
रायपुर।CG Political News राजनीति में एक पुरानी कहावत अक्सर सुनने को मिलती है, “जब किसी का काम खराब न कर सको, तो उसका नाम खराब कर दो।” छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों नकटी गांव का मामला कुछ इसी कहावत की याद दिला रहा है।
नकटी गांव में सरकारी जमीन से वर्षों से बसे लोगों को बेदखल करने की कार्रवाई ने पहले ही कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस पूरे विवाद को लेकर एक नई राजनीतिक कथा गढ़ी जा रही है। दावा किया जा रहा है कि सांसदों, विधायकों और अन्य विशिष्ट वर्गों को भूखंड आवंटित करने की योजना पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की थी। लेकिन सवाल यह है कि यदि यह योजना वास्तव में गलत थी, तो वर्तमान सरकार ने इसे रोका क्यों नहीं? और यदि इसे लागू किया गया, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी मानी जाएगी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सरकारी निर्णय की जवाबदेही उस सरकार की होती है, जो उसे लागू करती है। ऐसे में यदि गरीबों को हटाकर प्रभावशाली वर्गों को भूखंड देने का निर्णय अमल में आया है, तो केवल पूर्ववर्ती सरकार का हवाला देकर मौजूदा सरकार अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती।
नकटी का मुद्दा अब केवल जमीन का विवाद नहीं रह गया है। यह सरकार की प्राथमिकताओं, राजनीतिक जवाबदेही और गरीब बनाम वीआईपी की बहस का प्रतीक बन चुका है। एक ओर वर्षों से बसे परिवार बेदखली का दर्द झेल रहे हैं, तो दूसरी ओर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
जनता अब आरोपों से अधिक तथ्यों का जवाब चाहती है। आखिर बेदखली किसके आदेश पर हुई? वीआईपी भूखंड आवंटन की प्रक्रिया किसने आगे बढ़ाई? और सबसे बड़ा सवाल, यदि किसी निर्णय पर आपत्ति थी, तो उसे रोका क्यों नहीं गया?
लोकतंत्र में राजनीतिक श्रेय और दोष, दोनों साथ-साथ चलते हैं। ऐसे में काम यदि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में हुआ है, तो केवल उसका राजनीतिक ठीकरा अतीत के सिर फोड़ देना शायद जनता को स्वीकार नहीं होगा।






