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Korba : दर्री विद्युत गृह स्कूल में शिक्षण शुल्क घोटाला..!  जब बोर्ड दे रहा था अनुदान, तो बच्चों की फीस गई कहां, 2009 के आदेश ने खोले पुराने रिकॉर्ड..

0 टीए, बैठकों और प्रशासनिक खर्चों में फीस खर्च करने के आरोप, स्पेशल फॉरेंसिक ऑडिट की मांग तेज

कोरबा। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल (सीएसईबी) द्वारा कर्मचारियों के बच्चो के लिए संचालित स्कूलों में वर्षों से विद्यार्थियों से वसूली जा रही शिक्षण शुल्क राशि अब बड़े विवाद का कारण बनती जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि जब स्कूलों के संचालन, शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन, महंगाई भत्ते तथा अन्य प्रमुख खर्चों का वहन स्वयं सीएसईबी प्रबंधन कर रहा था, तब छात्रों से ली गई लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपये की शिक्षण शुल्क राशि आखिर कहां और किस मद में खर्च हुई?

मामले ने तब नया मोड़ ले लिया जब वर्ष 2009 का एक आधिकारिक आदेश सामने आया। इस आदेश में स्पष्ट उल्लेख है कि विद्यार्थियों से प्राप्त शिक्षण एवं संरक्षण शुल्क की शेष राशि मंडल खाते में जमा कराना शिक्षा समितियों की जिम्मेदारी होगी। अब इसी आदेश के आधार पर वित्तीय प्रबंधन और शुल्क व्यय को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

 

2009 का आदेश बना सबसे बड़ा सवाल

27 मार्च 2009 को जारी आदेश के अनुसार कोरबा पूर्व और कोरबा पश्चिम की शिक्षा समितियों को वेतन अनुदान प्राप्त करने से पहले यह घोषणा करनी थी कि विद्यार्थियों से प्राप्त शुल्क की शेष राशि मंडल खाते में जमा करा दी गई है।

यानी उस समय ही यह स्पष्ट कर दिया गया था कि छात्रों से प्राप्त फीस शिक्षा समितियों की स्वतंत्र निधि नहीं है। ऐसे में यदि वर्षों तक इस राशि का उपयोग अन्य मदों में किया गया तो इसकी अनुमति किस स्तर से मिली और किस नियम के तहत मिली, यह जांच का विषय बन गया है।

जब बोर्ड उठा रहा था खर्च, फिर फीस की जरूरत क्यों?

जानकारी के अनुसार स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन, महंगाई भत्ता, भविष्य निधि में प्रबंधन अंशदान तथा अन्य कई प्रशासनिक खर्चों का वहन सीएसईबी प्रबंधन करता रहा है।

यानी स्कूलों का अधिकांश वित्तीय भार पहले से ही बोर्ड के जिम्मे था। इसके बावजूद विद्यार्थियों से नियमित रूप से शिक्षण शुल्क लिया जाता रहा। अब अभिभावकों और कर्मचारियों के बीच यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि आखिर इस राशि का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया गया और उसका पारदर्शी हिसाब-किताब सार्वजनिक क्यों नहीं है?

 

कोरबा ईस्ट ने जमा की राशि, वेस्ट पर उठे सवाल

 

सूत्रों के अनुसार कोरबा ईस्ट शिक्षा समिति ने प्राप्त शुल्क राशि को नियमानुसार जमा किया, जबकि दर्री वेस्ट शिक्षा समिति में इस राशि का उपयोग विभिन्न खर्चों में किए जाने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि लाखों रुपये की राशि यात्रा भत्ता (टीए), बैठकों, निरीक्षणों तथा अन्य प्रशासनिक गतिविधियों में खर्च दर्शाई गई है। यदि जांच में यह तथ्य सही पाए जाते हैं तो यह वित्तीय नियमों के पालन और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।

 

टीए और बैठकों पर खर्च हुई फीस?

 

मामले का सबसे विवादित पहलू बच्चों की फीस से किए गए कथित टीए भुगतान को लेकर है। आरोप है कि विभिन्न बैठकों, निरीक्षणों और प्रशासनिक गतिविधियों के नाम पर बड़ी राशि खर्च की गई।
कर्मचारियों और अभिभावकों का सवाल है कि जब स्कूल छात्र संख्या में गिरावट, संसाधनों की कमी और आधारभूत सुविधाओं के संकट से जूझ रहे थे, तब बच्चों की फीस का उपयोग स्कूलों के विकास के बजाय प्रशासनिक खर्चों में क्यों किया गया?

 

दो साल में संकट में आ सकते हैं स्कूल

 

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि वित्तीय प्रबंधन की यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में सीएसईबी के कई स्कूल अस्तित्व के संकट में आ सकते हैं। छात्र संख्या में लगातार गिरावट, बढ़ते खर्च और सीमित संसाधनों के बीच शुल्क राशि का प्रभावी उपयोग नहीं होना चिंता का विषय माना जा रहा है।

 

नियमों के तहत हुआ है शुल्क का व्यय” : अजय सिंह कोर्राम

 

सीएसईबी वेस्ट के स्कूल शिक्षण संस्थान के सचिव अजय सिंह कोर्राम ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विद्यार्थियों से प्राप्त शिक्षण शुल्क का व्यय पूरी तरह नियमों और निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप किया गया है।

उन्होंने कहा कि राशि के उपयोग में किसी प्रकार की अनियमितता नहीं बरती गई है तथा सभी खर्चों का विवरण अभिलेखों में उपलब्ध है। हालांकि उन्होंने इस विषय पर अधिक टिप्पणी करने से इनकार किया।

जनता यूनियन ने मांगा स्पेशल फॉरेंसिक ऑडिट

 

जनता यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष अनिल द्विवेदी ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच और स्पेशल फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जांच में वित्तीय अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाना चाहिए। यह केवल वित्तीय मामला नहीं बल्कि हजारों विद्यार्थियों और अभिभावकों की मेहनत की कमाई से जुड़ा मुद्दा है।

 

सामाजिक कार्यकर्ता ने मांगा हिसाब

 

सामाजिक कार्यकर्ता मनीष राठौर ने कहा कि यदि पूरा व्यय नियमों के अनुसार हुआ है तो संबंधित बिल, वाउचर और भुगतान विवरण सार्वजनिक किए जाने चाहिए।उनका सवाल है कि बच्चों की फीस का पैसा आखिर किस उद्देश्य से और किसके हित में खर्च किया गया?

अभिभावक मांग रहे जवाब

 

पूरा मामला सामने आने के बाद कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं

छात्रों से कुल कितनी फीस वसूली गई?

कितनी राशि मंडल खाते में जमा हुई?
कितनी राशि खर्च हुई?

खर्च की स्वीकृति किस स्तर से दी गई?

क्या 2009 के आदेश का पालन हुआ?

क्या कभी स्वतंत्र ऑडिट कराया गया?
यदि नहीं, तो क्यों?

सुलग रहे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सीएसईबी प्रबंधन स्वयं स्कूलों के संचालन के लिए वित्तीय सहायता दे रहा था, तब विद्यार्थियों से प्राप्त शिक्षण शुल्क की राशि को खर्च करने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी?।जब तक इन सवालों के स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब सामने नहीं आते, तब तक सीएसईबी स्कूलों की फीस का यह मामला चर्चा, विवाद और जांच की मांग के केंद्र में बना रहेगा।

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