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KORBA POLITICAL: सरोज पांडे की “बचपन की टिकट” से भविष्य की राजनीति की पटकथा, सामाजिक कार्यक्रम बनाम सियासी रणनीति..?

कोरबा। Saroj Pandey Korba political strategy कोरबा की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज होती दिख रही है। सामाजिक कार्यक्रम “बचपन की टिकट” के जरिए सरोज पांडे की सक्रियता ने न सिर्फ महिलाओं के बीच नई ऊर्जा पैदा की है, बल्कि इसे भविष्य की राजनीतिक समीकरणों की बिसात के तौर पर भी देखा जा रहा है। भले ही मंच से इसे गैर-राजनीतिक पहल बताया जा रहा हो, लेकिन इसकी टाइमिंग, मौजूदगी और स्वरूप कई संकेत दे रहे हैं।

Korba political होटल गणेश इन में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान सरोज पांडेय ने “सखी-सहेली” महिला समूह के बैनर तले 12 अप्रैल को अशोक वाटिका में इस आयोजन की जानकारी दी। उन्होंने इसे पूरी तरह गैर-राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रम बताया, जिसका उद्देश्य महिलाओं को उनकी व्यस्त जिंदगी से निकालकर बचपन की यादों से जोड़ना है।

हालांकि, स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय बाद सरोज पांडेय की कोरबा में इस तरह की सक्रिय मौजूदगी सिर्फ सामाजिक सरोकार तक सीमित नहीं है। कार्यक्रम के मंच से भले ही राजनीतिक भाषणों से दूरी की बात कही गई हो, लेकिन बड़ी संख्या में महिलाओं को जोड़ने की यह पहल जमीनी नेटवर्क मजबूत करने की रणनीति के तौर पर भी देखी जा रही है।

प्रेस वार्ता में भाजपा संगठन और निगम से जुड़े कई प्रमुख चेहरे मौजूद रहे, जिनमें कोरबा महापौर संजू देवी राजपूत , भाजपा जिला अध्यक्ष गोपाल मोदी, पार्षद नरेंद्र देवांगन, विकास अग्रवाल, पार्षद हितानंद अग्रवाल और प्रीति स्वर्णकार शामिल हैं। यह उपस्थिति भी संकेत देती है कि कार्यक्रम को संगठनात्मक स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है।

बताया गया कि यह कार्यक्रम 12 अप्रैल को शाम 4 बजे से 8 बजे तक आयोजित होगा, जिसमें महिलाओं के लिए पारंपरिक खेल, मनोरंजन गतिविधियां और पुरस्कार रखे गए हैं। दुर्ग में इस तरह के आयोजन की सफलता का हवाला देते हुए कोरबा में भी बड़े स्तर पर भागीदारी की उम्मीद जताई गई है।

कुल मिलाकर, “बचपन की टिकट” जहां एक ओर महिलाओं के लिए भावनात्मक जुड़ाव और मनोरंजन का मंच बन रहा है, वहीं दूसरी ओर यह कार्यक्रम कोरबा की राजनीति में नए समीकरणों और सक्रियताओं की आहट भी दे रहा है।

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