
अनुशासन-मनोरंजन-संतुलन और लैला
Police Transfer Tihar राजनीति में “अनुशासन”, “राष्ट्रवाद” और “सादगी” जैसे भारी-भरकम शब्द मंच पर इतनी गंभीरता से बोले जाते हैं कि सुनने वाला भी अपनी कुर्सी पर सीधा बैठ जाए। लेकिन हाल ही में एक थ्री-स्टार होटल में हुए भाजपा प्रशिक्षण शिविर में गजब का वाकया हुआ। असल में राजनीति में संतुलन भी एक कला है और नेता इसके बड़े जानकार होते हैं।
प्रशिक्षण शिविर में दिन में विचारों का मंथन और रात में मूड का मनोरंजन दोनों का संतुलन ऐसा बैठाया गया कि जो कार्यकर्ता दिनभर अनुशासन का पाठ पढ़कर थककर चूर थे वो अपनी थकान भूलकर लैला की चाल में थकान भूलकर ताली बजाने लगे।
दीवारों ने बताया कि अनुशासन के नाम पर “नाइट स्टे” इसलिए रखा गया था कि बात बाहर न जाए, पर दीवारों के भी कान होते हैं। रात में स्विमिंग पूल की मस्ती और डांस का एक-एक स्टेप पब्लिक तक पहुँच ही गया। चर्चा है कि एक दिग्गज नेत्री ने ” “लैला मैं लैला ऐसी हूँ लैला…हर कोई चाहे मुझसे मिलना अकेला” ..पर ऐसा धूम मचाया कि देखने वाले अनुशासन भूलकर बस ताड़ते ही रह गए..।
इंतजाम तो ऐसा था कि अंदर की बात बाहर न जाए इसलिए संतुलन सांधने वाले विशेष नेताजी को पूल के किनारे चौकीदारी के लिए लगाया गया था मगर बात छुप नहीं पाई। अब प्रशिक्षण का सर्टिफिकेट अनुशासन का मिलेगा या ‘बेस्ट परफॉर्मेंस इन डांस’ का? ये तो वही जाने जिन्होंने प्रशिक्षण शिविर लगाया था।
पिछड़ा पुलिस और ट्रेनिंग वाले थानेदार
कहते हैं पुलिस महकमे में कप्तान साहब का ‘स्नेह’ भी बड़ा चुनिंदा होता है। आजकल जिले में “पिछड़ी पुलिस और ट्रेनिंग वाले थानेदार” की जुगलबंदी खूब सुर्खियां बटोर रही है। ये वो जांबाज हैं जो कानून-व्यवस्था संभालने से ज्यादा ‘आउट ऑफ स्टेट’ (अंतर्राज्यीय) हवाई यात्राओं और ट्रेनिंग के परमानेंट मुसाफिर बन चुके हैं।
नियम तो कहता है कि ट्रेनिंग का रोटेशन सबका होना चाहिए, लेकिन कप्तान साहब का प्रशासनिक गणित ज़रा अनूठा है। ट्रेनिंग चाहे जंगल वॉरफेयर की हो या साइबर क्राइम की, पसीना बहाने के लिए उन्हें पूरी फौज में सिर्फ वही दो ‘पिछड़े’ थानेदार नजर आते हैं; मानो देश-दुनिया की सारी विधाओं का ज्ञान इन्हीं दो कंधों पर लादना तय हुआ हो।
अब खेल का दूसरा मज़ेदार पहलू देखिए। जैसे ही मुख्यालय से किसी कठिन ट्रेनिंग या मैदानी मशक्कत का फरमान जारी होता है, मलाईदार थानों में फेविकोल लगाकर बैठे रसूखदार थानेदारों का ‘प्रशासनिक रसूख’ और वीआईपी ड्यूटी का तगादा आड़े आ जाता है। साहेब की चाकरी में दिन-रात एक करने वाले ये रसूखदार सूरमा ‘ग्राउंड’ की मेहनत से हमेशा दूरी बनाए रखने में कामयाब हो जाते हैं। शहर का प्रबुद्ध वर्ग अब चाय की चुस्कियों के साथ कप्तान साहब की इस ‘इंसाफ-पसंदी’ पर मुस्कुरा रहा है कि “साहब! मेहनत और पसीना बहाने के लिए ‘पिछड़े’ थानेदार मुस्तैद हैं, और थानों का मलाईदार रूतबा संभालने के लिए ‘रसूखदार’ सूरमा तैनात हैं।” अब देखना यह है कि कप्तान साहब की इस विशेष मेहरबानी की बदौलत ये दो ‘ट्रेनिंग वाले थानेदार’ ही अकेले पूरे प्रदेश का नाम रौशन करते रहेंगे, या फिर इन रसूखदार थानों की मलाई कभी इन मेहनती कंधों के हिस्से भी आएगी!
..तब पुलिस की ‘ड्यूटी’ चलती थी, अब ‘डींगें’!
Police Transfer Tihar कहते हैं जब सियासत के हुक्मरानों को ज़रा सी आंच आए, तो हवा में तीर चलाने वाली पुलिस अचानक ‘सिंघम’ बन जाती है।
ताज़ा मामला पिछले सप्ताह का है। भाजपा नेता धरमलाल कौशिक जी का मोबाइल झपटमार ले उड़ा। खबर सोशल मीडिया पर क्या सर्च हुई चमचमाती कमिश्नरेट वाली हाईटेक पुलिस अपनी ‘डींगें’ छोड़ ‘ड्यूटी’ पर दौड़ पड़ी। पूरे आठ घंटे की ‘मशक्कत’ के बाद चोर पकड़ा गया, और पुलिस फिर से अपनी पीठ थपथपाने और नई डींगें हांकने के काम पर लौट आई।
इस “महा-सफलता” पर जनता को पुलिस के पुराने दिन याद आ गए। लोग याद दिला रहे हैं अविभाजित मध्यप्रदेश के सुंदरलाल पटवा सरकार का वह दौर, जब चांपा सीएम कार्यक्रम में शामिल होने आए भाजपा नेता स्वर्गीय लखीराम अग्रवाल की अटैची चोरी हो गई थी। तब पुलिस के पास न साइबर सेल थी, न आधुनिक गैजेट्स; फिर भी सीएम का हेलीकॉप्टर उड़ान भर पाता, उससे पहले मात्र दो घंटे में अटैची बरामद कर ली गई थी।
कहाँ बिना तकनीक के दो घंटे की वो मुस्तैदी, और कहाँ आज की हाईटेक पुलिस जिसे वीआईपी का मोबाइल खोजने में आठ घंटे लग गए!राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट है और प्रबुद्ध वर्ग चाय की चुस्कियों के साथ तंज कस रहा है “साहब! वो दौर और था जब पुलिस डींगें कम और ड्यूटी ज़्यादा करती थी। आज की पुलिस पहले रील की स्क्रिप्ट सोचती है, फिर तफ्तीश करती है।”सवाल तो मौजूं है नेताओं के लिए आठ घंटे में जागने वाली खाकी, आम जनता के मोबाइल चोरी होने पर ‘लोकेशन’ ही क्यों ढूंढती रह जाती है?
तबादला तिहार….कुंडली तैयार
प्रदेश में 45 डिग्री तापमान के बीच सुशासन तिहार चल रहा है। सीएम गांव-चौपालों में योजनाओं का फीडबैक ले रहे हैं। चौपालों में ही अफसरों और मैदानी अधिकारियों की कुंडली भी तैयार हो रही है और अगले महीने 10 जून को सुशासन तिहार पूरा हो जाएगा। लेकिन, इसके बाद सियासी और प्रशासनिक पारा और चढ़ने वाला है। जून महीने में सरकार तबादलों पर लगी रोक हटाने पर विचार कर रही है।
वैसे तो समन्वय के तहत अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग जारी हैं, मगर विधायक, सांसद और पार्टी के नेता अपने-अपने जिलों और ब्लॉकों में अफसरों की मनमानी से परेशान हैं। कई जगहों से इसकी शिकायत सरकार और संगठन तक पहुंची है। संगठन की बैठकों में भी कार्यकर्ताओं की बातें सुनने और उन्हें महत्व देने की समझाइश सरकार तक पहुंची है।
हालांकि अभी सुशासन तिहार के साथ-साथ जनगणना का कार्य भी चल रहा है। कर्मचारी संगठन भी तबादलों पर लगी रोक हटाने के लिए दबाव बना रहे हैं। ऐसे में सरकार इस महीने के आखिर तक तबादला नीति तैयार कर सकती है। नई नीति में जिला स्तर पर प्रभारी मंत्रियों और संगठन के नेताओं की पसंद के आधार पर तबादले होना। ऐसे में जिलों के अफसर संगठन नेताओं के बंगलों में आना जाना बढ़ा रहे हैं..शायद इससे उनकी कुंडली में लिखा तबादला योग टल जाए।
मैलोडी खाओ… खुद जान जाओ
रायपुर की पॉलिटिक्स का पारा चढ़ा हुआ है। बीजेपी में प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं और अखबारों में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की फोटो पहले पन्ने पर छप रही है। असल में दोनों पार्टियां अगले चुनाव की तैयारी में लगी हैं। बीजेपी में इस बात चर्चा है कि संगठन में फेरबदल कब होगा और किस मंत्री की पत्ती कटने वाली है।
लेकिन, कांग्रेस में अलग सवाल हैं। पीसीसी की कुर्सी की लड़ाई में उलझने वाले कांग्रेस के दो बड़े नेता, कोरबा में नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत के साथ मंच पर अगल-बगल आकर बैठ गए। गिले-शिकवे दूर हुए तो गले लगे और पैर तक छू लिए।
इसी को लेकर रायपुर में जोरदार चटखारेदार चर्चा चल पड़ी है। असल में शहर गरम है और राजनीति भी गरम है। लेकिन खबरीलाल के पास इस खबर की खबर है। वह यह कि किसकी पत्ती कटेगी, कांग्रेस नेता कब तक साथ रहेंगे तो इसका जवाब है… “मैलोडी खाओ… खुद जान जाओ…” बाकी आप खुद समझदार हैं।



