KORBA में जमीन धोखाधड़ी पर बड़ा फैसला… प्रो. सुरेशचंद्र तिवारी को 3 साल की सजा, कोर्ट से सीधे जेल भेजे गए
कोरबा, 04 मई। KORBA जमीन खरीदी-बिक्री में धोखाधड़ी के मामले में न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रो. सुरेशचंद्र तिवारी को दोषी करार दिया है। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश डॉ. ममता भोजवानी ने सुपर सेशन वारंट जारी कर आरोपी को सीधे जेल भेजने का आदेश दिया। इस फैसले के बाद न्यायालय से ही उन्हें जेल दाखिल कराया गया।
कोर्ट का सख्त फैसला: उदारता से इनकार
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए किसी प्रकार की नरमी उचित नहीं है। आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत 3 वर्ष के कठोर कारावास और 10,000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया गया है। साथ ही जुर्माना अदा न करने की स्थिति में अतिरिक्त 6 माह की सजा का प्रावधान भी रखा गया है।
पीड़ित को 25.50 लाख रुपये लौटाने के निर्देश
कोर्ट ने धारा 357 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत पीड़ित जगदीश मिश्रा को राहत देते हुए आरोपी को 16.50 लाख रुपये की मूल राशि के साथ वर्ष 2016 से 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज सहित कुल 25.50 लाख रुपये तीन माह के भीतर चुकाने का आदेश दिया है। साथ ही भुगतान में देरी होने पर अतिरिक्त ब्याज भी देना होगा।
अपील खारिज, सजा बरकरार
इस मामले में अभियोजन और प्रार्थी द्वारा सजा बढ़ाने की मांग को न्यायालय ने खारिज कर दिया। वहीं आरोपी की ओर से दोषमुक्ति की अपील भी अस्वीकार कर दी गई। हालांकि सह-आरोपी सुधा तिवारी को धारा 420 और 120बी से दोषमुक्त कर दिया गया, जबकि सुरेश तिवारी की धोखाधड़ी की सजा को यथावत रखा गया।
तीन अपीलों पर एक साथ सुनवाई
यह मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के निर्णय के खिलाफ दायर तीन अलग-अलग अपीलों से जुड़ा था। सभी अपीलों की एक साथ सुनवाई करते हुए अदालत ने समग्र परिस्थितियों का मूल्यांकन कर अंतिम निर्णय सुनाया।
क्या है पूरा मामला?
प्रार्थी जगदीश मिश्रा ने वर्ष 2020 में शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्हें जमीन बेचने के नाम पर धोखा दिया गया। आरोपी ने अपनी पत्नी के नाम की जमीन बताकर 12 डिसमिल भूमि का सौदा किया और 16.50 लाख रुपये लेकर रजिस्ट्री करा दी। लेकिन नामांतरण के दौरान पता चला कि जमीन आरोपी के नाम पर थी ही नहीं।
जब पीड़ित ने अपने पैसे वापस मांगे, तो उसके साथ मारपीट और धमकी दी गई। इसके बाद मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई गई और जांच के बाद प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
न्यायालय ने इस मामले को गंभीर आर्थिक अपराध मानते हुए अधिकतम सजा को उचित ठहराया। साथ ही पीड़ित को आर्थिक नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करने के लिए मुआवजा देने का आदेश भी दिया।



