A car on wheels : आईपीएल सट्टा: सांप निकल गया और,कुदरत की माया: कहीं धूप, कहीं सवा दो एकड़..सरकारी मल्टीप्लेक्स’ में चल रहे चार सुपरहिट शो,कंकाल उगलते रेत के ढेर
आईपीएल सट्टा: सांप निकल गया...अब लाठी पीटिए...!
A car on wheels : ‘सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटना’ आज के हाईटेक जमाने में कहावत कम जोक्स ज्यादा है। लेकिन कोरबा पुलिस आईपीएल के इस सीजन में इसे बिल्कुल नए अंदाज में चरितार्थ कर दिया। फर्क बस इतना है कि यहाँ सांप की जगह ‘डिजिटल सटोरिए’ निकल गए और पुलिस अपनी ‘एनालॉग लाठी’ पीटती रह गई।
आईपीएल का पूरा सीजन रविवार को खत्म हो गया। सटोरिये करोड़ों रुपये का हिसाब-किताब कर हिस्सा बंटवारा करके अकाउंट बंद कर चुके तब खोजी पुलिस की नींद खुली। पुलिस ने दर्री रोड से किसी सटोरिए को पकड़ा और सट्टा किंग की तलाश में दौड़ पड़ी।
पुलिस की मजबूरी ये है कि वो खुले आम ये नहीं कर सकती कि किंग..किंग ही होता है चाहे वो सट्टा किंग ही क्यों न हो..देख ताक के चाकरी करनी पड़ती है। पुलिस की इस भाग दौड़ को देखकर सट्टा सिंडिकेट के बड़े खिलाड़ी मुस्कुरा रहे हैं।
पूरे दो महीने सट्टा किंग वातानुकूलित कमरों में बैठकर ‘आउटसोर्सिंग मॉडल’ पर धड़ल्ले से करोड़ों के दांव लगवाते रहे और पुलिस मुखबिरों के कान फूंकने में व्यस्त रही। जब सीजन आफ हो गया तो पुलिस सायरन बजाते ‘सर्च ऑपरेशन’में निकल पड़ी।
अगर सट्टा किंग तक पहुंचना ही है तो कोरबा पुलिस को भी सांप निकलने के बाद लाठी पीटने की पारंपरिक कला से थोड़ा ऊपर उठना होगा। केवल सायरन बजाने और ‘सर्च ऑपरेशन’ से काम नहीं होगा।
कुदरत की माया: कहीं धूप, कहीं ‘सवा दो एकड़’ साया!
कहते हैं भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है, लेकिन शहर के कुछ रसूखदारों और राजस्व के ‘कागजी कलाकारों’ ने तो इस कहावत को भी अपग्रेड कर दिया। इन्होंने ऐसा करिश्मा दिखाया कि जमीन बिना बारिश, खाद और मेहनत के ही कागजों पर बढ़ने लगी।
मामला बुधवारी बायपास का है। गणित कहता है 4 एकड़ 85 डिसमिल, तो 4 एकड़ 85 डिसमिल ही रहेगा। लेकिन हमारे कागजी वैज्ञानिकों ने रामानुजन, आर्यभट्ट और कैलकुलेटर तीनों को गलत साबित कर दिया। कलम चली, और देखते-देखते जमीन 6 एकड़ 85 डिसमिल..? यानी दो एकड़ बोनस। इतना तेजी तो शेयर मार्केट भी नहीं देता। यानी पूरे दो एकड़ का ‘सरकारी प्रसाद’!
आम आदमी एक डिसमिल जमीन के लिए तहसील और पटवारी के चक्कर लगाते-लगाते चप्पल घिस देता है, जबकि यहां कागजों पर ही जमीन का “विकास मॉडल” तैयार हो गया। लोग खेती में उत्पादन बढ़ाने की जुगत लगाते हैं, और साहब लोग रिकॉर्ड में ही रकबा उगाने की कला में पारंगत निकले।
इस महागाथा के नायक भी कम महान नहीं हैं। एक तरफ राजस्व विभाग के वे ‘कागजी जादूगर’, जिनकी कलम में इतनी ताकत कि नक्शा भी शर्मा जाए।।दूसरी तरफ रसूखदार जमींदार, जिनकी पहुंच इतनी मजबूत कि जमीन भी शायद इन्हें देखकर फैलने लगे। दोनों की जुगलबंदी ऐसी कि नक्शा बदला, रकबा बदला, लेकिन सिस्टम की चुप्पी नहीं बदली।
अब मामला जांच तक पहुंच चुका है। बताया जा रहा है कि कागजों में “उर्वरक” डालकर जमीन का आकार बढ़ाया गया था। यानी खेती खेत में कम और रिकॉर्ड रूम में ज्यादा हुई।
शहर में फिलहाल यही चर्चा है कि यह जमीन का विस्तार था या ईमान का अंतिम संस्कार। क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में उगी हर अतिरिक्त जमीन, किसी न किसी हकदार की हिस्सेदारी जरूर निगलती है।
कंकाल उगलते रेत के ढेर
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में महानदी किनारे बसे खरेंगा गांव के श्मशान घाट पर रेत माफिया ने कब्रें खोद डालीं। अवैध रेत खनन के लिए 6-7 फीट गहरी खुदाई की गई, जिससे 10 मानव कंकाल बाहर आ गए। यह तो केवल एक खबर है।
लेकिन, इस खबर के पीछे भी एक बड़ी खबर है। वह खबर है बेलगाम रेत माफिया की, जो सालों से सफेदपोश नेताओं, सरकारी अफसरों और स्थानीय लोगों की मिलीभगत से अवैध रेत खनन के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है।
जो भी इसके रास्ते में आया, वह रेत में दफन हो गया। बलरामपुर जिले में रेत माफिया को रोकने पहुंचे पुलिस विभाग के एक अधिकारी को तो वहीं वाहन से कुचलकर मार डाला गया। ऐसी और भी कई घटनाएं हैं, जो बेहद डराने वाले हैं।
खरेंगा गांव के श्मशान घाट में जो कुछ घटा, उसे यदि केवल एक खबर मान लिया जाए, तो फिर उस व्यवस्था को क्या कहा जाए जिस पर खनिजों के अवैध उत्खनन को रोकने की जिम्मेदारी है?
इस घटना के पीछे सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल सिस्टम को दोषी ठहराकर मामला बंद हो जाना चाहिए, या फिर इसके लिए जवाबदेही भी तय होनी चाहिए?
वैसे भी प्रदेश की सरकार अवैध रेत खनन पर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की बात करती है। सरकार का कहना है कि यदि किसी जिले में अवैध रेत खनन पकड़ा गया, तो सीधे कलेक्टर पर कार्रवाई की जाएगी। प्रदेश की लगभग सभी बड़ी नदियों को छलनी कर अवैध रूप से रेत निकाली जा रही है, मगर किसी कलेक्टर पर कार्रवाई हुई हो, ऐसा देखने में नहीं मिला।
जब तक चेहरा देखकर कार्रवाई होती रहेगी, तब तक अवैध रेत का खेल भी चलता रहेगा, जैसा कि धमतरी में हुआ। यदि सरकार वास्तव में अवैध खनन पर पूरी तरह रोक लगाना चाहती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। अन्यथा रेत के ये ढेर यूँ ही कंकाल उगलते रहेंगे।
सरकारी मल्टीप्लेक्स’ में चल रहे चार सुपरहिट शो!
देश के सिनेमा हॉल भले ही दर्शकों के लिए तरस रहे हों, लेकिन मनोरंजन का एक ऐसा मंच भी है जहाँ हर शो बिना किसी एडवांस बुकिंग के ‘हाउसफुल’ रहता है। सबसे चर्चित नाम है सरकारी ठेका। सरकारी ठेका वह विश्वविद्यालय है जहां एडमिशन बिना योग्यता के, फीस नकद जमा होती है, क्लास रोज़ लगती है और हर छात्र खुद को कुलपति समझकर घर लौटता है!
सरकारी तंत्र भले ही राजस्व के नए रिकॉर्ड गिनवाने में व्यस्त हो, पर असली रिकॉर्ड तो इस थियेटर के ‘कलाकार’ बना रहे हैं। जो बिना किसी बजट, बिना प्रचार के, बिना किसी स्टारकास्ट, बिना प्रमोशन और बिना ओटीटी रिलीज के यहाँ रोज़ चार सुपरहिट शो चलते हैं।
पहला शो: ‘शोले’ जो सुबह 9 से दोपहर 12 बजे तक रहता है। जिसमें यह शो उन समर्पित दर्शकों के लिए है जिनका एकमात्र उद्देश्य रात की बची हुई खुमारी को सम्मानपूर्वक विदाई देना होता है। पानी मिलाकर वक्त बर्बाद करना इन्हें पसंद नहीं। पहला शॉट हलक से नीचे उतरते ही ये खुद को ‘जय-वीरू’ समझने लगते हैं। इन्हें सुबह की चाय भले न मिले, पर आबकारी विभाग का यह ‘ओपनिंग शो’ मिस नहीं होना चाहिए।
दूसरा शो: ‘रोमियो’ दोपहर 12 से 3 बजे तक चलता है। यह भावुक और दिलजलों का प्रीमियम शो है।दो घूंट भीतर जाते ही इन्हें अपनी पहली मोहब्बत, आखिरी मोहब्बत और बीच में हुई सारी गलतफहमियाँ याद आने लगती है। दुकान के पीछे खड़े होकर पुराने नंबर मिलाना, “तुम खुश तो हो न?” जैसे ऐतिहासिक सवाल पूछना और कॉल कटते ही आसमान की तरफ देखकर गहरी साँस लेना इस शो की विशेषता है। आबकारी विभाग को चाहिए कि इस शो के दर्शकों के लिए कम से कम मुफ्त टिशू पेपर की व्यवस्था तो करवा ही दे।
तीसरा शो: ‘शेरा’ दोपहर 3 से शाम 6 बजे का रहता है। इस शो में कदम रखते ही साधारण लोग खुद को इलाके का बाहुबली समझने लगते हैं। हाथ में ‘पौआ’ आते ही बड़े-बड़े दावे और काल्पनिक रसूख के किस्से शुरू हो जाते हैं। जो महाशय सुबह घर से ‘भीगी बिल्ली’ बनकर निकले थे, वे यहाँ ‘शेर’ बन जाते हैं। हालांकि, इनकी दहाड़ सिर्फ ठेके की नाली पार करने में लगती है लेकिन पुलिस की जीप दिखते ही यह दहाड़ अचानक म्याऊँ में भी बदल जाती है।
चौथा शो: यूनिक का है जो शाम 6 से रात 9 बजे द प्राइम टाइम का रहता है यह सरकारी मल्टीप्लेक्स का प्राइम टाइम और महा-ब्लॉकबस्टर शो है। यहाँ लोकतंत्र अपने सबसे शुद्ध रूप में दिखाई देता है। सूट-बूट वाले बाबू, ठेले वाले काका, ठेकेदार, मजदूर, रिटायर्ड फौजी और स्वयंभू समाजसेवी सब एक ही डिस्पोजल ग्लास की विचारधारा के नीचे एकजुट हो जाते हैं। यह इस थियेटर का ‘महा-ब्लॉकबस्टर’ शो है, जहाँ सारा वर्गभेद मिट जाता है। सूट-बूट वाले बाबू से लेकर मजदूर तक, सब एक ही डिस्पोजल ग्लास पर नजर आते हैं। दो घूंट अंदर जाते ही ये वैश्विक राजनेता बन जाते हैं।
देश की राजनीति से लेकर वैश्विक मंदी को सुधारने के लिए नई-नई यूनियनें खड़ी की जाती हैं, जो रात ठीक 9:05 बजे शटर गिरते ही लड़खड़ाते कदमों के साथ सारी क्रांतियाँ लड़खड़ाते कदमों के साथ स्वतः भंग हो जाती हैं।सेंसर बोर्ड परेशान है कि फिल्मों में क्या काटें, लेकिन इस सरकारी थियेटर में न कोई रीटेक है, न कोई कट। चारों शो के समापन के बाद, देश की अर्थव्यवस्था को अपने कंधों पर उठाने वाले ये सुरा प्रेमी लड़खड़ाती आवाज में यही गुनगुनाते हुए घर लौटते हैं “मुझे पीने का शौक नहीं, पीता हूँ सरकार चलाने को…”
चक्के पर गाड़ी…
कल प्रदेश की 5 नगर पंचायतों में मतदान होना है और नतीजों के लिए 4 जून तक इंतजार। गुरुवार को जब नतीजे आएंगे, तो वे छत्तीसगढ़ की राजनीति के लिए एक नया संदेश भी लेकर आएंगे। संदेश यह कि क्या 2023 में बड़े अंतर से विधानसभा चुनाव हारने वाली कांग्रेस 2028 के चुनाव के लिए तैयार है।
सूरजपुर जिले के शिवनंदनपुर में चुनाव प्रचार के दौरान टीएस सिंहदेव और भूपेश बघेल एक ही गाड़ी में नजर आए। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज और नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत साथ साथ रहे। यानी कांग्रेस की चुनावी गाड़ी के चारों पहिए एक साथ चलने को तैयार दिखाई दे रहे हैं।
2023 में कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण नेताओं के बीच आपसी खींचतान और होड़ ही था। उस समय पार्टी की चुनावी गाड़ी के चारों पहिए अलग-अलग दिशाओं में घूम रहे थे। यही वजह रही कि 2018 के विधानसभा चुनाव में 68 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई कांग्रेस की चुनावी गाड़ी 2023 में 35 स्टेशन से आगे नहीं बढ़ पाई।
वैसे तो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है और उसके पास अभी काफी समय है। हालांकि, केवल 5 नगर पंचायतों के नतीजों के आधार पर सरकार के प्रदर्शन का आकलन करना पर्याप्त नहीं होगा।
लेकिन, कांग्रेस के बड़े नेताओं का एक मंच पर आना और साथ दिखाई देना पार्टी कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों के बीच एक सकारात्मक संदेश जरूर पहुंचाएगा, जिसका असर 2028 के विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिल सकता है।



