
कोरबा।Manikpur Coal Project मानिकपुर ओपन कास्ट परियोजना के विस्तार को लेकर प्रस्तावित 21 अगस्त की पर्यावरणीय जनसुनवाई स्थगित होते ही अब मामला गांव की चौपाल से निकलकर सियासत के अखाड़े तक पहुंच गया है। जनसुनवाई टलने पर कांग्रेस और भाजपा नेताओं में श्रेय लेने की सियासी होड़ शुरू हो गई है। कांग्रेस ने सीधे श्रम मंत्री एवं क्षेत्रीय विधायक लखनलाल देवांगन पर निशाना साधते हुए सवाल किया है कि जब प्रभावित ग्रामीण मदद की गुहार लेकर पहुंचे थे, तब उनकी आवाज क्यों नहीं सुनी गई और अब संघर्ष के परिणाम का श्रेय लेने की इतनी बेचैनी क्यों है?
कोरबा जिला कांग्रेस अध्यक्ष मुकेश कुमार राठौर ने मंत्री देवांगन के 18 अगस्त के बयान पर तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि मानिकपुर के प्रभावित आठ गांवों के ग्रामीण पूरे घटनाक्रम के प्रत्यक्ष गवाह हैं। उन्हें मालूम है कि जब वे अपनी समस्या लेकर नेताओं के दरवाजे पहुंचे तो किसने उनका साथ दिया और किससे उन्हें निराशा मिली।
पहले ग्रामीणों की गुहार, अब श्रेय की हुंकार!
राठौर के अनुसार 22 जुलाई 2026 को जनसुनवाई की अधिसूचना जारी होने के बाद प्रभावित ग्रामीण अपनी मांगों को लेकर मंत्री देवांगन के पास पहुंचे थे। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि क्षेत्रीय विधायक और मंत्री होने के नाते वे एसईसीएल प्रबंधन और प्रशासन के सामने उनकी मांगों को मजबूती से रखेंगे।
कांग्रेस का आरोप है कि ग्रामीणों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला और कथित तौर पर उन्हें यह कहकर निराश किया गया कि अब इस स्तर पर कुछ नहीं हो सकता तथा प्रबंधन जो दे रहा है, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
इसी मुद्दे पर राठौर ने मंत्री से सीधा सवाल किया, “जब ग्रामीण समाधान की उम्मीद लेकर आपके पास पहुंचे थे, तब उनकी समस्याओं को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया? यदि बाद में आपकी पहल से जनसुनवाई स्थगित हुई है तो 22 जुलाई से 17 अगस्त के बीच की गई ठोस पहल, पत्राचार और बैठकों का विवरण जनता के सामने क्यों नहीं रखा जा रहा?”
जब मंत्री से निराशा मिली, तब जयसिंह अग्रवाल ने संभाला मोर्चा
राठौर ने दावा किया कि मंत्री से निराश ग्रामीणों की आवाज पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने उठाई। उन्होंने मानिकपुर प्रभावितों की मांगों को एसईसीएल के सीएमडी सहित संबंधित अधिकारियों के सामने रखा।
कांग्रेस के मुताबिक ग्रामीणों की लगातार लामबंदी, विरोध और पत्राचार के बाद मामला प्रशासन के स्तर पर गंभीरता से पहुंचा। इसके बाद कलेक्टर ने ग्रामीणों की मांगों और परिस्थितियों को देखते हुए जनसुनवाई स्थगित करने का निर्णय लिया, जिसका प्रकाशन 17 अगस्त को हुआ।यही से कांग्रेस ने ‘किसका संघर्ष, किसका श्रेय?’ का सवाल खड़ा कर दिया है।
मंत्री लखन देवांगन पर जिलाध्यक्ष ने कसा तंज
मंत्री देवांगन पर हमला तेज करते हुए राठौर ने बरबसपुर में प्रस्तावित शराब दुकान और बालको के लघु व्यवसायियों को मिले नोटिस का भी जिक्र किया। उनका आरोप है कि इन मामलों में प्रभावित लोगों ने पहले मंत्री से संपर्क किया, लेकिन उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली। बाद में पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल के हस्तक्षेप और प्रशासनिक कार्रवाई के बाद स्थिति बदली।
राठौर ने तीनों मामलों को जोड़ते हुए तंज कसा कि “बरबसपुर हो, बालको हो या अब मानिकपुर, जब जनता अपनी परेशानी लेकर पहुंची तब सक्रियता नजर नहीं आई, लेकिन जब जनदबाव बढ़ा और प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई निर्णायक मोड़ पर पहुंची तो श्रेय लेने के दावे सामने आने लगे।”
कांग्रेस का वार: ‘शिलालेख में नाम नहीं, समाधान चाहिए’
राठौर ने कहा कि मानिकपुर के ग्रामीणों को राजनीतिक श्रेय नहीं, बल्कि अपनी मांगों का स्थायी समाधान चाहिए। उन्होंने मंत्री देवांगन से कहा कि यदि उन्हें वास्तव में ग्रामीणों की चिंता है तो श्रेय की राजनीति से बाहर निकलकर प्रभावित गांवों के बीच जाएं और उनकी लंबित मांगों के समाधान की लिखित गारंटी दिलाएं।
उन्होंने कहा, “जनहित के संघर्ष का श्रेय बयान जारी करने से नहीं, बल्कि संकट के समय जनता के साथ खड़े होने से मिलता है।”
मानिकपुर जनसुनवाई स्थगित होने के बाद अब असली लड़ाई जनसुनवाई के मैदान से निकलकर राजनीतिक श्रेय के मैदान में पहुंच गई है। कांग्रेस के इस तीखे हमले के बाद अब सबकी नजरें मंत्री लखनलाल देवांगन और भाजपा की ओर हैं कि इस आरोप पर उनका अगला पलटवार क्या होगा।















