
“जब पूरा सिस्टम ही सेट हो, तो नियम सिर्फ किताबों में अच्छे लगते हैं!” आजकल ऊर्जाधानी कोरबा की सड़कों पर गाड़ियों के नंबर प्लेट गायब हैं, क्योंकि यहाँ गाड़ियां RTO के नंबर से नहीं, बल्कि ‘महीने की एंट्री’ और ‘पर्ची’ के दम पर दौड़ती हैं।
हाल ही में राजस्थान परिवहन विभाग का एक ऑडियो लीक हुआ था, जिसमें व्हाट्सऐप पर गाड़ियों की लिस्ट भेजकर ‘रास्ता साफ’ कराने का खेल सामने आया था। इसके बाद कोरबा की जनता में यह चर्चा तेज है कि ऐसा ही कोई ‘अदृश्य सेटिंग तंत्र’ यहाँ की सड़कों को भी चला रहा है।
फिल्म दीवार की तर्ज पर अगर आज कानून इन रसूखदार गाड़ी वालों से पूछे कि तुम्हारे पास क्या है? तो इनका सीना तानकर एक ही जवाब आता है “हमारे पास एंट्री है!” कहा तो यह भी जा रहा कि कागजों में गाड़ियां कम हैं, पर सड़कों पर बिना नंबर प्लेट का इनका पूरा कुनबा बेखौफ दौड़ रहा है। यह सिर्फ ट्रैफिक का नहीं, जनता की सुरक्षा का गंभीर मामला है। अगर बिना नंबर की गाड़ी से कोई बड़ा हादसा हो जाए, तो पुलिस किसे ढूंढेगी और जिम्मेदारी किसकी होगी? कानून का खौफ चालान काटने से नहीं, नियम मनवाने से दिखता है। वर्ना जनता तो यही कहेगी कि यहाँ ट्रैफिक व्यवस्था नहीं, बल्कि ‘सेटिंग एक्सप्रेस’ चल रही है जहाँ एंट्री फिक्स है और नंबर प्लेट लगाना बड़ा रिस्क है!





