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सरकारी सिस्टम के चार सुपरहिट शो, अनगिनत दर्शक और भरपूर ड्रामा, यही है सरकारी मल्टीप्लेक्स की कहानी

कोरबा। देश के सिनेमा हॉल भले ही दर्शकों के लिए तरस रहे हों, लेकिन मनोरंजन का एक ऐसा मंच भी है जहाँ हर शो बिना किसी एडवांस बुकिंग के ‘हाउसफुल’ रहता है। सबसे चर्चित नाम है सरकारी ठेका।

सरकारी ठेका वह विश्वविद्यालय है जहां एडमिशन बिना योग्यता के, फीस नकद जमा होती है, क्लास रोज़ लगती है और हर छात्र खुद को कुलपति समझकर घर लौटता है!

सरकारी तंत्र भले ही राजस्व के नए रिकॉर्ड गिनवाने में व्यस्त हो, पर असली रिकॉर्ड तो इस थियेटर के ‘कलाकार’ बना रहे हैं। जो बिना किसी बजट, बिना प्रचार के, बिना किसी स्टारकास्ट, बिना प्रमोशन और बिना ओटीटी रिलीज के यहाँ रोज़ चार सुपरहिट शो चलते हैं।

पहला शो है ‘शोले’ जो सुबह 9 से दोपहर 12 बजे तक रहता है। यह शो उन समर्पित दर्शकों के लिए है जिनका एकमात्र उद्देश्य रात की बची हुई खुमारी को सम्मानपूर्वक विदाई देना होता है। पानी मिलाकर वक्त बर्बाद करना इन्हें पसंद नहीं। पहला शॉट हलक से नीचे उतरते ही ये खुद को ‘जय-वीरू’ समझने लगते हैं। इन्हें सुबह की चाय भले न मिले, पर आबकारी विभाग का यह ‘ओपनिंग शो’ मिस नहीं होना चाहिए।

 

दूसरा शो: ‘रोमियो’ जो दोपहर 12 से 3 बजे तक चलता है। यह भावुक और दिलजलों का प्रीमियम शो है।दो घूंट भीतर जाते ही इन्हें अपनी पहली मोहब्बत, आखिरी मोहब्बत और बीच में हुई सारी गलतफहमियाँ याद आने लगती है।

दुकान के पीछे खड़े होकर पुराने नंबर मिलाना, “तुम खुश तो हो न?” जैसे ऐतिहासिक सवाल पूछना और कॉल कटते ही आसमान की तरफ देखकर गहरी साँस लेना इस शो की विशेषता है। आबकारी विभाग को चाहिए कि इस शो के दर्शकों के लिए कम से कम मुफ्त टिशू पेपर की व्यवस्था तो करवा ही दे।

तीसरा शो का नाम  है ‘शेरा’ जो दोपहर 3 से शाम 6 बजे का रहता है। इस शो में कदम रखते ही साधारण लोग खुद को इलाके का बाहुबली समझने लगते हैं। हाथ में ‘पौआ’ आते ही बड़े-बड़े दावे और काल्पनिक रसूख के किस्से शुरू हो जाते हैं। जो महाशय सुबह घर से ‘भीगी बिल्ली’ बनकर निकले थे, वे यहाँ ‘शेर’ बन जाते हैं। हालांकि, इनकी दहाड़ सिर्फ ठेके की नाली पार करने में लगती है लेकिन पुलिस की जीप दिखते ही यह दहाड़ अचानक म्याऊँ में भी बदल जाती है।

चौथा शो है : यूनिक  जो शाम 6 से रात 9 बजे का है यह  सरकारी मल्टीप्लेक्स का प्राइम टाइम और महा ब्लॉकबस्टर शो है। यहाँ लोकतंत्र अपने सबसे शुद्ध रूप में दिखाई देता है। सूट-बूट वाले बाबू, ठेले वाले काका, ठेकेदार, मजदूर, रिटायर्ड फौजी और स्वयंभू समाजसेवी सब एक ही डिस्पोजल ग्लास की विचारधारा के नीचे एकजुट हो जाते हैं। सब एक ही डिस्पोजल ग्लास पर नजर आते हैं। दो घूंट अंदर जाते ही ये वैश्विक राजनेता बन जाते हैं। देश की राजनीति से लेकर वैश्विक मंदी को सुधारने के लिए नई-नई यूनियनें खड़ी की जाती हैं, जो रात ठीक 9:05 बजे शटर गिरते ही लड़खड़ाते कदमों के साथ सारी क्रांतियाँ स्वतः भंग हो जाती हैं।सेंसर बोर्ड परेशान है कि फिल्मों में क्या काटें, लेकिन इस सरकारी थियेटर में न कोई रीटेक है, न कोई कट। चारों शो के समापन के बाद, देश की अर्थव्यवस्था को अपने कंधों पर उठाने वाले ये सुरा प्रेमी लड़खड़ाती आवाज में यही गुनगुनाते हुए घर लौटते हैं “मुझे पीने का शौक नहीं, पीता हूँ सरकार चलाने को…”

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