
खाकी का RRR शो.. रिएक्शन पर एक्शन, कलेक्शन
Khaki RRR Show “रिश्वत नारियल जैसा हो गया है… हर काम से पहले दोनों का चढ़ावा जरूरी है।” गब्बर इज बैक का यह डायलॉग अब सिनेमा से निकलकर चौकी के गलियारों में गूंजता सा लगता है। फर्क बस इतना है कि यहां स्क्रीन नहीं, सिस्टम चल रहा है… और हीरो नहीं, खाकी में ट्रिपल आर की जोड़ी सुर्खियों में है।
साउथ मूवी RRR ने पर्दे पर बगावत और बहादुरी की कहानी दिखाई, वहीं खाकी में “ट्रिपल आर” की यह तिकड़ी अपनी ही स्क्रिप्ट लिख रही है, जिसमें एक्शन भी है, ड्रामा भी और कलेक्शन तो खास तौर पर जोरदार है। ट्रांसफर हो जाए, कुर्सी बदल जाए, लेकिन इनकी “गेस्ट अपीयरेंस” कभी बंद नहीं होती। मौका मिलते ही इलाके का चक्कर और “बंधा-बंधाया हिसाब” का गीत गुनगुना रहे है।
महकमे में चर्चा है कि इस जोड़ी की पकड़ इतनी मजबूत है कि चौकी इंचार्ज भी इनके असर से बाहर नही रह सकता। उल्टा, कहा जा रहा है कि ट्रांसफर वाले “पहलवानों” को खुद बुलाकर बेगारी खर्चे के नाम पर इंतजाम कराने मजबूर है। कहा तो यह भी जा रहा कि खाकी के जाबांजों के लिए हर दिन होली और हर रात दिवाली है। वजह साफ है कमाई का आशीर्वाद हो तो गलती भी ‘एडजस्ट’ हो जाती है। चौकी हो, थाना हो या घर… सब जगह हिसाब फिट हो जाती है।
एसईसीएल क्षेत्र में वैध-अवैध कामों की कमी नहीं, और यही इस जोड़ी की ताकत है। कभी हंसा देते हैं, कभी रुला देते हैं। जो इनके रडार से बाहर रहना चाहता है, वह पहले ही “खातिरदारी” का रास्ता चुन लेता है।मैसेज साफ है अगर सब कुछ शांति से चलाना है, तो “एंट्री फीस” के साथ चलिए। वरना खाकी के ये खिलाड़ी कभी भी मैदान में उतर सकते हैं, और एक बार ट्रिपल आर की एंट्री हो गई, तो फिर खेल सिर्फ उनका होता है।
रेत की लियारी और सिस्टम की बेचारगी का महाकाव्य
Korba Sand Syndicate हाल ही में रिलीज हुई फिल्म धुरंधर में लियारी पर राज करने वाले रहमान डकैत के किरदार ने खूब सुर्खियां बटोरीं। उसी अंदाज़ में कोरबा के तथाकथित “रेत की लियारी” कहे जाने वाले सीतामणी क्षेत्र में सरताज गैंग का दबदबे के सामने लोकतंत्र नहीं, “लोडकंत्र” चलता है.. जितना लोड, उतना रौब!
फिल्म की तरह यहां भी मानो एक ही नेटवर्क का एकछत्र राज हो। रेत परिवहन पर पकड़ इतनी मजबूत है कि पूरे सिस्टम पर उसका असर दिखता है, और जिम्मेदार अधिकारी खुद को बेबस महसूस करते नजर आते हैं। प्रशासन की स्थिति भी अकल्पनीय है। हेलमेट चेकिंग में फुर्ती दिखाने वाले जवान, रेत से भरे ओवरलोडेड ट्रैक्टर देखकर अचानक ध्यान योग में लीन हो जाते हैं। शायद उन्हें “रेत ध्यान साधना” का प्रशिक्षण दिया गया है कि देखो, समझो, और फिर अनदेखा कर दो। खनिज विभाग, तहसीलदार और टास्क फोर्स की स्थिति तो मानो किसी पुराने टीवी के रिमोट जैसी हो गई है, बटन दबाओ, पर कुछ बदलता नहीं। और उधर गैंग का कॉन्फिडेंस ऐसा कि सरकारी अफसरों से बातचीत भी “जनसंपर्क कार्यक्रम” की जगह “जनधमकी कार्यक्रम” बन चुकी है।
शारदा विहार फाटक का जाम अब ट्रैफिक समस्या नहीं, बल्कि “रेत महोत्सव” का रोज़ का आयोजन लगता है। ट्रैक्टरों की कतारें, धूल का धुंधलका, और बीच में फंसी आम जनता, पूरा दृश्य किसी रियलिटी शो से कम नहीं होता। हद तो तब है जब चाय के चौपालों में बैठकर पुलिस को “रेत की रखवाली करने वाला चौकीदार” बताकर तंज कसे जाते हैं। पूरे घटनाक्रम में सवाल यही है कि आखिर इस “रेत की लियारी” पर लगाम कब लगेगी, या फिर सिस्टम यूं ही बेबस नजर आता रहेगा?
निगम के ‘त्रिदेव’: विकास की स्क्रिप्ट, सेटिंग का क्लाइमैक्स
वर्ष 1989 की फिल्म त्रिदेव में तीन चेहरे थे, एक्शन, ईमानदारी और न्याय के प्रतीक। लेकिन शहर के इस नए “रीमेक” में तीन चेहरे जरूर हैं, पर रोल कुछ अपडेटेड हैं। एक प्लान बनाता है, दूसरा उसे “मैनेज” करता है और तीसरा क्लाइमैक्स आने से पहले ही एंड क्रेडिट लिख देता है।
कहा जा रहा है कि शहर के विकास की नई गाथा पंचवटी मे रची जा रही है। फाइलें बन रही हैं, योजनाएँ पक रही हैं और फैसलों का तड़का भी लग रहा है। मगर जो लोग किचन के भीतर झांककर आए हैं, उनका कहना है कि ये खिचड़ी कुछ ज्यादा ही गाढ़ी है। मसाले इतने हैं कि असली स्वाद, यानी जनता का हित, कहीं नीचे दब गया है। इस ‘किचन ड्रामा’ के मास्टरशेफ बताए जाते हैं एक बिलासपुरिहा अफसर, जिनका पंचवटी में स्थायी डेरा है। उनके साथ दो और स्थायी सदस्य हैं, जो हर बैठक को मीटिंग कम और कुकिंग सेशन ज्यादा बना देते हैं। एजेंडा कागज पर शहर विकास का होता है, लेकिन प्लेट में जो परोसा जाता है, उसका स्वाद कुछ और ही कहानी कहता है। पंचवटी की पहचान भी धीरे-धीरे बदल रही है। पहले यह रेस्ट हाउस था, अब ‘स्ट्रैटेजी किचन’ बन चुका है। यहाँ फाइलों से ज्यादा ढक्कन खुलते हैं, और हर बार उम्मीद की जाती है कि इस बार कुछ नया और अच्छा निकलेगा। लेकिन नतीजा वही पुराना अधपका विकास और जरूरत से ज्यादा पकी सेटिंग। शहर के लोग भी अब इस खिचड़ी की खुशबू पहचानने लगे हैं। उन्हें पता है कि अंदर क्या पक रहा है, कैसे पक रहा है और किसके लिए पक रहा है। फर्क बस इतना है कि उन्हें इसका स्वाद कभी नहीं मिलता, सिर्फ उसका असर झेलना पड़ता है। व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन सवाल अब भी सीधा है अगर पंचवटी में ही शहर का किचन शिफ्ट हो गया है, तो असली नगर निगम आखिर किसके भरोसे चल रहा है? और जो ‘त्रिदेव’ स्क्रिप्ट लिख रहे हैं, वो क्लाइमैक्स शहर के लिए होगा या सिर्फ अपने लिए?
लोजी… होजी और ओजी..!
ये किसी मूवी का गाना नहीं है और न कोई डायलॉग, बल्कि ये छत्तीसगढ़ की हकीकत है। तो लोजी आपको होजी और ओजी का सही मतलब बता देते हैं। होजी का मतलब है हाइड्रोपोनिक गांजा और ओजी का मतलब है ओशन ग्रो गांजा, यानी समुद्र के पानी में उगाया जाने वाला गांजा… और ये सब छत्तीसगढ़ में कूरियर से पहुंच रहा है।
रायपुर शहर के सिविल लाइन थाना में पुलिस ने ऐसे ही एक आरोपी को गिरफ्तार किया है, जो दिल्ली में बैठे अपने साथी से कूरियर के जरिए ओशन ग्रो गांजा मंगाकर रायपुर शहर में बेच रहा था। अभी हाल ही में भिलाई में हाइड्रोपोनिक गांजा बरामद हुआ था। बलरामपुर, रायगढ़ और भिलाई में अफीम के खेत भी मिले। कांकेर में तो गांजे की खेती पकड़ी गई। शराब की अवैध बिक्री तो कुटीर उद्योग बन गया है।
सबसे गंभीर बात तो ये है कि कूरियर के जरिए प्रदेश में नशे का सामान पहुंचाया जा रहा है। पिछले दिनों जो ड्रग्स रैकेट का खुलासा हुआ था, उसमें भी कूरियर सर्विस और उनके डिलीवरी बॉय के नाम सामने आए थे। कुल मिलाकर नशे के सौदागरों ने तस्करी के लिए कूरियर के माध्यम से जो नवाचार शुरू किया है… जो किसी चुनौती से कम नहीं है। अगर इसे समय पर नहीं रोका गया, तो लोजी… होजी और ओजी… की कड़ी आगे कहां जाकर रुकेगी, यह एक गंभीर सवाल बन जाएगा।
लोक सेवा यानी अफसरी की गारंटी
इसी सप्ताह 15 तारीख को कैबिनेट की बैठक होना है और उसके बाद सरकार पूरे एक्शन मोड में आ जाएगी। मई महीने की 4 तारीख को 5 राज्यों के चुनावी नतीजे आने के बाद सरकार चुनाव की तैयारियां सुराज अभियान से शुरू करेगी, लेकिन उससे पहले विभागीय सचिवों को जो टास्क दिए गए हैं, उन्हें अफसरशाही को पूरा करना होगा।
पिछले सप्ताह चीफ सेक्रेटरी विकासशील ने सचिवों की बैठक में दो टूक कहा कि जनता को कोई परेशानी न हो, इसके लिए जो सेवाएं सीधे जनता से जुड़ी हैं, उन सभी सेवाओं को लोक सेवा गारंटी अधिनियम में अधिसूचित कर उनको रिपोर्ट करें। जो अफसर इसमें फेल होंगे, उन पर सरकार की नजर टेढ़ी होगी, यानी सीधे-सीधे चेतावनी। कुल मिलाकर चुनाव की तैयारी। सुराज अभियान में सीएम का उड़न खटोला सीधे किसी भी गांव में उतरेगा। जनता से फीडबैक मिलेगा और जिन विभागों की ज्यादा शिकायतें मिलेंगी, उनके अफसर नप जाएंगे। यानि लोक सेवा की गारंटी, अफसरी करने की गारंटी होगी, नहीं तो सुशासन का हंटर।



