
त्योहारों से पहले दूध और दुग्ध उत्पादों के दाम आसमान पर, कहीं गुणवत्ता तो कहीं मांग के नाम पर अलग-अलग रेट
कोरबा।Milk Prices in Korba दूध एक ही है, लेकिन उसका भाव अलग-अलग! कहीं 40 रुपए लीटर, तो कहीं सीधे 60 रुपए लीटर। आखिर ऐसा क्या है कि एक ही शहर में दूध की कीमत में इतना बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है? त्योहार और पर्व करीब आते ही दूध और उससे बनने वाले उत्पादों के दाम में जोरदार उछाल ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। सवाल सिर्फ महंगे दूध का नहीं, बल्कि दूध की गुणवत्ता और कीमत तय करने की व्यवस्था पर भी उठने लगा है।
सावन के चलते शिवालयों में दुग्धाभिषेक और घरों में धार्मिक आयोजनों के लिए दूध की मांग बढ़ी है। इसका सीधा असर बाजार में दूध की उपलब्धता और कीमत पर दिखाई दे रहा है। लेकिन मांग बढ़ना अपनी जगह है और एक ही उत्पाद के अलग-अलग दाम लगना अपनी जगह।
दूध के दाम में ‘डबल रेट’ का खेल?
बाजार में दूध 40 से 60 रुपए प्रति लीटर तक बिकने की बात सामने आ रही है। यदि कीमत में अंतर दूध की गुणवत्ता, फैट या अन्य निर्धारित मानकों के आधार पर है तो इसकी स्पष्ट जानकारी उपभोक्ताओं को मिलनी चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हर जगह कीमत का आधार तय है? क्या दूध की गुणवत्ता की नियमित जांच हो रही है? और क्या उपभोक्ता को बताया जा रहा है कि 40 और 60 रुपए वाले दूध में आखिर अंतर क्या है?यही वजह है कि दूध के अलग-अलग रेट ने निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
दही भी हुआ ‘गरम’, शुद्ध घी ने छुआ 1200 का आंकड़ा
दूध के दाम बढ़े तो असर उसके दूसरे रूपों पर भी दिखाई देने लगा है। 80 से 100 रुपए किलो बिकने वाला दही अब 100 से 120 रुपए किलो तक पहुंच गया है।
इधर शुद्ध घी के भाव भी 900 से 1200 रुपए किलो तक पहुंच चुके हैं। मांग बनी रहने के कारण फिलहाल कीमतों में तत्काल राहत की उम्मीद कम दिखाई दे रही है।
पनीर पर सख्ती, फिर भी भाव 450 से 480 रुपए किलो
एनालॉग पनीर यानी मिलावटी या निर्धारित मानकों से इतर पनीर की बिक्री पर कार्रवाई और जांच का दौर जारी है। इसके बावजूद बाजार में पनीर के भाव 450 से 480 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं।
त्योहारों और मांग के दिनों की दस्तक के साथ पनीर की कीमत में और तेजी की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में उपभोक्ताओं के सामने दोहरी चुनौती है, महंगा खरीदें या शुद्धता की चिंता करें।
मावा फिलहाल शांत, मिठाइयों का ट्रेंड बदला
मावा फिलहाल 280 से 300 रुपए किलो के आसपास बना हुआ है। हालांकि मावा से बनने वाली पारंपरिक मिठाइयों की मांग पिछले कुछ वर्षों में अपेक्षाकृत कमजोर हुई है। इसके पीछे मेवों और ड्राई फ्रूट्स से तैयार मिठाइयों की बढ़ती लोकप्रियता को प्रमुख वजह माना जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल: दूध का रेट तय कौन कर रहा है?
त्योहारों के सीजन में दूध और दुग्ध उत्पादों की मांग बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन एक ही बाजार में दूध के दाम में 20 रुपए तक का अंतर उपभोक्ताओं के लिए बड़ा सवाल है।
जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग दूध और दुग्ध उत्पादों की गुणवत्ता, फैट, मिलावट और कीमतों की पारदर्शिता को लेकर नियमित जांच करे, ताकि त्योहारों के मौसम में उपभोक्ताओं की जेब के साथ-साथ उनकी सेहत भी सुरक्षित रहे। दूध की कीमत भले बढ़ रही हो, लेकिन उपभोक्ता का सवाल अब सीधा है: दूध एक है तो रेट इतने अनेक क्यों?





