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Korba : कौन सुनेगा, किसको सुनाएं…! काम पूरा, पानी घर तक पहुंचा… फिर ठेकेदारों के भुगतान पर सरकार की चुप्पी क्यों?

कोरबा।Jal Jeevan Mission Contractors Pending Payment  कहते हैं उधारी का पटाखा फूटता नहीं, लेकिन जल जीवन मिशन के ठेकेदारों का दर्द अब सिर्फ उधारी तक सीमित नहीं रहा। महीनों की मेहनत, लाखों-करोड़ों का निवेश, मजदूरों की मजदूरी, मशीनों का खर्च और सामग्री की लागत झेलकर काम पूरा करने वाले ठेकेदार आज अपने ही भुगतान के लिए सरकारी दफ्तरों की चौखट नापने को मजबूर हैं।

सरकार ने जल जीवन मिशन को मिशन मोड में चलाया। लक्ष्य था गांव-गांव पानी पहुंचाना। ठेकेदारों ने भी सरकार के लक्ष्य को अपना समझकर धूप, बारिश और विपरीत परिस्थितियों में काम किया। पाइप बिछाए गए, सोलर कार्य पूरे किए गए, जल संरचनाएं तैयार हुईं। लेकिन जब मेहनत की कमाई लौटाने की बारी आई तो सरकारी फाइलों ने जैसे ब्रेक लगा दिया।

कहीं पूर्णता प्रमाण पत्र की अड़चन है तो कहीं अधिकारियों के हस्ताक्षर का इंतजार। कहीं जांच का हवाला है तो कहीं फाइल आगे बढ़ने की प्रक्रिया। सवाल यह है कि अगर काम पूरा कराने में सरकार को जल्दबाजी थी, तो भुगतान करने में इतनी सुस्ती क्यों?

ठेकेदार एसोसिएशन ने आवाज उठाई तो आश्वासन मिले। सोलर कार्यों के भुगतान को लेकर भरोसा दिलाया गया। लगा कि अब शायद राहत मिलेगी। लेकिन राहत की जगह कागजी औपचारिकताओं का एक और अध्याय खुल गया। अब ठेकेदारों को प्रमाण पत्र और हस्ताक्षरों की तलाश में विभागीय दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

सरकार से सीधा सवाल है: आखिर ठेकेदार कब तक इंतजार करें?

जिस काम को पूरा कराने के लिए विभाग ने समय-सीमा तय की, उसी काम का भुगतान करने की कोई स्पष्ट समय-सीमा क्यों नहीं है? ठेकेदारों ने काम में देरी की होती तो विभाग कार्रवाई करता, लेकिन जब विभाग भुगतान में देरी करता है तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?

यह सिर्फ ठेकेदारों का मामला नहीं है। भुगतान अटकने का असर मजदूरों, सप्लायरों, वाहन मालिकों और छोटे कारोबारियों तक पहुंचता है। एक भुगतान रुकता है तो उससे जुड़े कई परिवारों की आर्थिक गाड़ी भी अटक जाती है।

जल घर-घर पहुंचा या नहीं, इसकी समीक्षा बाद में होती रहेगी, लेकिन भुगतान के इंतजार में ठेकेदारों की आंखों का पानी जरूर सूखता जा रहा है।

सरकारी योजनाओं को जमीन पर उतारने वाले इन्हीं ठेकेदारों से काम लेते समय सरकार उन्हें अपना साझेदार मानती है, लेकिन भुगतान के समय वही साझेदार फाइलों के जंगल में अकेला क्यों छोड़ दिया जाता है?

अब ठेकेदारों की जुबां पर एक ही सवाल है…

 

“कौन सुनेगा, किसको सुनाएं?काम हमारा, खर्च हमारा…फिर भुगतान के लिए भी दर-दर भटकना हमारा?”सरकार को आश्वासनों से आगे बढ़कर लंबित भुगतान की स्पष्ट समय-सीमा तय करनी चाहिए और बिना अनावश्यक कागजी अड़चनों के पात्र ठेकेदारों का भुगतान तत्काल जारी करना चाहिए। आखिर विकास के नाम पर काम लेने वाली व्यवस्था को उन लोगों की मेहनत की कीमत भी समय पर चुकानी होगी, जिन्होंने उस विकास को जमीन पर उतारा है।

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