
रायपुर। Chhattisgarh Police Satire देश में आर्थिक विकास के कई मॉडल चर्चा में रहते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग के भीतर विकसित हो रहा एक अनौपचारिक आर्थिक मॉडल इन दिनों लोगों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है। इस मॉडल की खासियत यह है कि एक ही विभाग में कार्यरत लोग बिल्कुल अलग-अलग आर्थिक ग्रहों पर निवास करते दिखाई देते हैं।
एक तरफ वे अधिकारी हैं जिनका घर पूरी तरह वेतन पर चलता है। महीने की शुरुआत में घर की ईएमआई, वाहन की किश्त, बच्चों की फीस और घरेलू खर्चों का हिसाब लगाते-लगाते उनकी सैलरी का अधिकांश हिस्सा विदा हो जाता है। महीने के अंत तक उनकी जेब और चेहरा, दोनों समान रूप से थके हुए नजर आते हैं।
दूसरी तरफ विभाग में कुछ ऐसे कर्मी भी हैं, जिनकी आर्थिक प्रगति देखकर स्टार्टअप जगत के बड़े-बड़े उद्यमी भी प्रेरणा लेने लगें। नौकरी के कुछ वर्षों के भीतर आलीशान मकान, महंगी गाड़ियां, लग्जरी बाइक और ऐसा रहन-सहन कि आसपास के कारोबारी भी अपने व्यवसाय मॉडल पर पुनर्विचार करने लगें।
कहा जाता है कि राजधानी रायपुर के उरला क्षेत्र के कुछ उद्योगपति तो मजाक-मजाक में यह इच्छा भी जता चुके हैं कि यदि ऐसी तरक्की का कोई शॉर्टकट कोर्स उपलब्ध हो तो वे भी उद्योग छोड़कर सिपाही बनने पर विचार कर सकते हैं।
सूत्र बताते हैं कि राजधानी में वर्षों से पदस्थ एक सिपाही ने अपने नए मकान में लिफ्ट तक लगवा रखी है। वहीं कुछ सिपाहियों की जेब में चमकते लेटेस्ट प्रीमियम स्मार्टफोन देखकर कई व्यापारी भी कैलकुलेटर निकालकर अपनी वित्तीय स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करने लगते हैं।
कुछ कर्मियों ने तो निवेश का ऐसा अनोखा मॉडल विकसित किया है कि वित्तीय सलाहकार भी शोधपत्र लिखने का मन बना लें। चार पहिया वाहन खरीदकर उन्हें किराये पर संचालित कराने की व्यवस्था इतनी व्यवस्थित है कि अतिरिक्त आय के स्रोत पर प्रबंधन संस्थानों में केस स्टडी तैयार की जा सकती है।
इसी क्रम में एक जिम में आने वाले सिपाही की छह लाख रुपये कीमत वाली बुलेट मोटरसाइकिल भी चर्चा का विषय बनी। जब एक मित्र ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा, “इतनी महंगी बाइक?”तो जवाब मिला, “शौक़ की कोई कीमत नहीं होती जनाब।”और फिर मुस्कुराते हुए अगला लक्ष्य भी बता दिया गया हार्ले-डेविडसन।
उधर विभाग के कुछ वरिष्ठ और ईमानदार अधिकारी आज भी साधारण जीवनशैली में विश्वास रखते हैं। वे महंगे ब्रांडों की बजाय सेल में खरीदे गए कपड़ों से ही संतुष्ट दिखाई देते हैं। जबकि उनके अधीनस्थ कुछ कर्मचारी ऐसे फैशन में नजर आते हैं कि किसी कॉर्पोरेट कंपनी के सीईओ भी उनसे स्टाइल टिप्स मांग लें।
इन सबके बीच आम लोगों के मन में एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर एक ही वेतन संरचना वाले विभाग में आर्थिक उपलब्धियों का यह अंतर किस प्रबंधन सिद्धांत पर आधारित है?
कभी-कभी तो लगता है कि पुलिस विभाग में दो समानांतर अर्थव्यवस्थाएं संचालित हो रही हैं। पहली वह, जो वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार चलती है। दूसरी वह, जो शायद अर्थशास्त्र की किसी ऐसी गुप्त पुस्तक से संचालित होती है, जिसकी प्रति न आम जनता के पास है, न वित्त मंत्रालय के पास।






