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PCC elections: राजा-वजीरों की बारी कब? प्रोटोकॉल पर बवाल… और ‘क्रेडिट’ की मलाई! मानसूनी फुहार और तबादला तिहार..सेटिंग एक्सप्रेस’: एंट्री फिक्स, नंबर प्लेट रिस्क!

प्यादे तो नाप दिए, अब राजा-वजीरों की बारी कब?

 

Kataksh “बड़े लोगों के दिल में सिर्फ़ नफ़रत की दास्तानें हैं,खता सिपाही की है और कप्तानों के थाने हैं।”यह शेर इन दिनों पुलिस विभाग के गलियारों में कुछ ज़्यादा ही प्रासंगिक लग रहा है। कारण है बहुचर्चित “डीजल कांड”, जिसमें कार्रवाई की तलवार तो चली, लेकिन उसकी धार फिलहाल वहीं तक पहुँची है जहां आमतौर पर पहुँचती है,प्यादों तक।

 

दरअसल, कोरबा के पुलिस कप्तान ने ‘डीजल कांड’ में कुछ सिपाहियों को सस्पेंड तो कर दिया है, लेकिन इस सिंघम-मार्का एक्शन के बाद पूरी ऊर्जाधानी में एक ही सवाल तैर रहा है क्या इतने बड़े खेल के पीछे वाकई सिर्फ इन चंद प्यादों का ही दिमाग था?।चौंकिए मत! निलंबित सूची में साइबर सेल के महारथी भी शामिल हैं। जिनका काम तकनीक के सहारे चोरों को पकड़ना था, उन पर ही चोरी की राह को “जीपीएस-फ्रेंडली” बनाने का इल्ज़ाम है। अब यह तो वही बात हुई कि बिल्ली को दूध की रखवाली सौंप दी जाए और सुबह मलाई गायब मिले।

 

अब महकमे का दस्तूर तो सब जानते ही हैं  यहाँ बिना बड़े साहबों की रजामंदी के थाने की चाय भी ठंडी नहीं होती! फिर इन जूनियरों में इतना दुस्साहस कहाँ से आया? क्या पर्दे के पीछे से कोई रसूखदार साहब धीमे से कह रहे थे “तुम आगे बढ़ो, डीजल निकालो… पीछे हम बैठे हैं!”

भीतरखाने में चर्चा तो इस बात की भी है कि यह डीजल चोरी कोई छोटी-मोटी जेबकतरी नहीं, बल्कि करोड़ों का संगठित ‘गोरखधंधा’ है। अगर यह मलाईदार खेल महीनों से चल रहा था, तो क्या इलाके के बड़े साहबों की नाक इतनी जाम थी कि उन्हें डीजल की गंध तक नहीं आई? और अगर गंध आ रही थी, फिर भी वे जानबूझकर आँखें मूंदे बैठे थे, तो फिर असली गुनहगार कौन हुआ?

कप्तान साहब ने नीचे की पत्तियां तो छाँट दी हैं, लेकिन अगर जड़ों में बैठे ‘मठाधीशों’ को हाथ नहीं लगाया गया, तो कुछ दिन बाद ये प्यादे फिर बहाल हो जाएंगे और ‘डीजल एक्सप्रेस’ नए नाम से पटरी पर दौड़ पड़ेगी। अब देखना यह है कि जांच की सुई सिर्फ सिपाही के क्वार्टर पर ही आकर दम तोड़ देती है, या सायरन बजाती उन बड़ी गाड़ियों तक भी पहुँचती है, जो इस अकूत मलाई की असली ‘बेनेफिशियरी’ थीं!

 

 

प्रोटोकॉल पर बवाल… और ‘क्रेडिट’ की मलाई!

 

 

Korba Political News कोरबा नगर निगम का एक सीधा सा दस्तूर है काम भले ही कछुए की चाल से चले, लेकिन जब बात फीता काटने की आए, तो ‘क्रेडिट’ लूटने की बुलेट ट्रेन दौड़ने लगती है। बिना किसी हंगामे के कोई काम शांति से निपट जाए, मजाल है! हर काम में अपनी नेतागिरी चमकाने की ऐसी होड़ मचती है कि विकास पीछे छूट जाता है और सियासत सिर चढ़कर बोलने लगती है।

इस बार भी तमाशा हूबहू वैसा ही हुआ। चौक-चौराहों का कायाकल्प हुआ, अग्रसेन तिराहा चमका, इलेक्ट्रिक चार्जिंग प्वाइंट बना और कोसाबाड़ी चौक का लोकार्पण हुआ। लेकिन जैसे ही मुख्य अतिथि के रूप में ‘माननीय मंत्रीजी’ ने नारियल फोड़ा, निगम के गलियारों में ऐसा भूचाल आया कि रसूखदारों की कुर्सियां हिल गईं।

सियासी मिर्ची तो लगनी ही थी! लोकार्पण मंत्रीजी ने किया, तो महापौर और निगम सभापति का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। अब अफसरों की जान आफत में है। बेचारे करें तो क्या करें? सरकारी प्रोटोकॉल की जंजीरें उनके पैरों में बंधी हैं। शहर में अगर स्थानीय विधायक और सूबे के कैबिनेट मंत्री मौजूद हैं, तो उन्हें न्योता देना अफसरों की मजबूरी भी है और नियम भी। इस प्रोटोकॉल की थाली में महापौर, सभापति और पार्षदों के लिए भी जगह तय होती है, पर सबको ‘मुख्य आकर्षण’ जो बनना है! सूत्रधार की माने तो अफसरों पर इस समय दोहरी मार है। 2028 का विधानसभा चुनाव अब सिर्फ दो साल दूर है, और सरकार का हंटर चल रहा है कि तय वक्त पर काम पूरे करो। ऐसे में बेचारे बाबू और इंजीनियर विकास काम कराएं या नेताओं के ‘ईगो’ (अहंकार) को सहलाएं?

नेताओं को भी समझना होगा कि सरकारी प्रोटोकॉल का पालन करना किसी जनप्रतिनिधी का अपमान नहीं, बल्कि एक तय प्रशासनिक व्यवस्था है। लेकिन साहेब, ये सियासत है! यहाँ जब तक प्रोटोकॉल पर ‘बवाल’ न हो, तब तक नेताओं का खाना हजम कहाँ होता है!

 

 

सेटिंग एक्सप्रेस’: एंट्री फिक्स, नंबर प्लेट रिस्क!

 

 

“जब पूरा सिस्टम ही सेट हो, तो नियम सिर्फ किताबों में अच्छे लगते हैं!” आजकल ऊर्जाधानी कोरबा की सड़कों पर गाड़ियों के नंबर प्लेट गायब हैं, क्योंकि यहाँ गाड़ियां RTO के नंबर से नहीं, बल्कि ‘महीने की एंट्री’ और ‘पर्ची’ के दम पर दौड़ती हैं।

हाल ही में राजस्थान परिवहन विभाग का एक ऑडियो लीक हुआ था, जिसमें व्हाट्सऐप पर गाड़ियों की लिस्ट भेजकर ‘रास्ता साफ’ कराने का खेल सामने आया था। इसके बाद कोरबा की जनता में यह चर्चा तेज है कि ऐसा ही कोई ‘अदृश्य सेटिंग तंत्र’ यहाँ की सड़कों को भी चला रहा है।

फिल्म दीवार की तर्ज पर अगर आज कानून इन रसूखदार गाड़ी वालों से पूछे कि तुम्हारे पास क्या है? तो इनका सीना तानकर एक ही जवाब आता है “हमारे पास एंट्री है!” कहा तो यह भी जा रहा कि कागजों में गाड़ियां कम हैं, पर सड़कों पर बिना नंबर प्लेट का इनका पूरा कुनबा बेखौफ दौड़ रहा है। यह सिर्फ ट्रैफिक का नहीं, जनता की सुरक्षा का गंभीर मामला है। अगर बिना नंबर की गाड़ी से कोई बड़ा हादसा हो जाए, तो पुलिस किसे ढूंढेगी और जिम्मेदारी किसकी होगी? कानून का खौफ चालान काटने से नहीं, नियम मनवाने से दिखता है। वर्ना जनता तो यही कहेगी कि यहाँ ट्रैफिक व्यवस्था नहीं, बल्कि ‘सेटिंग एक्सप्रेस’ चल रही है जहाँ एंट्री फिक्स है और नंबर प्लेट लगाना बड़ा रिस्क है!

 

 

मानसूनी फुहार और तबादला तिहार

 

 

10 जून को सुशासन तिहार खत्म हो जाएगा, उसके एक दिन पहले 9 जून को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में मंत्रालय में 9 जून को कैबिनेट होगी। कैबिनेट बैठक का एजेंडा क्या होगा, ये तो साफ नहीं है, मगर मंत्रालय में कर्मचारियों के तबादलों पर से प्रतिबंध हटाने की चर्चा है।

नई तबादला नीति पर कैबिनेट में फैसला लिया जाएगा। खबरीलाल की मानें तो सुशासन तिहार शिविर में कार्यकर्ताओं ने अफसरों की जमकर शिकायत की, जिसके बाद संगठन की ओर से कहा जा रहा है कि कार्यकर्ताओं की बात सुनी जाए।

अभी तक जिलास्तर में प्रभारी मंत्री और संगठन की राय से तबादला होने की परंपरा रही है। इस बार भी वही फार्मूला लागू होगा। अंदरखाने की खबर में संगठन की ओर से निकायों में एल्डरमैन के खाली पदों पर नियुक्ति की बात भी चल रही है।

सूत्रों की मानें तो कैबिनेट की बैठक में सरकार की योजनाओं के साथ तबादला नीति और एल्डरमैन की नियुक्ति पर विष्णुदेव सरकार बड़ा फैसला ले सकती है। कुल मिलाकर इस बार मानसून, संगठन कार्यकर्ताओं के लिए राहत की फुहार लेकर आने वाला है। अब ये किस पर कितना बरसता है, ये अंदर वाले जाने।

 

पीसीसी चुनाव: बदलाव या इंतजार

 

 

पिछले सप्ताह पांच नगर पंचायतों के चुनाव में कांग्रेस भले ही कोई चमत्कार नहीं कर पाई, मगर दो नगर पंचायतों में चुनाव जीत कर ये जरूर साबित कर दिया कि आने वाले वक्त में वो चमत्कार कर सकती है। इस चुनाव में कांग्रेस के सभी बड़े लीडर्स एक साथ दिखे।

हालांकि चुनाव के दौरान प्रदेश कांग्रेस कमेटी में अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव और पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज के बीच कुछ मतभेद दिखे। मगर बाद में डैमेज कंट्रोल होने के बाद पार्टी ने मिलकर चुनाव लड़ा। अब इसी सप्ताह 10 जून को दीपक बैज का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इसी वजह से अगले पीसीसी अध्यक्ष को लेकर अटकलें फिर तेज हो गई हैं।

सरगुजा, जांजगीर और कवर्धा को छोड़ दें तो बालौद में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया। बस्तर के स्थानीय निकायों के उपचुनाव में ज्यादातर सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली। जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर संभाग में उसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा था।

बस्तर और बालौद में मिली कामयाबी के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि दीपक बैज को एक्सटेंशन मिल सकता है। वैसे भी दीपक बैज को आलाकमान की पसंद पर ही पीसीसी चीफ बनाया गया था। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस आलाकमान फिलहाल प्रदेश संगठन में बड़े बदलाव को टाल सकता है। ऐसे में पीसीसी अध्यक्ष बनने की दौड़ में शामिल नेताओं को इंतजार करना पड़ सकता है।

 

✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

 

 

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