रहा है, जिसकी चर्चा पूरे महकमे में है।
वैसे भी कोरबा जिले के थानेदारों में भक्तिभाव कुछ ज्यादा दिखता है। थानों के बाहर हनुमान मंदिर हैं। हवालात के गेट पर किसी की नजर न लगे, इसके लिए नींबू-मिर्च का टोटका पहले से चल रहा है, जो बुरी नजर वालों को थानों में एंट्री नहीं करने देता।
मगर इस बार “निरीक्षण देव” आने वाले हैं। इसके लिए वास्तु दोष से बचने के लिए थानेदारों ने अपने टेबल में बदलाव कर लिया है। थानों की दीवारों को चमकाया जा रहा है। कोने पर पड़ी धूल-भरी फाइलें सलीके से अलमारी में सज गई हैं। फिटनेस का भी ख्याल रखा जा रहा है।
कुल मिलाकर “निरीक्षण देव” के लिए थानों को तैयार किया जा रहा है। असल में बिलासपुर रेंज के आईजी का स्टाइल ऐसा है कि वे कब किस थाने में अवतार ले लें, इसकी जानकारी महकमे को भी नहीं होती। ऐसे में पुराने टोटके काम नहीं आएंगे, इसलिए आध्यात्मिक जागरण जरूरी हो गया है। देखिए, आगे होता है क्या!
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स्वाति छुट्टी पर और प्रमोशन की आस
Swati promotion चातक पक्षी की कथा तो सबने सुनी है स्वाति नक्षत्र की एक बूंद के इंतजार में आसमान निहारता रहता है। नगर निगम के कुछ अफसर इन दिनों ठीक उसी मुद्रा में हैं। नजर ऊपर टिकी है, फाइल नीचे दबी है और मन में एक ही जाप“प्रमोशन… प्रमोशन…”। फर्क बस इतना है कि यहां बादल नहीं, ऊपर वाली कुर्सी से इजाजत बरसती है… और इस बार वो बरसात जैसे रूठ गई है और स्वाति नक्षत्र भी छुट्टी पर है।
कहानी में ट्विस्ट भी कम नहीं है। जनवरी में बड़ी उम्मीदों के साथ मुख्यालय भेजी गई प्रमोशन फाइल अब चार महीने से “ध्यान साधना” में इस प्रकार से तल्लीन है कि बड़े बड़े साधु संत भी।पानी पानी हो जाए। हाल ये है कि कुछ अफसर इंतजार करते-करते रिटायर हो गए, और कुछ रिटायरमेंट की चौखट पर खड़े हैं लेकिन फाइल है कि टस से मस नहीं हुई है।खबरीलाल की मानें तो असली कारण योग्यता नहीं, “कुर्सी का कंपन” है। ऊपर वाले साहब को डर है कि नीचे वालों का लेवल बढ़ा, तो उनकी कुर्सी का संतुलन न डोल जाए। ऐसे में प्रमोशन की बारिश रोक दी गई है कहीं किसी और की हरियाली उनकी जमीन पर छाया न डाल दे। उधर फाइल ने भी जैसे संन्यास ले लिया है। किसी कोने में चुपचाप पड़ी है, मानो उसे मंजूरी नहीं, “रोक” का वरदान मिला हो। इधर अफसर चातक बने आसमान ताक रहे हैं, उधर फाइल नागिन बनकर कुंडली मारे बैठी है। और बीच में साहब का मौन संदेश साफ है “मेरा नहीं तो किसी का नहीं।” कहा तो यह भी जा रहा कि नगर निगम में इन दिनों कामकाज से ज्यादा “कुर्सी का गणित” चल रहा है। यहां काबिलियत बाद में देखी जाती है, पहले देखा जाता है संतुलन किसकी कुर्सी कितनी मजबूत है और किसकी कितनी हिल सकती है।।कहते हैं, सिस्टम कभी रुकता नहीं। लेकिन यहां सिस्टम नहीं, फाइल रुकी है… और उसके साथ कई अफसरों का भविष्य भी“पेंडिंग” में अटका पड़ा है। अफसरो के नीति को देख अधिकारी कहने लगे है प्रमोशन की आस तो है लेकिन साहब को किसी का बढ़ा ओहदा रास नही है।
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ऊपर से राम-राम, भीतर से कसाई काम…
पुरानी कहावत है “विष कुंभ भरा कनक घट जैसे।” कभी ये पंक्तियां ग्रंथों की शोभा बढ़ाती थीं, आजकल ये सीधे जिला उद्यानिकी विभाग के गलियारों में लाइव टेलीकास्ट हो रही हैं। बाहर से ऐसा सुसंस्कृत वातावरण कि लगे सेवा ही सर्वोपरि है, फाइलों पर मुस्कान, शब्दों में शहद, और योजनाओं में सब्सिडी का ऐसा रंगीन सपना कि किसान हरियाली से पहले ही भावुकता में लहलहा कर लहालोट हो जाए।लेकिन जैसे ही परतें हटती हैं, कहानी बदल जाती है। वही पुराना राग ऊपर से राम-राम, भीतर से कसाई काम..!
सब्जी खेती के नाम पर ग्रीन हाउस लगाने की योजना कागजों में तो खेतों को हरा-भरा बना चुकी है, मगर जमीन पर तस्वीर कुछ और ही है। किसान पहले “सहयोग राशि” के नाम पर श्रद्धांजलि अर्पित करता है, फिर चेक के जरिए सब्सिडी का ऐसा गणित सामने आता है कि लाभ कम, उलझन ज्यादा नजर आती है। उसे समझ ही नहीं आता कि योजना का हितग्राही है या किसी सुनियोजित प्रक्रिया का पात्र।।यहां खेती से ज्यादा “कटाई” होती दिख रही है फसल की नहीं, भरोसे की। किसान उम्मीद लेकर आता है, अनुभव लेकर लौटता है।
वह समझ नहीं पाता है कि योजना का लाभार्थी है या किसी प्रयोगशाला नमूना। सब्सिडी का सपना अक्सर कागजों में ही पका रह जाता है, और हकीकत में उसे दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
हालत यह है कि खेत में फसल उगे न उगे, लेकिन शिकायतों की फाइलें खूब लहलहा रही हैं। हर आवेदन में एक जैसी कहानी “साहब, हमें लाभ चाहिए, सीख नहीं।”मुद्दा योजना का नहीं, उस “कला” का है जो योजना के नाम पर विकसित हो चुकी है। यह हुनर किसी कृषि विश्वविद्यालय में नहीं सिखाया जाता, यह सिस्टम की गोद में पलता है जहां नियम कम और गणित ज्यादा चलता है।
कहावतें यूं ही नहीं जन्म लेतीं। जब सच्चाई बार-बार एक ही रूप में सामने आती है, तब “कनक घट में विष” जैसी पंक्तियां आकार लेती हैं। और फिलहाल हालात ऐसे हैं कि यह घड़ा सिर्फ भरा नहीं है… छलक भी रहा है।
36 गढ़ में 50-50
प्रदेश में छत्तीसगढ़िया ओलंपिक और खेलो इंडिया गेम्स खत्म हो गए… लेकिन सत्ता के मैदान में आईपीएल की तर्ज पर 50-50 वाला एक और मुकाबला शुरू होने जा रहा है। इस टूर्नामेंट में मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड देखकर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यह फैसला लेगा कि बाकी ढाई साल में सीएम विष्णुदेव साय की टीम में बैटिंग करने का मौका किसे मिलेगा।
इसे 50-50 टूर्नामेंट इसलिए कहा जा सकता है कि प्रदेश की बीजेपी सरकार के ढाई साल पूरे हो गए हैं और बाकी बचे ढाई साल में सरकार अपना परफॉर्मेंस बनाए रखना चाहती है। 4 मई को 5 राज्यों के चुनावी नतीजे आने के बाद यह टूर्नामेंट शुरू हो सकता है।
खबरीलाल की मानें तो छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि भाजपा शासित अन्य राज्यों में, जहां 2028 में विधानसभा चुनाव होना है, वहां भी कैबिनेट में बदलाव हो सकता है। बीजेपी चुनाव से पहले गुजरात मॉडल लागू कर चुकी है, जहां आधे कार्यकाल में पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया गया था। यही फार्मूला लोकसभा चुनाव में भी दिखा, जब अधिकांश मौजूदा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों पर दांव खेला गया और नतीजे पार्टी के पक्ष में आए।
छत्तीसगढ़ में 2018 के चुनाव में पुराने की जगह नए चेहरों को मौका देकर पार्टी जीत का स्वाद चख चुकी है। कैबिनेट में भी बड़े चेहरों को दरकिनार कर नए लोगों को मौका दिया गया। लेकिन अब चुनावी साल में कैबिनेट में बदलाव की तैयारी है। अंदरखाने की खबर है कि कुछ मंत्रियों का प्रदर्शन औसत रहा है। सूत्रों की मानें तो 2028 के चुनाव से पहले कैबिनेट फेरबदल से बीजेपी फिर चौंका सकती है।
सुशासन तिहार से पहले शीर्षासन
पांच राज्यों में चुनाव चल रहे हैं और इसमें प्रदेश के 30 आईएएस-आईपीएस अफसर पर्यवेक्षक बनाए गए हैं। इनमें कई विभागों के सचिव भी शामिल हैं। ऐसे में फिलहाल आईएएस और आईपीएस के प्रभार में होने वाला बदलाव एक महीने के लिए टल गया है।
पहले खबर आई थी कि सत्र के बाद कलेक्टर-एसपी की एक तबादला सूची निकलने वाली है, मगर चुनाव की वजह से यह फाइल से बाहर नहीं आ पाई।
अगले महीने की 4 तारीख को नतीजे आने के बाद ये अफसर लौटेंगे, उसके बाद ही सरकार यह सूची जारी कर सकती है। वैसे भी मई माह में सीएम का सुशासन तिहार शुरू होना है, तो अफसरों की धुकधुकी बढ़ी हुई है।
पिछले सुशासन तिहार में आए प्रकरणों का क्या हुआ, सीएम और मंत्रियों की घोषणाओं का क्या हुआ इसकी मॉनिटरिंग मंत्रालय से हो रही है। ऐसे में जिन जिलों के रिजल्ट कमजोर हैं, वहां अफसरों की अदलाबदली हो सकती है।
फिलहाल सुशासन तिहार में अभी 25 दिन बाकी हैं, मगर जो अफसर इससे प्रभावित होने वाले हैं, वे सुशासन तिहार से पहले शीर्षासन की मुद्रा में आ गए हैं।





