रायपुर। Chhattisgarh Patwari News कहते हैं कि सरकारी नौकरी में तनख्वाह भले तय हो, लेकिन कुछ लोगों की “तरक्की” का हिसाब शायद अर्थशास्त्र की किताबों में भी नहीं मिलता। राजधानी के सरकारी गलियारों में इन दिनों फिर वही पुरानी चर्चा चाय की चुस्कियों के साथ ताज़ा हो रही है।
चर्चा उन कांस्टेबलों और पटवारियों की है, जिनका तबादला कागज़ों में तो होता रहता है, लेकिन ज़मीन पर उनका पता वही पुराना रहता है। कोई कुछ महीनों के लिए दूसरे थाने भेजा जाता है, तो थोड़े दिन बाद फिर पुराने ठिकाने पर लौट आता है। पटवारी भी जैसे अपने हल्के से ऐसा प्रेम निभाते हैं कि आखिरकार वहीं ज़मीन नापते दिखाई देते हैं।
सरकारी गलियारों में लोग मज़ाक में कहते हैं कि कुछ लोगों की पोस्टिंग नहीं, “फिक्स डिपॉजिट” होती है। जगह बदलती नहीं और रसूख कम होता नहीं।
इसी बीच एक पुराना किस्सा फिर चर्चा में आ गया। पहले एक “करोड़पति कांस्टेबल” के ठाठ-बाट की कहानी खूब चली थी। अब उसी चर्चा में एक नया अध्याय जुड़ गया है।
महकमे एक सज्जन मुस्कुराते हुए कहा, “अरे, उस कांस्टेबल को तो आप भूल ही गए, जिसने अपनी बेटी की डेस्टिनेशन वेडिंग थाईलैंड में की थी और मेहमानों को ले जाने के लिए पूरा विमान ही चार्टर कर लिया था।”
बस फिर क्या था… सरकारी दफ्तरों से लेकर चाय की दुकानों तक वही सवाल गूंजने लगा। अगर यह सब सिर्फ सरकारी वेतन की बदौलत है, तो फिर वित्त मंत्रालय को नया वेतन आयोग नहीं, सीधे अर्थशास्त्र का नया पाठ्यक्रम जारी करना चाहिए।
फिलहाल यह किस्सा सरकारी गलियारों की चर्चाओं में ज़िंदा है और लोग मुस्कुराते हुए बस इतना ही कहते हैं… “सरकारी नौकरी में असली स्केल वेतन का नहीं, पोस्टिंग का होता है!”






