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What’s on the menu for the political lunch?ढाई या हाई-फाई..! लखन का साथ… वाह क्या बात,माया मिली न राम.. और साहब हो गए बदनाम..नकटी पार्ट-2


ढाई या हाई-फाई…!

 

 

Korba Political Gossip ढाई अक्षरों का संसार बड़ा अनोखा है। कभी यही ढाई अक्षर मनुष्य के जीवन को दिशा देते हैं, तो कभी यही ढाई शब्द समाज और सत्ता के समीकरण बदलने की ताकत रखते हैं। कबीर ने कहा था.. “ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।” लेकिन राजनीति के शब्दकोश में इन दिनों प्रेम के नहीं, सत्ता के ढाई अक्षरों की चर्चा अधिक है।

प्रेम, धर्म, कर्म, अर्थ, शास्त्र, शस्त्र और अस्त्र… ये केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाले सूत्र हैं। इनमें प्रेम दिल को छूता है, धर्म आस्था जगाता है, कर्म पहचान बनाता है और शास्त्र-शस्त्र समय के अनुसार अपना प्रभाव छोड़ते हैं। लेकिन इन दिनों सियासत में सबसे ज्यादा चर्चा किसी और “ढाई” की है। यहां प्रेम के ढाई आखरों की नहीं, बल्कि सत्ता के ढाई साल की गूंज सुनाई दे रही है।

बीते दिनों एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पूर्व मंत्री ने डिप्टी सीएम की मौजूदगी में भाजपा सरकार पर तंज कसते हुए कहा, “ढाई साल, जनता का हाल बेहाल।” इसके साथ ही उन्होंने सरकार के ढाई साल का राजनीतिक लेखा-जोखा भी अपने अंदाज में जनता के सामने रख दिया।

मगर डिप्टी सीएम भी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी निकले। उन्होंने पलटवार के लिए न शब्दों की तलवार उठाई और न आरोपों की आंधी चलाई। उन्होंने पहले मंच की मर्यादा का हवाला दिया और कहा ” यह राजनीतिक मंच नहीं है..”

फिर हरिवंश राय बच्चन की कविता की पंक्तियां सुनाकर ऐसा माहौल बनाया कि राजनीतिक प्रहार भी साहित्यिक संवाद में बदल गए। मंच पर तालियां भी गूंजीं और मुस्कानें भी बिखर गईं।

सियासत की यही खासियत है। यहां मुद्दों से ज्यादा मुहावरे चलते हैं और तर्कों से ज्यादा तंज। कविता भी राजनीतिक हथियार बन जाती है और शेरो-शायरी भी जवाबी हमला। कबीर ने प्रेम के ढाई आखर पढ़ाए थे, लेकिन लोकतंत्र की पाठशाला में इन दिनों “ढाई साल” का पाठ ज्यादा लोकप्रिय है।

वैसे “ढाई साल” भारतीय राजनीति के लिए कोई नया शब्द नहीं है। पूर्ववर्तीय कांग्रेस सरकार में भी ढाई साल के सत्ता-साझेदारी के फार्मूले की खूब चर्चा हुई थी। अंततः वही फार्मूला सत्ता से ज्यादा सियासी विवादों का प्रतीक बन गया और कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। इसलिए जब भी राजनीति में “ढाई” शब्द गूंजता है, पुराने अध्याय भी स्वतः खुलने लगते हैं।

अब देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले ढाई साल में राजनीति प्रेम के ढाई आखरों की ओर लौटती है या फिर आरोपों वाले ढाई साल ही चुनावी विमर्श का सबसे बड़ा मुद्दा बने रहते हैं। फिलहाल इतना तो तय है कि सियासत में ढाई का गणित, हाई-फाई भाषणों से कहीं ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।

 

लखन का साथ… वाह क्या बात!

 

 

कहते हैं, भाग्य बदलने में वक्त लगता है, लेकिन माहौल बदलने में कभी-कभी सिर्फ सही साथ ही काफी होता है त्रेता युग में भगवान राम को लक्ष्मण का साथ मिला तो चौदह साल का वनवास भी “फैमिली टूर” जैसा निकल गया। जंगल में राक्षस परेशान रहे और राम-लखन निश्चिंत।

कोरबा में भी एक “लखन” की चर्चा जोरों पर है। फर्क बस इतना है कि यहां धनुष-बाण नहीं, कानून की डोर है। जब से पुलिस कप्तान को एएसपी लखन पटले का साथ मिला है, तब से शहर के कई “एक्शन हीरो” अचानक “कैरेक्टर आर्टिस्ट” बन गए हैं।

जो लोग पहले चौक-चौराहों पर सीना तानकर घूमते थे, अब हेलमेट के अंदर चेहरा छिपाकर निकल रहे हैं। जिनकी शाम बिना हंगामे के पूरी नहीं होती थी, वे अब घर पर चाय पीकर टीवी का रिमोट संभाल रहे हैं। लगता है अपराधियों ने भी समझ लिया है कि “फिल्म का इंटरवल खत्म हो चुका है।”

शहर के कुछ पुराने बदमाश इन दिनों मौसम विभाग से ज्यादा पुलिस की गतिविधियों का अपडेट देख रहे हैं। मोबाइल में पहले रील्स खुलती थीं, अब सबसे पहले खबर यही देखी जाती है कि “आज किसकी बारी आई?”

कहा तो यह भी जा रहा कि अनकंट्रोल हो चुके अपराध पर अचानक ब्रेक लगी है। कुछ लोग इसे पुलिस की सख्ती बता रहे हैं, तो कुछ इसे अपराधियों की “स्वैच्छिक छुट्टी” मान रहे हैं। आखिर रोज-रोज थाने का चक्कर कौन लगाए?

वैसे शहर के शरीफ लोग भी थोड़ा असमंजस में हैं। रात में बाइक की तेज आवाज सुनाई देती है तो पहले लगता था कि कोई गैंग निकल रही होगी। अब पता चलता है कि कोतवाली पुलिस की पेट्रोलिंग पार्टी अड्डेबाजो पर कहर बनने निकली है। कुल मिलाकर कोरबा में इन दिनों चर्चा यही है कि “लखन का साथ… वाह क्या बात!” फर्क सिर्फ इतना है कि इस कहानी में वनवास अपराधियों का है और चैन की सांस आम जनता ले रही है।

फिलहाल शहर में पुलिस की सक्रियता को लेकर यह धारणा बन रही है कि असामाजिक गतिविधियों पर निगरानी बढ़ी है और कार्रवाई का दबाव महसूस किया जा रहा है। लोग इसे कानून-व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।

 

माया मिली न राम… और साहब हो गए बदनाम!

 

 

कबीर ने सदियों पहले लिख दिया था, “राम नाम कड़वा लगे, मीठे लागे दाम…दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम।”

सदियों पुरानी पंक्ति अब जिले के खनिज विभाग के एक “छोटके साहब” के संदर्भ में यह दोहा प्रशासनिक विडंबना का जीवंत उदाहरण बनकर चर्चा में है। बस अंतर इतना है कि कबीर की दुविधा आत्मा और परमात्मा के बीच थी, जबकि साहब की दुविधा फाइल, नियम और रेत के बीच बताई जा रही है।

कहानी जिले की एक ग्राम पंचायत के रेत भंडारण केंद्र से शुरू होती है। किस्सागो बताते हैं कि साहब की कलम इतनी फुर्तीली निकली कि 9 जून को ही पंचायत के नाम रेत भंडारण की अनुमति जारी हो गई। मजेदार बात यह बताई जा रही है कि इस भंडारण के लिए जरूरी “एयर एंड वॉटर कंसेंट” पर्यावरण विभाग ने 15 जून को जारी किया। उधर 10 जून से नदी से रेत उत्खनन पर प्रतिबंध लागू हो चुका था। अब सवाल यह उठता है कि रेत पहले आई या अनुमति पहले पहुंची? सरकारी गलियारों में यही पहेली सबसे ज्यादा पूछी जा रही है।

कहते हैं, जहां सवाल ज्यादा हों, वहां फाइलें भी बेचैन हो जाती हैं। चर्चा है कि रॉयल्टी बुक भी जारी हो गई, लेकिन जैसे ही पूरे घटनाक्रम की भनक बाहर निकली, विभागीय गलियारों में सन्नाटा उतर आया। जिन कदमों में अब तक रफ्तार थी, उनमें अचानक ब्रेक लग गए। फिर शुरू हुई फाइलों की दौड़, नोटशीट की कवायद और हालात संभालने की कोशिशें। मानो बीती तारीखों को भी कार्यालयीन आदेश से बदला जा सकता हो।

अब दफ्तरों में चाय से ज्यादा इसी किस्से की चुस्कियां ली जा रही हैं। कोई इसे साहब की “असाधारण कार्यकुशलता” बता रहा है तो कोई मुस्कुराकर कहता है कि साहब ने इस बार नियमों को भी ओवरटेक कर दिया। गलियारों में सबसे ज्यादा गूंजता जुमला यही है, “माया मिली न राम… और साहब हो गए बदनाम।

वैसे यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है। क्या अब सरकारी प्रक्रियाओं का नया गणित यही होगा कि पहले फाइल दौड़ेगी और जरूरी अनुमति बाद में उसके पीछे-पीछे पहुंचेगी? या फिर यह महज प्रशासनिक जल्दबाजी थी, जिसे समय रहते संभालने की कोशिश की गई?

फिलहाल इतना तो तय है कि रेत केवल नदियों में ही नहीं बहती। कभी-कभी उसका बहाव सरकारी फाइलों तक भी पहुंच जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि नदी का पानी कुछ दिनों में साफ हो जाता है, लेकिन फाइलों पर जमी रेत की चर्चा लंबे समय तक सरकारी गलियारों में उड़ती रहती है।

 

 नकटी पार्ट-2

 

जंतर-मंतर में छात्रों का प्रदर्शन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ भले खत्म हो गया हो मगर इसने छत्तीसगढ़ कांग्रेस की एनर्जी को रिचार्ज कर दिया। पीएम हाउस के सामने धरने पर बैठे राहुल गांधी को जब दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया तो उसके विरोध में लोकभवन के पास कांग्रेस का धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया।

उसके बाद जब बीजेपी राजीव भवन का घेराव करने निकली तो कांग्रेसी मोर्चे पर डट गए। करीब 18 घंटे पीसीसी चीफ बीजेपी नेताओं पर काउंटर एफआईआर की मांग को लेकर खम्हारडीह थाने में डटे रहे, और सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा।

अब कांग्रेस नवा रायपुर के नकटी गांव में तोड़फोड़ के मामले में सरकार को घेरने को तैयार है। इसके लिए 5 सदस्यीय कमेटी भी बनाई, जिसमें राज्यपाल को दोबारा अनुरोध पत्र भेजने और प्रभावित परिवारों को उसी जगह मकान देने की मांग शामिल है।

इसके अलावा कांग्रेस ने नकटी में तोड़फोड़ वाली जगह और आसपास की जमीनों की राजस्व ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है, ताकि इससे पता चल सके कि उस इलाके में किन प्रभावशाली लोगों की जमीन है और किनके दबाव में गरीबों के घरों को तोड़ा गया। कुल मिलाकर जंतर-मंतर के प्रदर्शन का असर राजधानी रायपुर में नकटी पार्ट-2 के रूप में दिखेगा।

 

सियासी लंच के मेनू में क्या

 

कटाक्ष के पिछले कॉलम में खबरीलाल ने बताया था कि इस 15 अगस्त को कुछ मंत्रियों को झंडा फहराने का मौका नहीं मिलने वाला है। अब खबरीलाल की खबर का असर दिखने लगा है। पिछले सप्ताह रायपुर में हुई कोर कमेटी की बैठक के बाद राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिवप्रकाश की रायपुर में पार्टी के सीनियर नेताओं से मेल-मुलाकात और लंच पार्टी में इसी बात की चर्चा रही।

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निवास में शिवप्रकाश के साथ सीएम, प्रदेश अध्यक्ष किरण देव और संगठन के दो प्रमुख नेता अजय जामवाल व पवन साय ने लंच के दौरान प्रदेश के राजनीतिक हालात और संगठन से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की।

सूत्रों की मानें तो इन बैठकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों के साथ संगठन और सरकार के कामकाज की समीक्षा हुई। इन बैठकों के बाद संगठन और सरकार में कुछ बदलाव की चर्चा फिर से जोर पकड़ रही है। हालांकि, इस सियासी लंच के मेनू में क्या-क्या परोसा गया था, इसकी खबर बाहर नहीं आ पाई है। अब देखने वाली बात यह है कि आने वाले दिनों में इस बदलाव का असर मंत्रियों पर दिखता है या संगठन पर।

 

 

  ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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