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Rahul’s class : 3 दिन 3 सवाल पुलिसिंग किंग बेहाल,सोने की दुकान के लिए चांदी का गार्डन..राख का संविधान “ऊपर से बात हो चुकी है” भ्रष्टाचार की आग…

3 दिन 3 सवाल पुलिसिंग किंग बेहाल

 

Kataksh : पॉवर सिटी में इन दिनों पुलिसिंग नहीं, तुरंत प्रभाव से आदेश बनामआदेश का खेल चल रहा है। कसावट की जगह व्यक्तिगत कृपा ने ले ली है। यहां प्रभार देने की प्रक्रिया इतनी फुर्तीली है कि प्रभारी पद पर पदभार ग्रहण करते करते (प्र)भार उतारने की रसीद भी कट जाती है। साइबर थाना प्रभारी की नियुक्ति पर जैसे ही सवाल उठे, साहब को अचानक नियम-कायदे याद आ गए और जिस तमगे को पूरे ठाठ से पहनाया गया था, वह महज तीन दिन में उतार भी लिया गया। 24 और 27 जनवरी के आदेश की पर्ची अब विभाग में इतिहास में विरासत बनकर रह गई है।

असल में पॉवर सिटी में थानेदारी अब योग्यता, अनुभव या प्रक्रिया से नहीं, बल्कि बड़े अफसरों की खुशी के तराजू पर तौली जा रही है। साइबर थाने के प्रभार को लेकर दिखाई गई जल्दबाजी ने पुलिसिंग की समझ पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।महकमे में आदेश पर आदेश बदलने की इस रफ्तार ने आम आदमी को भी उलझन में डाल दिया है। सवाल सीधा है कि अगर नियुक्ति गलत थी तो तीन दिन पहले सही कैसे थी, और अगर सही थी तो तीन दिन में गलत कैसे हो गई।

खाकी के गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि अनुभवी और कड़क आईजी के पदस्थ होते ही नियम-कायदे अचानक जिंदा हो गए। इससे पहले तक वही नियम फाइलों में आराम फरमाते रहे।पॉवर सिटी की पुलिसिंग का मौजूदा हाल यही बताता है कि यहां कानून बाद में आता है, आदेश पहले। और थानेदारी अब जिम्मेदारी नहीं, भरोसे का इनाम बन चुकी है। कुल मिलाकर पॉवर सिटी की पुलिसिंग का हाल यही है – “साहब का आदेश हो तो सब कुछ खास… और साहब बदलें तो सब कुछ इतिहास!”

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सोने की दुकान के लिए चांदी का गार्डन

Kataksh: गरीब हटे तो जनहित,गरीब उजड़े तो व्यवस्था,और उसी जगह किसी खास को सीधा लाभ मिले तो उसे प्लानिंग कहा जाता है। एक गार्डन जो बना है सिस्टम की प्राथमिकताओं का स्मारक..जाने क्या है बात..

1991 की फिल्म भाभी का वह मशहूर गीत आज भी कानों में बजता है“चांदी की साइकिल और सोने का सीट…”अपने दौर में सुपरहिट रहा यह गीत अब कोरबा में नए बोलों के साथ रीमेक बन चुका है“सोने की दुकान और चांदी का गार्डन।”और इस नए संस्करण के नायक कोई फिल्मी हीरो नहीं, बल्कि नगर निगम के अफसर हैं।

कहानी शुरू होती है पुराने कोरबा से, जहां सड़क किनारे बरसों से बैठे फुटकर व्यापारी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते रहे। अचानक एक सुबह खबर आई ठेले हटेंगे, अतिक्रमण साफ होगा, शहर सुंदर बनेगा। लोगों को लगा कि शायद इंदौर मॉडल उतर रहा है। सोचा गया कि सड़कें खुलेंगी, व्यवस्था सुधरेगी और शहर सांस ले पाएगा।मगर यह सपना ज्यादा देर टिक नहीं पाया।हटा दिए गए ठेले, छिन गई रोजी-रोटी और उसी खाली जगह पर उग आया एक गार्डन। नाम तो गार्डन है, पर हरियाली से ज्यादा वहां हितों की चमक दिखाई देती है। पास की सोने की दुकान की शोभा इस “चांदी के गार्डन” से ऐसी बढ़ी, मानो विकास ने सीधे ज्वेलरी काउंटर तक एंट्री ले ली हो।

शहर में अब लोग मुस्कराकर कहते हैं यह गार्डन चांदी का है, क्योंकि यहां पेड़ों से ज्यादा फायदे चमकते हैं। तर्क दिया जाता है कि शहर सुंदर बनाने के लिए यह सब जरूरी था। सवाल बस इतना है कि सुंदरता की कीमत हर बार गरीब ही क्यों चुकाए? और विकास का फायदा हमेशा गिने-चुने लोगों की दुकान तक ही क्यों सिमट जाए?आज कोरबा में विकास की नई परिभाषा लिखी जा रही है।ठेला हटे तो जनहित में,गार्डन बने तो खास हित में।और बाकी जनता?वह पुराने गानों के नए बोल गुनगुनाकर बस इतना कह देती है“चांदी की साइकिल तो गई, अब सोने की दुकान का गार्डन देख लो।”

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राख का संविधान “ऊपर से बात हो चुकी है”

पॉवर हब कोरबा में इन दिनों राख उड़ नहीं रही, सिफारिशें बरस रही हैं और पैसों की बारिश हो रही है। चर्चा में वे तांत्रिक हैं, जो न मंत्र पढ़ते हैं न हवन करते हैं। बस सही नंबर डायल करते हैं और राख अपने आप रास्ता खोज लेती है। पॉवर प्लांट में चल रहे इस खेल को ट्रांसपोर्टर खुले शब्दों में कहने लगे हैं राख में सिफारिश भी है और पैसों की बारिश भी।

वैसे तो कोरबा में राख के लिए सिफारिश कोई नई खोज नहीं है, लेकिन इस बार मामला हाई अप्रोच का है। इतनी हाई कि नीचे खड़े नियम अपने आप छोटे नजर आने लगते हैं। यहां नियम रास्ता रोकते नहीं, बस इशारों का इंतजार करते हैं। असल में दिलीप बिल्डकॉन की सलिहाभांठा गिट्टी खदान में फ्लाई एश भराई को लेकर ठेकेदारों की गिद्ध दृष्टि टिकी हुई है। दस लाख घन मीटर कंजम्पशन वाली इस खदान को भरने के लिए सत्ता का एक संगठित गिरोह बालको की फ्लाई एश पर हाथ साफ करने की तैयारी में है। पर्यावरण नियम बीच में खड़े हैं, इसलिए सीधा रास्ता नहीं चुना जा रहा। दबाव, पहुंच और पहचान के शॉर्टकट अपनाए जा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि सफेद सोना कही जाने वाली फ्लाई एश के लिए शहर के कई धन्ना सेठ घुटने टेककर आकाओं के चक्कर काट रहे हैं। लाइजनिंग के इस खेल में सिस्टम को शांत रखने की पूरी कोशिश हो रही है। नियम पूछने वालों को एक ही जवाब मिलता है“ऊपर से बात हो चुकी है।” और यहीं से कोरबा की असली कहानी शुरू होती है।

कहते हैं लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं। लेकिन कोरबा की राख गवाही देती है कि यहां सिस्टम कभी नहीं बदलता। सत्ता किसी की भी हो, राख का खेल उसी के पाले में जाता है, जिसके नाम के आगे “हाई लेवल सिफारिश” जुड़ी हो।यहां राख सिर्फ चिमनियों से नहीं निकलती।यह फोन कॉल से निकलती है।पर्चियों से बहती है।इशारों में ट्रक भरकर चलती है।नियमों की किताब भले मोटी हो, फाइलें हल्की ही रहती हैं। ऊपर से हल्का सा दबाव पड़ते ही सब कुछ अपने आप सही दिशा में बहने लगता है। कोरबा में सवाल यह नहीं है कि राख कहां जाएगी। सवाल सिर्फ इतना है किसके इशारे पर जाएगी।

भ्रष्टाचार की आग

मार्च क्लोसिंग से पहले छत्तीसगढ़ में छुट्टी के दिन आग आग का खेल चल रहा है। राजधानी के आबकारी भवन में ऑडिट शुरु होने से ठीक पहले आग लगने से कई दस्तावेज और महत्वपूर्ण फाइलें जल गई। अब विभाग ने इसके लिए जांच कमेटी बना दी है। इसी आग में निगम के आय-व्यय का बहीखाता भी जल गया।

छुट्टी वाले रविवार के दिन ही रायगढ़ के मछली पालन विभाग के रिकार्ड रूम में भी अचानक आग लग गई। रिकॉर्ड रूम में रखे कई जरूरी दस्तावेज जल गए। दोनों घटना छुट्टी के दिन रविवार को हुई। वो भी तब जब विभाग के अफसर आफिस बंद करके बाहर निकले। दोनों घटनाओं की टाइमिंग और तरीका एक जैसा ही नजर आता है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि मार्च के महीने में जब वित्त विभाग ने विभागीय खरीदी और चेक जारी करने पर रोक लगा दी है तब इस तरह की घटना होना कहीं विभाग के काले कारोबार को राख से ढंकने की साजिश तो नहीं। ये आग दुर्घटना ही है या भ्रष्टाचार की आग सोच समझ के लगाई गई, ये जांच के बाद पता चलेगा।

राहुल की क्लास

इसी सप्ताह मंगलवार 10 फरवरी को दिल्ली में कांग्रेस के नव नियुक्त जिलाध्यक्षों का प्रशिक्षण शिविर होने वाला है। जिसमें छत्तीसगढ़ सहित 9 राज्यों के पदाधिकारी शामिल होंगे। इस विशेष प्रशिक्ष्रण शिविर में राहुल गांधी के साथ खुद मल्लिकार्जुन खरगे भी होंगे। दो चरणों में होने वाले विशेष प्रशिक्ष्रण शिविर में सभी पदाधिकारियों को उपस्थित होना अनिवार्य होगा।

वैसे तो पार्टी की ओर से कहा गया है कि जिलाध्यक्ष संगठन की रीढ़ होते हैं, इसलिए उन्हें वैचारिक, संगठनात्मक और रणनीतिक रूप से मजबूत बनाया जाएगा। मगर इसके पीछे गुटों में बंटी कांग्रेस को डीसीसी बा​डी के जरिये साधने की तैयारी है। राहुल गांधी खुद जिलाध्यक्षों वन-टू-वन चर्चा भी करेंगे। वो जिलाध्यक्ष अपने-अपने जिलों की सामाजिक परिस्थितियों, राजनीतिक चुनौतियों, संगठन की स्थिति और कांग्रेस में गुटबाजी का दूर करने के लिए क्या क्या किया जा सकता है इसका फीड बैक भी लेंगे।

असल में राहुल गांधी ये बात अच्छी तरह से समझ चुके हैं​ कि, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ कांग्रेस की हार का बड़ा कारण प्रदेश के नेताओं में मची गुटबाजी रही। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच सीएम पद की शेयरिंग को लेकर गुटीय लड़ाई में पार्टी का बंटाधार हो गया। और अब ऐसा ही कर्नाटक में हो रहा है, जहां सीएम पद की शेयरिंग की लड़ाई रूक नहीं रही है।

कुल मिलाकर कांग्रेस के नव नियुक्त जिलाध्यक्षों के लिए राहुल की क्लास अहम होने वाली है। खबरीलाल की माने तो राहुल डीसीसी को मजबूत करके नेताओं की आपसी लड़ाई से ​छुटकारा पाना चाहते हैं। साथ ही राहुल की क्लास प्रदेश के नेताओं को ये संदेश भी होगा अब उनकी सूबेदारी से नहीं डीसीसी बा​डी की सिफारिश से कांग्रेस चलेगी। अब देखने वाली बात ये होगी क्या डीसीसी के नवनियुक्त अध्यक्ष राहुल की क्लास में मिले होम वर्क को पूरा कर पाएंगे या यह प्रशिक्ष्रण शिविर केवल शिविर बन कर रह जाएगा।

     ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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