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Bengal’s victory, impact in : कोयला-कमाई और सिस्टम,ग्रीन कॉरिडोर’ और बदलते मोहरे..सत्ता की छतरी’में 26 साल की नौकरी,बोतल पर बोतल

कोयला-कमाई और सिस्टम

 

Bengal’s victory impact in coal system “लुका-छिपी बहुत हुई, सामने आ जा ना…” लता दीदी का यह गीत कभी प्यार-मोहब्बत की मासूमियत पर लिखा गया होगा। लेकिन नदी उस पार के थाने में आजकल यह गाना कुछ अलग अंदाज में गाया जा रहा है। यहां साहब जब ईमानदारी, अनुशासन और कानून का लंबा-चौड़ा भाषण देते हैं, तो पीछे से कोयले की धूल उड़ाते ट्रकों की आवाज कुछ और ही कहानी कहती है।

एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदानों की गोद में बैठे इस थाने में इन दिनों बड़ा दिलचस्प खेल चल रहा है। इधर नदी उस पार ‘काली लक्ष्मी’ निकालने वाले जान हथेली पर रखकर रात भर कोयला खींच रहे हैं, उधर साहब नियम-कायदों का पर्दा ओढ़कर बैठे हैं। असल में कोयला काला जरूर होता है, लेकिन इसकी चमक बड़े-बड़ों की नीयत बदल देती है। अब जब घर बैठे ‘ऊपरी कमाई’ हो रही है, तो मौका लपकने में ही मलाई है।

इस खबर का क्लाइमैक्स अभी बाकी है। कहानी में नया मोड़ तब आया, जब कोयला चोरी रोकने गए एसईसीएल कर्मचारी की पिटाई हो गई। मामला सोशल मीडिया तक पहुंचा और सवाल उठने लगे। कोयला-राग के एक जानकार ने खबरीलाल को बताया, तुम नाहक परेशान हो रहे हो… पहले कोयला जमीन से निकलता था, अब सिस्टम से निकलता है। किसकी नजर बचाकर कितना निकला, यही असल सवाल है।

अब सिस्टम ऐसा है कि साहब कानून का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन ‘काली लक्ष्मी’ की गाड़ियां बिना ब्रेक दौड़ती रहती हैं। कागजों में सब साफ-सुथरा दिखता है, लेकिन रात होते ही सिस्टम की चौखट से ऐसा रास्ता निकलता है, जहां नियम खुद रास्ता पूछते फिरते हैं। अब देखना यह है कि साहब की यह ‘लुका-छिपी’ कब तक चलती है।

टेंडर के लिए ‘ग्रीन कॉरिडोर’ और बदलते मोहरे, मलाई की फाइलें

 

शहर की सरकार बदली तो लगा था कि अब निगम के दफ्तरों से भ्रष्टाचार की धूल झाड़ दी जाएगी। मगर हुआ वही, जो हर बार होता है,दीवारों पर नया पेंट चढ़ा, लेकिन अंदर की सीलन जस की तस रही। व्यवस्था “शहर की सरकार” क्या बदली, व्यवस्था के सूरमाओं ने लूट का व्याकरण ही बदल दिया। कहने को तो व्यवस्था परिवर्तन हुआ है, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाड़ियों के लिए यह महज ‘पुरानी शराब में नई बोतल’ जैसा है। टेंडर मैनेज करने वाले सिंडिकेट ने नए निजाम में भी सेंध लगा ली है; शतरंज की बिसात वही है, बस मोहरे बदल दिए गए हैं।

साकेत से पंचवटी तक ‘त्रिदेव’ का पहरा निगम के गलियारों में चर्चा आम है कि अब साकेत भवन (मुख्यालय) के टेंडरों की पटकथा पंचवटी में बैठकर ‘त्रिदेव’ लिख रहे हैं। ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे’ की तर्ज पर चहेते ठेकेदारों की सूची पहले ही मुकम्मल कर ली गई है। टेंडर की तकनीकी औपचारिकताएं तो महज एक दिखावा हैं, दरअसल लिफाफा उसी का खुलेगा जो इस सिंडिकेट के ‘फिटनेस टेस्ट’ में पास होगा और असल खेल तो वहीं शुरू होता है, जहां “फिटनेस टेस्ट” का मतलब योग्यता नहीं, बल्कि ‘योगदान’ होता है।
नया कॉरिडोर, पुरानी मलाई का एक दौर था जब निगम में टेंडर मैनेज करने की एक खास टीम थी, जो एक निश्चित ‘दक्षिणा’ लेकर सबका बेड़ा पार लगा देती थी। लेकिन अब हवा का रुख बदल चुका है। नया ‘ग्रीन कॉरिडोर’ बनते ही सत्ता का समीकरण ऐसा उलझा है कि मलाई किसी और के हिस्से जा रही है। टेंडर मैनेज के इस बहती गंगा में हाथ धोने से ‘सुलझे हुए पंडित जी’ भी पीछे नहीं हैं। चर्चा है कि पंडित जी अब जोन कार्यालयों की निविदाओं में अपना मंत्र फूंक रहे हैं ताकि काम केवल ‘खास’ यजमानों को ही मिले।लब्बोलुआब निगम में टेंडर की पारदर्शिता अब ‘गूलर का फूल’ हो गई है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और ‘ग्रीन कॉरिडोर’ के नाम पर भ्रष्टाचार का एक्सप्रेस-वे तैयार हो जाए, तो आम जनता के विकास कार्यों पर सिंडिकेट का ग्रहण लगना तय है।

सत्ता की छतरी’में 26 साल की नौकरी

 

सरकारी तंत्र में एक पुरानी कहावत है “सैंया भये कोतवाल, तो डर काहे का।” सिंचाई विभाग में पदस्थ एक रसूखदार अधिकारी पर यह पंक्ति पूरी तरह सटीक बैठती है। 26 साल की सरकारी नौकरी में विभाग बदले, सरकारें बदलीं, मंत्री बदले, नियम बदले.. मगर साहब की कुर्सी का भूगोल नहीं बदला। तबादले की आंधियां आती रहीं, लेकिन उनकी टेबल पर रखा नेमप्लेट तक नहीं हिला।

विभागीय गलियारों और ठेकेदारों की ‘चंडाल चौकड़ी’ के बीच यह चर्चा आम है कि साहब को सूबे के रसूखदार राजनीतिक व्यक्तित्व का संरक्षण प्राप्त है। चर्चा तो यहाँ तक है कि साहब के रिश्तेदारी के तार सीधे सत्ता के शीर्ष से जुड़े हैं। यही कारण है कि राजनीति की यह ‘छाया’ उनके करियर के लिए सुरक्षा कवच बनी हुई है। सरकारी नौकरी में स्थानांतरण और पदोन्नति एक तय प्रक्रिया है, लेकिन यहाँ नियम बौने नजर आते हैं। कोरबा सिंचाई विभाग में सब-इंजीनियर के रूप में करियर शुरू करने वाले ये साहब पहले एसडीओ बने और अब ईई की रसूखदार कुर्सी संभाल रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पिछले दो दशकों में कई बार उनके तबादले और विभागीय जांच  हुए, लेकिन हर बार ‘ऊपर’ के एक फोन ने आदेश की फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। चर्चा तो यही है कि सिंचाई विभाग में साहब सिर्फ अधिकारी नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता “सिस्टम” बन चुके हैं। उनकी कुर्सी अब पद नहीं, परंपरा बन गई है। कर्मचारी बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, फाइलें बदलती हैं, लेकिन साहब वहीं के वहीं हैं, मानो विभागीय नक्शे में उनका नाम स्थायी संपत्ति के रूप में दर्ज हो चुका हो।

बोतल पर बोतल

 

नशा शराब में होता तो नाचती बोतल… बिग बी की मूवी शराबी का ये गाना अपने समय में सबसे हिट था। लेकिन, छत्तीसगढ़ में ये गाना तो उससे भी आगे निकल गया। यहां तो बोतल के ऊपर बोतल नाच रही है। सरकारी ठेकों में शराब के शौकीन लोग सुबह से शाम तक लंबी लाइन में नाच रहे हैं… मगर न बोतल में शराब बची और न नशे का सुरूर।

असल में सरकार ने कांच की जगह प्लास्टिक की बोतलों में शराब भरकर बेचने का फैसला लिया है। लेकिन, सप्लायर प्लास्टिक की बोतलें सप्लाई नहीं कर पा रहा है। सरकारी ठेकों से शराब प्रेमियों को बिना बोतल लिए लौटाया जा रहा है। सरकारी अफसरों का कहना है कि कांच की बोतलें ज्यादा टूटती थीं, इससे नुकसान होता था। जब प्लास्टिक की बोतलों में शराब बिकेगी तो यह नुकसान कम होगा।

अब इनको कोई कैसे समझाए कि शराब चाहे प्लास्टिक की बोतल में हो या कांच की, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। असल सवाल यह है कि ठेकों में अगर सप्लाई नहीं होगी तो बिकेगी कैसे?

देशी दारू की एक दुकान पर एक शराब प्रेमी ने खबरीलाल को इसकी असलियत गालिब वाले अंदाज में बयां की— “भइये, गालिब के जमाने में नकली शराब नहीं बिकती थी तब बोतल नाचती होगी… यहां तो पूरी सरकार ही बोतल पर बोतल नाच रही है, और असल खेल टेंडर में सेटिंग का है। हमको तो बस शराब से मतलब है… सरकार की परेशानी सरकार जाने…!”

 

बंगाल की जीत, छत्तीसगढ़ में असर

बंगाल की खाड़ी में उठे तूफान का असर पूरे देश में होता है। वैसे ही बंगाल में बीजेपी को मिली बड़ी जीत का असर अब संगठन में फेरबदल पर भी दिखने लगा है। खबर है कि इस तूफान से छत्तीसगढ़ भी प्रभावित होने वाला है। कुछ मंत्री संगठन में शिफ्ट हो सकते हैं, तो कुछ मंत्रियों को अगले फेरबदल में कुर्सी से बाहर होना पड़ सकता है। पार्टी स्तर पर इसकी तैयारी चल रही है। बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा राज्यों से ऐसे नाम मांगे जा रहे हैं।

नितिन नवीन अपनी कार्यकारिणी में छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं को शामिल कर सकते हैं। खबरीलाल की मानें तो कल रायपुर में होने वाली बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक में सूची तैयार हो सकती है। छत्तीसगढ़ के जिन नेताओं ने बंगाल और असम में पार्टी को जिताने में जमकर पसीना बहाया था, इस खबर से अब उन्हें खुद पसीना आने लगा है।

ऊपर से पर्ची निकलेगी तो मंत्री की कुर्सी छोड़कर संगठन में जाना ही पड़ेगा। फिलहाल पार्टी के अंदरखाने में कई नामों की चर्चा है, लेकिन बंगाल की खाड़ी में उठे इस तूफान की चपेट में कौन-कौन आने वाला है, इसके लिए इंतजार करना होगा। इंतजार लंबा न हो, इसके लिए खबरीलाल ने एक क्लू दिया है। खबर है कि इस फेरबदल में 50 साल से कम उम्र वाले नेता ही चपेट में आने वाले हैं। बाकी आप खुद अंदाजा लगा लें।

 

       ✍️अनिल द्विवेदी,ईश्वर चंद्रा

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