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“कृपा की चाबी से खुलते बंगले, नियमों पर लगा ताला”

Bungalow allotment scam“जिसके हाथ में होगी लाठी, भैंस वही ले जाएगा..” ये लाइन दिलीप कुमार की फिल्म गोपी के गीत से निकलकर जैसे सीधे नगर निगम के गलियारों में आ बसी है। फर्क बस इतना है कि यहां लाठी की जगह ‘साहब की कृपा’ है, और भैंस की जगह सरकारी बंगले।

 

 

कहते हैं, ऊपर वाला मेहरबान हो तो गधा भी पहलवान बन जाता है। एक तरफ वो कर्मचारी हैं जो सालों की सेवा के बाद भी फाइलों में मकान ढूंढते रह जाते हैं, और दूसरी तरफ संविदा वाले ऐसे इठला रहे हैं जैसे सरकारी बंगले उनकी पैतृक संपत्ति हों। हालात ऐसे हैं कि नियम-कायदों की किताब जैसे सिर्फ दिखावे के लिए रह गई हो। चर्चा तो यहां तक है कि एक बड़े अधिकारी के ड्राइवर ने भी नियमों की सीमाएं लांघते हुए अफसर श्रेणी के क्वार्टर पर कब्जा जमा लिया है। यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है और जिम्मेदार चुप्पी साधे बैठे हैं।

नगर निगम में चल रही इस ‘उल्टी गंगा’ को लेकर अब आम लोग भी तंज कसने लगे हैं। उनका कहना है कि जब साहब की कृपा हो, तो ड्राइवर भी ‘पहलवान’ बन जाता है और नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर नियमों का पालन होगा या फिर रसूख के आगे असली सुखदारों का सुख कुछ यूं ही लुटता रहेगा?

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