
सुशासन का सेल्फी उत्सव
सुशासन अब व्यवस्था कम और इवेंट ज्यादा लगने लगा है। फर्क सिर्फ इतना रह गया है कि पहले शासन चलता था, अब “शो” चलता है। काम कम होता है, कैमरों के एंगल ज्यादा सेट किए जाते हैं।
जनता को सुविधा मिले या न मिले, मंच और बैकड्रॉप चमकदार जरूर होना चाहिए।कोरबा में इन दिनों सुशासन का नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। पहले से खबर कर दी जाती है कि साहब आने वाले हैं। फिर व्यवस्था को इस तरह सजाया-संवारा जाता है, मानो किसी बड़े आयोजन की तैयारी हो। नाम दिया जाता है “सुशासन तिहार”, लेकिन असल मकसद समस्याओं का समाधान कम और तस्वीरों में सब कुछ बेहतर दिखाना ज्यादा नजर आता है।भोली जनता को उम्मीद थी कि इस अभियान से फाइलें तेजी से चलेंगी, दफ्तरों के चक्कर कम होंगे, शिकायतों पर सुनवाई होगी और टूटी सड़कें सचमुच सुधरेंगी। लेकिन यहां तो गड्ढों पर मिट्टी डालकर, दीवारों पर चुना पोतकर और अफसरों के सामने मुस्कान बिखेरकर विकास का माहौल तैयार किया जा रहा है। लेमरू गांव सुशासन का मॉडल कम और “सेट डिजाइन” ज्यादा नजर आया। चार दिनों तक ऐसा माहौल बना रहा, जैसे गांव में प्रशासनिक निरीक्षण नहीं बल्कि कोई बड़ा समारोह होने वाला हो। जहां वर्षों से धूल उड़ती थी, वहां अचानक सफाई अभियान तेज हो गया। जिन रास्तों पर लोग रोज परेशान होते थे, वहां मिट्टी डालकर विकास का अस्थायी मेकअप कर दिया गया। टूटी व्यवस्थाओं पर ऐसा रंग-रोगन हुआ कि समस्याएं भी खुद को पहचान न पाएं।असल सवाल यह है कि सुशासन का उद्देश्य समस्याएं खत्म करना है या उन्हें कुछ समय के लिए छिपा देना। अब मानो नया फॉर्मूला यही बन गया है कि गड्ढे रहें, लेकिन कैमरे में न दिखें। शिकायतें रहें, लेकिन माइक तक न पहुंचें। जनता परेशान रहे, मगर मंच पर तालियां बजती रहें।।पूरी व्यवस्था इस अंदाज में तैयार होती है कि साहब आएं, निरीक्षण करें, संतुष्ट दिखें और लौट जाएं। उधर दर्शक दीर्घा में बैठी जनता भी धीरे-धीरे रंगी हुई दीवारों और अस्थायी सजावट को ही विकास मानने लगी है। शायद यही वजह है कि इस बार सुशासन, व्यवस्था सुधार से ज्यादा “सेल्फी उत्सव” बनकर नजर आ रहा है।
थाने में नहीं मिल रहे थानेदार, अब की बार… आईजी से गुहार!
“अब की बार…” भाजपा का यह चुनावी नारा भले ही सियासत में सुपरहिट रहा हो, लेकिन कोरबा में साइबर ठगी के पीड़ितों ने इसे अपने अंदाज में नया रूप दे दिया है। शहर में चर्चा है “थाने में नहीं मिल रहे थानेदार, अब की बार आईजी से गुहार!”
दरअसल, सरकार की मंशा के अनुरूप मिनी भारत कहे जाने वाले कोरबा में साइबर थाना स्थापित किया गया, ताकि ऑनलाइन ठगी के शिकार लोगों को त्वरित राहत और न्याय मिल सके। सोच अच्छी थी, व्यवस्था भी बनाई गई, लेकिन अब सवाल सिस्टम की कार्यशैली पर उठने लगे हैं। सूत्रधार की माने तो साइबर थाने में पदस्थ थाना प्रभारी अक्सर किसी न किसी ड्यूटी में व्यस्त रहते हैं। कभी विधानसभा ड्यूटी, कभी आईपीएल सुरक्षा व्यवस्था, तो कभी ट्रेनिंग। ऐसे में ऑनलाइन फ्रॉड के शिकार लोग शिकायत लेकर थाने पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर यही जवाब मिलता है “साहब अभी ट्रेनिंग में हैं…”, “वीआईपी ड्यूटी में गए हैं…”। नतीजा यह है कि ठगी का शिकार आम नागरिक एफआईआर दर्ज कराने के लिए थाने के चक्कर काटने को मजबूर हैं। पीड़ितों का कहना है कि साइबर अपराध में समय सबसे अहम होता है, लेकिन कार्रवाई शुरू होने से पहले ही कई बार देर हो जाती है।
शहर में अब यह सवाल खुलकर उठने लगा है कि जब साइबर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, तब साइबर थाने में जिम्मेदार अधिकारी की नियमित मौजूदगी क्यों सुनिश्चित नहीं हो पा रही? जनमानस के बीच चर्चा है कि यदि स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं हुई, तो पीड़ितों को अब सीधे आईजी कार्यालय का दरवाजा खटखटाना पड़ सकता है।
सफाई कमांडर और निगम का बवंडर
सुशासन की सरकार में निगम के ‘त्रिदेव’ एक से बढ़कर एक बवंडर मचा रहे हैं। स्वच्छता रैंकिंग और सफाई के नाम पर ‘सफाई कमांडर’ तैनात किए गए हैं, जो फील्ड में कम दिखते हैं और बिल ज्यादा लिखते हैं। अफसरों के तिकड़ी शातिर अंदाज को भांपकर अब जनमानस भी कहने लगा है “सफाई कमांडर के बहाने, अफसर मचा रहे बवंडर!”
कहते हैं कि सोच से बड़ा कोई हथियार नहीं होता। सरकारी सिस्टम में अधिकारियों की सोच ही उनके कार्यों की दिशा तय करती है। लेकिन जब सोच सिर्फ दिखावे और फोटो खिंचाने तक सीमित हो जाए, तो विकास ‘स्व-कल्याण’ में तब्दील हो जाता है। यही हाल शहर का भ्रमण करने पर दिखता है, जो चुनावी वादे की तरह देखने में तो सुंदर लगता है, लेकिन धरातल की हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
अगर शहर की सफाई व्यवस्था की बात की जाए, तो कचरा साफ करने के लिए ‘थ्री-लेयर’ (तीन स्तरीय) टीम लगी हुई है। इसमें सबसे बेहतरीन काम डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन करने वाली ‘स्वच्छता दीदियों’ का है। दूसरी ओर, जिन्हें नाली और सड़क साफ करने का ठेका मिला है, वे ठेकेदार सिर्फ कोरम पूरा करने और अधिकारियों का ‘कल्याण’ करने में जुटे हैं।सफाई पर भारी-भरकम खर्च होने के बाद भी सफाई कर्मचारियों का ऐसा टोटा (कमी) है कि ठेकेदार और उनके सुपरवाइजर सिर्फ इस गली से उस गली लेबर शिफ्ट करने का खेल खेल रहे हैं। इसके अलावा सफाई कमांडर के नाम पर चालीस-चालीस लोगों की तैनाती, ‘सोने पर सुहागा’ साबित हो रही है। चर्चा तो यह भी है कि शहर का कचरा भले ही साफ न हो रहा हो, लेकिन सफाई के नाम पर चल रही इस खुली लूट से निगम की तिजोरी जरूर साफ हो रही है।
रील वाला एक्शन और रियल वाला…!
इन दिनों पुलिसिंग भी दो हिस्सों में बंट चुकी है एक रील वाली पुलिस और दूसरी रियल वाली पुलिस। रील वाली पुलिस बिजली की रफ्तार से दौड़ती है, मोबाइल पर मैसेज उड़ते हैं, चेक पोस्ट सेकंडों में लग जाते हैं और अपराधी अगले ही सीन में धर दबोचा जाता है। जबकि रियल वाली पुलिस में आवेदन घूमता रहता है, फरियादी चक्कर काटता रहता है और जवाब मिलता है “जांच जारी है।”
रायगढ़ पुलिस का हालिया मॉक ड्रिल वीडियो इसी दौर का सुपरहिट ट्रेलर है। दृश्य बड़ा सिनेमाई है महिला सड़क पर चल रही है, बाइक सवार आते हैं, बैग छीनते हैं और हवा हो जाते हैं। महिला दौड़ते हुए पुलिस अफसर के पास पहुंचती है। अफसर तुरंत एक्टिव मोड में आता है, हुलिया पूछता है, मोबाइल पर संदेश उड़ता है और अगले ही फ्रेम में पुलिस अपराधियों को पकड़ लेती है। यह देखकर लगा कि रायगढ़ पुलिस एक्टिव हो चुकी है, अपराध करने वालों को शहर छोड़ना होगा। मगर समस्या यह है कि यह सिर्फ “मॉक ड्रिल” थी यानि अपराध भी अभिनय था और एक्शन भी अभिनय। असली जिंदगी में कहानी इतनी तेज नहीं चलती। वहां फरियादी पहले थाने में अपनी बात साबित करता है कि उसके साथ सचमुच घटना हुई है। फिर आवेदन लिखा जाता है, फिर जांच बैठती है, फिर महीनों बाद पता चलता है कि केस अभी “प्रोसेस” में है।
रील में पुलिस का नेटवर्क 5G स्पीड से चलता है, लेकिन जमीन पर अक्सर शिकायतें 2G की रफ्तार से भी धीमी पड़ जाती हैं।विडंबना देखिए मॉक ड्रिल में अपराधी भाग नहीं पाता, मगर हकीकत में पीड़ित ही थककर बैठ जाता है। असल में अब पुलिस का नया काम सिर्फ कानून व्यवस्था संभालना नहीं, कंटेंट क्रिएशन भी हो गया है। कहीं हेलमेट चेकिंग का सिनेमैटिक वीडियो, कहीं ड्रोन शॉट में फ्लैग मार्च, कहीं बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ “ऑपरेशन अपराध मुक्त”। जनता भी कुछ देर के लिए प्रभावित हो जाती है “वाह! पुलिस कितनी एक्टिव है।”
लेकिन जनता का सवाल बड़ा सीधा है, अगर मोबाइल पर एक मैसेज से मॉक ड्रिल में अपराधी पकड़ा जा सकता है, तो असली शिकायतों में वही तत्परता कहां चली जाती है? असल पुलिसिंग कैमरे के सामने नहीं, कैमरे बंद होने के बाद दिखती है। रील में अपराधी पकड़ना आसान है, रियल में भरोसा पकड़ना मुश्किल। पुलिस अगर सचमुच अपनी छवि बदलना चाहती है, तो उसे वायरल वीडियो से ज्यादा वायरल भरोसा बनाना पड़ेगा। क्योंकि जनता अब सिर्फ “एक्शन सीन” नहीं देखना चाहती, उसे असली एक्शन चाहिए।
टीआरपी के लिए कारकेट की गिनती
कल गृहमंत्री अमित शाह रायपुर पहुंचे। एयरपोर्ट पर जब उनका स्वागत हुआ तो मीडिया भी वहां मौजूद थी। लेकिन, इस बार मीडिया का मिजाज कुछ बदला दिखा..ज्यादातर मीडिया चैनल उनके बस्तर दौरे की अहमियत को कवर करने की बजाए उनके कारकेट में चलने वाली वाहनों की संख्या गिनते मिले।
असल में मीडिया चैनल पर टीआरपी बढ़ाने का दबाव होता है…और उन्हें लगता है कि कारकेट में चलने वाली वाहनों की संख्या गिनने से उनकी टीआरपी बढ़ जाएगी। मीडिया ये बताने की कोशिश कर रहा था पीएम मोदी के ईंधन बचाने की अपील का असर खूब हो रहा है। मगर किसी ने ये सवाल नहीं उठाया रायपुर शहर के अफसर कालोनी में रहने वाले मंत्रालय कैडर के अधिकारी पर मोदी की अपील का कितना असर हो रहा है।
हालांकि सरकार ने अपना बचाव करते हुए विभाग प्रमुखों के लिए ईंधन बचाने के निर्देश दिए हैं। मगर इसे लागू करना उतना आसान नहीं होगा। मंत्रालय कैडर में सीनियर जूनियर और प्रमोटी अफसरों की अलग अलग लाबी हैं। तो मंत्रालय तक आने में कार पुलिंग रास्ते में ब्रेक हो जाएगी। अब देखना ये है कि अफसर इस मामले में कैसा रिएक्ट करते हैं।



