कोरबा। korba salihabhantha kanki जनपद पंचायत करतला की दो महत्वपूर्ण ग्राम पंचायतें एक बार फिर प्रशासनिक निर्णय को लेकर चर्चा में हैं। पूर्व सांसद दिवंगत डॉ. बंशीलाल महतो के गृह ग्राम सलिहाभांठा और चर्चित ग्राम पंचायत कनकी में स्थायी पंचायत सचिव की नियुक्ति करने के बजाय दोनों पंचायतों की कमान प्रभारी सचिवों को सौंप दी गई है। सवाल यह है कि क्या वास्तव में सचिवों की कमी प्रशासन की मजबूरी है या फिर इन महत्वपूर्ण पंचायतों के लिए यही व्यवस्था सुविधाजनक समझी गई?
जिला पंचायत सीईओ प्रतीक जैन द्वारा जारी आदेश के मुताबिक जनपद पंचायत करतला के ग्राम पंचायत गांडापाली में पदस्थ सचिव ओमप्रकाश भास्कर को सलिहाभांठा का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। वहीं ग्राम पंचायत गुमिया में पदस्थ सचिव खिलेश कुमार पटेल को कनकी की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है।
डेढ़ महीने पहले कुछ और था प्रशासन का तर्क!
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है। बताया जा रहा है कि करीब डेढ़ माह पहले जनपद पंचायत करतला ने ही यह तर्क दिया था कि एक पंचायत सचिव को दो पंचायतों की जिम्मेदारी देना व्यावहारिक नहीं है। इसी आधार पर तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ दिनेश नाग के समक्ष अतिरिक्त प्रभार संबंधी आदेश में संशोधन कराया गया था। लेकिन अब प्रशासनिक व्यवस्था बदलते ही वही दोहरी जिम्मेदारी फिर लौट आई है।
यहीं से सवाल खड़ा होता है कि जब डेढ़ महीने पहले दो पंचायतों की जिम्मेदारी एक सचिव को देना उचित नहीं माना जा रहा था, तो अब वही व्यवस्था कैसे उचित हो गई?
क्या इस बीच सचिवों की कमी इतनी बढ़ गई कि पुराना प्रशासनिक तर्क ही बदल गया? या फिर इस फैसले के पीछे कोई दूसरी प्रशासनिक मजबूरी है? यदि मजबूरी है तो उसका आधार सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
दो पंचायतें, एक सचिव… कैसे चलेगा काम?
सलिहाभांठा और कनकी जैसी महत्वपूर्ण पंचायतों में विकास कार्यों के साथ ग्रामीणों को जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, पंचायत संबंधी दस्तावेज, योजनाओं की जानकारी, निर्माण कार्यों की प्रक्रिया और अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए सचिव की आवश्यकता होती है।
ऐसे में एक सचिव को दो पंचायतों की जिम्मेदारी देने से सबसे बड़ा सवाल नियमित उपस्थिति और काम की गति को लेकर है।
यदि सचिव एक दिन एक पंचायत में और दूसरे दिन दूसरी पंचायत में उपलब्ध रहेंगे, तो ग्रामीणों को अपने छोटे-बड़े कामों के लिए भटकना पड़ सकता है। वहीं दोनों पंचायतों के विकास कार्यों की निगरानी और समयबद्धता भी प्रभावित होने की आशंका है।
ग्रामीणों में नाराजगी, पूछा जा रहा सीधा सवाल
ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि यह व्यवस्था केवल कुछ दिनों के लिए है और जल्द ही स्थायी सचिव की नियुक्ति होनी है, तो इसे अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था माना जा सकता है। लेकिन यदि लंबे समय तक यही व्यवस्था जारी रही तो इसका विरोध किया जाएगा।
ग्रामीणों का तर्क है कि दो-दो पंचायतों की जिम्मेदारी एक सचिव के कंधे पर डालकर प्रशासन आखिर किस तरह बेहतर पंचायत संचालन की उम्मीद कर रहा है?
फैसले पर उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा?
पूरे मामले में सबसे अहम मुद्दा सचिवों की कमी से ज्यादा प्रशासनिक निर्णय की निरंतरता और पारदर्शिता का है।
यदि सचिवों की कमी है तो स्थायी नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है?
0यदि दो पंचायतों का अतिरिक्त प्रभार जरूरी है तो डेढ़ महीने पहले इसे अव्यावहारिक क्यों माना गया था?
और यदि तब फैसला सही था तो अब उसे पलटने की जरूरत क्यों पड़ी?
इन सवालों का जवाब जिला पंचायत और जनपद पंचायत प्रशासन से अपेक्षित है।
फिलहाल सलिहाभांठा और कनकी की जिम्मेदारी प्रभारी सचिवों को सौंप दी गई है, लेकिन इस आदेश ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि प्रशासनिक फैसले नियम और आवश्यकता के आधार पर हो रहे हैं या परिस्थितियों और सुविधा के हिसाब से?












