
कोरबा। “जली को आग और बुझी को राख कहते हैं… और जो इसी राख से ग्रामीणों की जिंदगी से खेल जाए, उसे ‘तेलगा उस्ताद’ कहते हैं।”
यह फिल्मी संवाद आज उर्जाधानी की फिजाओं में तैर रहा है। मामला सीएसईबी के झाबू और डिंडोलभांठा राखड़ डेम का है, जहां राख निकालने के नाम पर एक

ऐसा ‘मायाजाल’ बुना गया है, जिसने एक साधारण से ठेकेदार को देखते ही देखते करोड़ों का ‘सुपरस्टार’ बना दिया।
कागजों पर ‘सोना’ उगल रही राख
कहने को तो यह राख है, लेकिन संबंधित ठेकेदार के लिए यह “सोने की खान” साबित हो रही है। चर्चा है कि कागजों पर ट्रांसपोर्टिंग का ऐसा खेल रचा गया है कि किस्मत रातों-रात चमक गई। दफ्तरों में ठेकेदार की बढ़ती धमक और अफसरों के साथ ‘खास’ नजदीकियों ने अब गलियारों में सुगबुगाहट तेज कर दी है। लोग चुटकी लेते हुए कह रहे हैं— “हम काले (राख वाले) हैं तो क्या हुआ, दिलवाले हैं…”
बदहाली में गांव, ‘धन वर्षा’ में सिस्टम
विडंबना देखिए, हल्की सी बारिश ने ग्रामीणों की राहों में कीचड़ और मुश्किलें बिछा दी हैं, लेकिन राख के इस सिंडिकेट में शामिल ठेकेदार और रसूखदार अफसर “धन वर्षा” के मानसून में सराबोर हैं। ग्रामीणों के हक और सेहत की राख उड़ रही है, जबकि बंद कमरों में सेटिंग का धुआं उठ रहा है। फर्जी बिलिंग और धरातल पर गायब ट्रांसपोर्टिंग के आरोपों ने पूरे सिस्टम की साख पर कालिख पोत दी है।
’मानसून ऑफर’ से जांच दबाने की कवायद
जैसे ही फर्जीवाड़े की खबरें डिजिटल गलियारों और गूगल पर हलचल मचाने लगीं, ‘तेलगा उस्ताद’ की बेचैनी बढ़ गई है। सूत्रों की मानें तो अब “मैनेज सिस्टम” एक्टिव हो गया है। जांच टीम को लुभाने के लिए “मानसून ऑफर” तैयार किए जा रहे हैं, ताकि इस पूरे घोटाले पर तिरपाल डालकर इसे ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया जाए। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन की आंखें इस ‘सेटिंग के धुएं’ को चीर पाएंगी, या फिर राख का यह काला खेल यूं ही ग्रामीणों की जिंदगी को धुंधला करता रहेगा?



