कोरबा।Korba Politics फरवरी 2025 के नगरीय निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर बंपर जीत दर्ज करने वाली महापौर संजू देवी राजपूत ने शहर की सत्ता में एक नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया है। हाल ही में आयोजित “रन फॉर Green” कार्यक्रम में महापौर की मौजूदगी केवल एक सादे मैराथन की दौड़ भर नहीं थी, वह दरअसल शहर के सियासी गलियारों में एक जोर-शोर से दिया गया राजनीतिक संदेश था।
वैसे तो राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही कोई स्थायी समीकरण। वफादारियां बदलती हैं, हवा का रुख बदलता है और कभी-कभी सबसे बड़ा बदलाव तब आता है जब सत्ता के ‘रिमोट कंट्रोल’ की बैटरी बदल जाती है। इन दिनों ऊर्जाधानी कोरबा की राजनीति में कुछ ऐसा ही बदलाव दिख रहा है।
चर्चा इस बात की बिल्कुल नहीं थी कि महापौर मैदान में कितने कदम दौड़ीं, बल्कि चर्चा इस बात की गूंज रही थी कि इस बार उन्होंने राजनीतिक बैसाखियों को एक तरफ पटक कर अपने खुद के कदमों पर दौड़ लगाई है। असल में कोरबा नगर निगम अपने गठन के बाद दो कुर्सियां और ‘ऑपरेटिंग सिस्टम’ के दौर से गुजरता रहा। कुर्सी भले ही बदलती रही, लेकिन सत्ता के गलियारों में हमेशा एक अदृश्य “रिमोट कंट्रोल” ही पॉवरफुल रहा।
निगम के शुरुआती दौर की पहली महिला महापौर श्याम कंवर के समय से लेकर लखन देवांगन के दौर तक निगम में हमेशा दो कुर्सियां दिखाई देती थीं, एक महापौर की और दूसरी उस “रिमोट कंट्रोल” की जिसने उन्हें राजनीति का मंच दिया। हालांकि, लखन देवांगन ने बाद में अपनी मजबूत और स्वतंत्र पहचान बनाई और आज वे प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित हैं।
हालांकि तीसरे महापौर ने अपने दम पर ‘विकास पुरुष’ की छवि बनाई, पर विधानसभा के गणित में पिछड़ गए। इसके बाद जब कमान एक गृहिणी के हाथ आई, तो काम से ज्यादा इस बात का शोर रहा कि उनका “ऑपरेटिंग सिस्टम” कहीं और से रिमोट से चलाया जा रहा है।
इसी दौर में जब संजू देवी राजपूत ने महापौर की कुर्सी संभाली, तो उनके विरोधी और राजनीतिक पंडित यही कयास लगा रहे थे कि इतिहास खुद को दोहराएगा—फाइलों पर दस्तखत कहीं होंगे और फैसले कहीं और से लिए जाएंगे। लेकिन, संजू देवी राजपूत ने बहुत जल्द इस धारणा को बदल दिया। उनकी हालिया कार्यशैली ने यह साबित कर दिया है कि वे केवल एक चेहरा या मंच की शोभा बढ़ाने वाली महापौर बनकर रहने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।
अब संजू देवी राजपूत का नया चेहरा सामने आया है। निगम के कामकाज, अधिकारियों की समीक्षा बैठकों और शहर के विकास कार्यों की खुद सीधी मानिटरिंग कर रही हैं। कोरबा नगर निगम में यह शायद पहला मौका है जब किसी महिला महापौर के प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण को लेकर चर्चाएं चल रही हैं, संदेश साफ है महापौर अपने राजनीतिक वजूद के दम पर लंबी रेस दौड़ने के लिए तैयार हैं।
हालांकि, राजनीति का मौसम बदलते देर नहीं लगती। फिलहाल तो कोरबा की जनता और उनके राजनीतिक विरोधी दोनों इस बात के गवाह बन रहे हैं कि महापौर ने “रिमोट” की जगह अपनी “चार्जिंग” खुद संभाल रही हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या संजू देवी राजपूत अपनी खुद मैदान में उतर कर कोरबा में विकास का नया रिकॉर्ड बनाती हैं, या फिर पर्दे के पीछे कोई नया “रिमोट कंट्रोल” भी होगा जो उनके रनिंग ट्रैक को “कंट्रोल” करेगा।






