कोरबा। ChhattisgarhPolitics कहते हैं कि सरकारी तंत्र में जब अपनी गर्दन फंसती है, तो बलि का बकरा हमेशा छोटे या अन्य अधिकारियों को बनाया जाता है। नगर पालिक निगम कोरबा के सुपीरियर अफसरों ने इस कहावत को हूबहू चरितार्थ कर दिया है। मामला महापौर और सभापति के प्रोटोकॉल और ‘अपमान बनाम सम्मान’ की जंग से जुड़ा है, जहां गलती किसी और विभाग की थी, लेकिन नोटिस थमा दिया गया निगम सचिव को!

जानकारों का साफ कहना है कि निगम के लोकार्पण और भूमिपूजन कार्यक्रमों की जमीनी जवाबदारी जोन कमिश्नरों की होती है। ऐसे में उन्हें छोड़कर सचिव ( जो कार्यालय अधीक्षक है) को नोटिस जारी करना समझ से परे है। निगम की इस अजीबोगरीब कार्यप्रणाली को देखकर शहर के प्रबुद्ध नागरिक चटखारे लेकर कह रहे हैं— “ये तो वही बात हुई… करे कोई और भरे कोई!”
क्या है पूरा मामला? क्यों सुलग रही है सियासत की आग?
बीती 6 जून को नगर पालिक निगम कोरबा द्वारा विभिन्न चौक-चौराहों पर लोकार्पण कार्यक्रमों और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों के लिए चार्जिंग सेंटर का भव्य उद्घाटन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री लखन लाल देवांगन थे।
सरकारी प्रोटोकॉल के मुताबिक, निगम के इस बड़े आयोजन में शहर के प्रथम नागरिक यानी महापौर श्रीमती संजू देवी राजपूत और सभापति नूतन सिंह ठाकुर को ससम्मान आमंत्रित किया जाना था। लेकिन, निगम प्रशासन की घोर लापरवाही या ‘राजनीतिक दुर्भावना’ के चलते इन दोनों ही गरिमामय पदों को आमंत्रण तक नहीं भेजा गया।
कुर्सी छोड़ जमीन पर बैठे सभापति, जताया अनूठा विरोध
इस घोर उपेक्षा और अपमान को लेकर 7 जून को ही सभापति नूतन सिंह ठाकुर ने अपनी तीखी नाराजगी जाहिर कर दी थी। शनिवार और रविवार का अवकाश बीतने के बाद, 8 जून (सोमवार) को निगम कार्यालय खुलते ही एक अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला।अपनी चेतावनी पर अडिग रहते हुए सभापति नूतन सिंह ठाकुर ने अपने कक्ष की आलीशान शासकीय कुर्सी छोड़ दी। वे जमीन पर दरी बिछाकर बैठे और दिनभर का पूरा कामकाज वहीं से निपटाया। गांधीवादी तरीके से किए गए इस अनूठे विरोध ने निगम प्रशासन की चूलें हिलाकर रख दी हैं।
अंदर की बात: ‘साहब’ को बचाने के लिए सचिव की बलि?
निगम के गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि आखिर प्रोटोकॉल की इस महा-लापरवाही का असली विलेन कौन है?।नियम क्या कहता है? किसी भी वार्ड या जोन में होने वाले भूमिपूजन/लोकार्पण की पूरी जिम्मेदारी वहां के जोन प्रभारी और संबंधित अधिकारियों की होती है। अतिथियों की सूची से लेकर आमंत्रण पत्र बंटवाने तक का जिम्मा उन्हीं का था।
सूत्रधार की माने तो अपनी प्रशासनिक नाकामी को छुपाने और उच्च स्तर पर खुद को बचाने के लिए आनन-फानन में निगम सचिव को नोटिस थमा दिया गया, जिनका इस पूरी जमीनी व्यवस्था से सीधा सरोकार भी नहीं था।
शहर में चर्चा: “वाह रे निगम की नीति!”
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कोरबा की जनता और राजनीतिक विश्लेषक निगम की कार्यशैली पर हंस रहे हैं। यह सवाल हर जुबान पर है कि क्या कोरबा निगम में अब नियम-कायदे सिर्फ दिखावे के लिए रह गए हैं? दोषी जोन कमिश्नरों पर मेहरबानी और सचिव पर गाज गिराकर क्या कमिश्नर और आला अफसर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ पाएंगे? अब देखना यह है कि जमीन पर बैठकर विरोध जता रहे सभापति और अपमानित महसूस कर रहीं महापौर के इस गुस्से के बाद निगम के ‘सुपीरियर’ अफसर अपनी गलती सुधारते हैं या ‘करे कोई, भरे कोई’ का यह खेल यूं ही चलता रहेगा।





