मौसम ने बदली करवट: तेज आंधी के साथ झमाझम बारिश, चिलचिलाती गर्मी से मिली बड़ी राहत।राख की ‘काली आंधी’: अंधड़ चलते ही पावर प्लांटों से उड़ी राख, शहरवासियों ने प्रबंधन को कोसा। नदी उस पार त्राहिमाम: कुसमुंडा-गेवरा क्षेत्र में घरों और दफ्तरों में घुसा कोयले का डस्ट, सांस लेना हुआ दूभर।
कोरबा। Korba Storm and Coal Dust Pollution शनिवार की शाम ऊर्जाधानी कोरबा में प्रकृति का दोतरफा रंग देखने को मिला। एक ओर जहां तेज आंधी के बाद हुई झमाझम बारिश ने लोगों को झुलसाने वाली गर्मी से राहत दी और मौसम को सुहाना बना दिया, वहीं दूसरी ओर इसी आंधी ने जिले में जमकर तबाही भी मचाई। इस अंधड़ ने कोरबा की उस कड़वी हकीकत को एक बार फिर उजागर कर दिया है, जिससे यहां की जनता सालों से जूझ रही है “प्रदूषण का दंश!”
राख की ‘काली आंधी’ ने घेरा शहर, लोगों का फूटा गुस्सा
जैसे ही शाम को तेज हवाएं चलनी शुरू हुईं, शहर के आसमान पर धूल नहीं, बल्कि पावर प्लांटों के ऐशडैम (Ash Dyke) से उड़ी राख की चादर बिछ गई। विजिबिलिटी इतनी कम हो गई कि सड़कों पर चल रहे वाहनों की रफ्तार थम गई। राख की इस ‘काली बारिश’ से परेशान होकर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। शहरवासियों ने पावर प्लांट प्रबंधनों की घोर लापरवाही को आड़े हाथों लिया और सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक अपनी भड़ास निकाली। लोगों का साफ कहना है कि डस्ट सेप्रेशन (धूल और राख को दबाने) के पुख्ता इंतजाम न होने की सजा आज पूरा शहर भुगत रहा है।
नदी उस पार की कहानी: ‘काला सच’ और ब्लैक-आउट जैसी स्थिति
शहर में तो बारिश ने थोड़ी देर बाद स्थिति संभाल ली, लेकिन हसदेव नदी के उस पार यानी कोयलांचल (गेवरा, कुसमुंडा, दीपका क्षेत्र) की कहानी बेहद खौफनाक और अलग रही ।
घरों-दफ्तरों पर कब्जा:
आंधी इतनी भीषण थी कि खदानों से उड़ने वाला ब्लैक डस्ट (कोयले का बारूद) लोगों के घरों, ड्राइंग रूम और सरकारी दफ्तरों की फाइलों तक में घुस गया।
सांसों पर संकट:
कोयलांचल की हवा में इस कदर ब्लैक डस्ट घुल गया कि लोगों का दम घुटने लगा। आंधी के दौरान कुछ मिनटों के लिए ऐसा लगा मानो ‘ब्लैक-आउट’ हो गया हो। गृहणियों के लिए आफत खड़ी हो गई, क्योंकि घरों के भीतर रखी खाने-पीने की चीजें और कपड़े पल भर में काले पड़ गए।
राहत भी… आफत भी
हालांकि, आंधी के गुबार के बाद जब बादलों ने डेरा डाला और बारिश की बूंदें टपकीं, तो तापमान में भारी गिरावट दर्ज की गई। पिछले कई दिनों से नौतपा जैसी गर्मी झेल रहे कोरबा वासियों के लिए यह बारिश ठंडी हवा के झोंके की तरह आई। मौसम विभाग के अनुसार, इस बारिश से वातावरण में ठंडक घुली है, लेकिन आंधी के कारण कई इलाकों में पेड़ों के गिरने और बिजली के तार टूटने से बत्ती भी गुल रही
विकास की कीमत चुकाते फेफड़े
यह कोई पहली आंधी नहीं है जिसने कोरबा को इस हाल में छोड़ा हो। जब-जब आंधी आती है, नदी के इस पार राख का साम्राज्य होता है और नदी के उस पार कोयले का। बारिश ने मौसम तो सुहाना कर दिया, लेकिन यह सवाल जस का तस छोड़ दिया कि आखिर कब तक कोरबा की जनता को इस सुहाने मौसम के बदले अपने फेफड़ों की बलि देनी पड़ेगी? पावर प्लांट और खदान प्रबंधनों की यह चुप्पी अब गुनाह जैसी लगने लगी है।



