
‘पहले टेंडर में हिस्सा, फिर शर्तों पर सवाल’… हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, सिकासार-कोडार लिंक नहर परियोजना का रास्ता साफ
बिलासपुर। Paeri Project High Court Verdict छत्तीसगढ़ की बहुचर्चित ₹2,549.86 करोड़ की पैरी परियोजना (सिकासार-कोडार लिंक नहर पाइपलाइन) को लेकर मंगलवार को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए टेंडर प्रक्रिया को बड़ी कानूनी राहत दे दी। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने Offshore Infrastructures Limited की रिट याचिका खारिज करते हुए साफ कहा कि टेंडर की पात्रता शर्तें तय करना विभाग का अधिकार है, अदालत किसी बोलीदाता के लिए नियम नहीं बदल सकती।
इस फैसले के साथ ही गरियाबंद के सिकासार जलाशय से महासमुंद के कोडार जलाशय तक बनने वाली महत्वाकांक्षी लिंक नहर (पाइपलाइन) परियोजना के क्रियान्वयन का रास्ता लगभग पूरी तरह साफ हो गया है।
क्या था पूरा विवाद?
याचिकाकर्ता कंपनी ने जल संसाधन विभाग की निविदा की धारा 1.3(b) को चुनौती देते हुए दावा किया था कि अनुमानित लागत के मुकाबले दोगुने औसत वार्षिक टर्नओवर की शर्त भेदभावपूर्ण है और इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है। कंपनी ने अपनी तकनीकी बोली खारिज किए जाने पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि इससे एल-1 बोलीदाता Dilip Buildcon Limited को फायदा मिला।
लेकिन सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि कंपनी ने Annexure-XI के निर्धारित प्रारूप में अनिवार्य शपथ पत्र प्रस्तुत नहीं किया था और आवश्यक वित्तीय पात्रता भी पूरी नहीं की थी।
हाईकोर्ट की दो टूक
खंडपीठ ने कहा कि किसी भी परियोजना की तकनीकी और वित्तीय जरूरतों का आकलन संबंधित विभाग बेहतर तरीके से कर सकता है। अदालत का काम टेंडर की शर्तों को दोबारा लिखना या किसी एक कंपनी को राहत देने के लिए पात्रता मानदंड बदलना नहीं है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कोई कंपनी पहले टेंडर प्रक्रिया में भाग लेती है और तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित होने के बाद उन्हीं शर्तों को चुनौती देती है, तो ऐसी चुनौती कानून की कसौटी पर टिकती नहीं है।
मिलीभगत के आरोप भी नहीं टिके
याचिकाकर्ता ने टेंडर प्रक्रिया में पक्षपात और मिलीभगत के आरोप लगाए थे, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। विशेषज्ञ टेंडर मूल्यांकन समिति के निर्णय में हस्तक्षेप करने का भी कोई आधार नहीं मिला।
परियोजना को मिली बड़ी राहत
अदालत ने माना कि सरकार और टेंडर समिति की प्रक्रिया में न तो मनमानी, न भेदभाव और न ही कोई कानूनी त्रुटि पाई गई। इसके साथ ही रिट याचिका खारिज कर दी गई और सभी लंबित अंतरिम आवेदन भी समाप्त मान लिए गए।अब हाईकोर्ट की इस मुहर के बाद ₹2,549.86 करोड़ की पैरी परियोजना के टेंडर और निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने में कानूनी बाधाएं लगभग समाप्त हो गई हैं।






