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Brief pause in the PCC : मलाईदार थानों से विदाई का महाभारत,रिमोट से रनिंग ट्रैक तक मेयर..ड्रीम प्रोजेक्ट, 13 टेस्ट और तबादला,महादेव और सावन


मलाईदार थानों से विदाई का महाभारत

 

 

Brief Pause in the PCC​”अपनी पगड़ी अपने हाथ” की कहावत जिले के कुछ रसूखदार थानेदारों पर हुबहू सिद्ध होने वाली है। पुलिस मुख्यालय (PHQ) की संभावित तबादला सूची ने जिले के कई थानेदारों की नींद उड़ा दी है। पिछले तीन साल से एक ही थाने में जमे ‘साहब’ अब हर सुबह मोबाइल पर मौसम का मिजाज नहीं, बल्कि ट्रांसफर लिस्ट का अपडेट देख रहे हैं। हर नई सूची के सामने आने के साथ पुलिस महकमे में एक ही सवाल गूंज रहा है “कहीं अगला नंबर मेरा तो नहीं?”

​असल में, कोयला, राख, एल्यूमिनियम और रेत के अवैध कारोबार से ‘तेल’ निकालने वाले थानेदारों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। तबादला सूची की सुगबुगाहट के बीच, ये थानेदार अपनी काबिलियत से ज्यादा मंत्रियों और नेताओं के चहेतों पर भरोसा कर रहे हैं। तीन साल तक ‘बेमिसाल’ (मलाईदार) नौकरी करने के बाद थानेदार किसी ऐसे नए जिले की जुगाड़ में लगे हैं जहां मेहनत कम मेहरबानी ज्यादा हो,

जिन कंधों पर कभी वर्दी का रौब था, अब वही कंधे सिफारिशों का बोझ उठाने को विवश दिखाई पड़ रहे हैं। सेवा से अधिक ‘संपर्क’ पर भरोसा रखने वाले इन दिनों नेताओं की चौखट पर भी उम्मीदों की गठरी लिए नजर आ रहे हैं।

महकमे के लोग चुटकी लेते हुए कह रहे हैं”भाई साहब, पैरवी का मौसम लौट आया है!” जहाँ एक तरफ कुछ थानेदार खुद को जनता का सबसे बड़ा हितैषी बताकर अपनी कुर्सी सुरक्षित करने में लगे हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो ट्रांसफर की खबरों को महज अफवाह बताकर बनावटी मुस्कान बिखेर रहे हैं।

​’खबरीलाल’ की मानें तो सबसे ज्यादा चिंता उन थानेदारों को है, जिन्होंने इन तीन सालों में इलाके से ऐसा ‘विशेष’ अपनापन बना लिया था कि चाय वाले से लेकर बड़े कारोबारी तक, सब उनके इस खास “परिवार” का हिस्सा लगने लगे थे। अब ट्रांसफर की आहट ने इस पूरे सिंडिकेट और “परिवार” की धड़कनें बढ़ा दी हैं।

​फिलहाल, पुलिस लाइन से लेकर थानों तक बस एक ही चर्चा आम है “लिस्ट का अगला पन्ना किसके नाम होगा?”थानेदारों की बेचैनी देख पुलिस के पंडित कहने लगे है सरकारी नौकरी का सबसे बड़ा सच यही है कि कुर्सी कभी किसी की स्थायी नहीं होती। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ जांबाज इसे सेवा का हिस्सा मानते हैं, और कुछ इसे ‘मलाई’ छिन जाने का दुख।सच तो यही है कि समय का चक्र किसी के लिए नहीं रुकता। जो कल तक स्वयं को अजेय समझते थे, वे भी एक दिन ट्रांसफर फाइल के सामने उतने ही साधारण हो जाते हैं, जितना कोई नया भर्ती हुआ सिपाही।

 

 

रिमोट से रनिंग ट्रैक तक मेयर

 

 

कहते हैं, राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता। यहां वफादारियां बदलती हैं, समीकरण बदलते हैं और कभी-कभी तो रिमोट का मालिक भी बदल जाता है। इन दिनों कोरबा की सियासत में ये बाते बिल्कुल सटीक बैठता दिख रहा है।

शहर की सत्ता में पहली बार ऐसा दृश्य देखने को मिला, जब मेयर ने बैसाखियां किनारे रख दीं और खुद मैदान में उतरकर दौड़ लगाई। हाल ही में आयोजित “रन फॉर ग्रीन” में महापौर की मौजूदगी सिर्फ एक दौड़ नहीं थी, बल्कि सियासी गलियारों में कई तरह के संदेश छोड़ गई। चर्चा इस बात की कम रही कि कितने कदम दौड़ीं और ज्यादा इस बात की रही कि इस बार वे अपने कदमों पर दौड़ती नजर आईं।

बता दें कि नगर निगम के गठन के बाद से महापौर बदलते रहे, लेकिन कुर्सी के साथ अक्सर एक अदृश्य “रिमोट कंट्रोल” भी चलता रहा। पहली महिला महापौर श्याम कंवर के दौर की अपनी कहानी रही। फिर लखन देवांगन आए। राजनीतिक जानकार कहते है शुरुआती दौर में निगम में दो कुर्सियां थीं, एक महापौर की और दूसरी उस शख्स की, जिसने उन्हें राजनीति का मंच दिया। समय बदला, लखन देवांगन ने अपनी अलग पहचान बनाई और आज प्रदेश की राजनीति में मजबूत मुकाम पर हैं। तीसरे महापौर ने अपने दम पर सत्ता चलाई। उन्हें विकास पुरुष की छवि मिली, लेकिन विधानसभा चुनाव में किस्मत ने साथ नहीं दिया। निगम की कमान गृहणी महिला के हाथ आई तो काम से ज्यादा”ऑपरेटिंग सिस्टम” की चर्चा होती रही, जो कथित तौर पर कहीं और से संचालित बताया जाता था। उसके बाद नए प्रयोग के तहत किशोर का राज आया।विरोधियों ने उन्हें तंज कसते हुए “बिना करंट का ट्रांसफार्मर” तक कह डाला।

अब बारी मौजूदा महापौर की है। शुरुआत में राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम थी कि नगर निगम का “ऑपरेटिंग सिस्टम” कहीं और से संचालित हो रहा है। फैसलों से लेकर फाइलों तक, हर जगह “रिमोट कंट्रोल” की चर्चाएं होती रहीं। लेकिन राजनीति में मौसम बदलते देर नहीं लगती। अब वही महापौर धीरे-धीरे अपने फैसलों की मालिक बनती नजर आ रही हैं। “रन फॉर ग्रीन” में उनकी दौड़ ने इतना तो जरूर जता दिया कि वे अब केवल मंच की शोभा बढ़ाने वाली महापौर नहीं रहना चाहतीं, बल्कि अपनी अलग राजनीतिक पहचान गढ़ने की कोशिश में हैं। कोरबा की राजनीति में शायद यह पहला अवसर है, जब किसी महिला महापौर के बारे में यह चर्चा हो रही है कि वह बैसाखियों के सहारे नहीं, बल्कि अपने कदमों के दम पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं। फिलहाल तो इतना तय है कि सियासी रिमोट की बैटरी पहले जैसी दमदार नहीं दिख रही। अब देखना यह है कि महापौर अपनी राजनीतिक चार्जिंग खुद बनाए रखती हैं या फिर कोई नया रिमोट दोबारा नेटवर्क पकड़ लेता है।

 

ड्रीम प्रोजेक्ट, 13 टेस्ट और तबादला

 

“खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे” यह कहावत इन दिनों नगर निगम के एक ‘चतुर सुजान’ अधिकारी पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है। निगम के गलियारों में चर्चा है कि साहब ने अपने पसंदीदा ठेकेदार को काम दिलाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, लेकिन जब दाल नहीं गली, तो उन्होंने नियमों का ऐसा जाल बुना कि हर कोई हैरान रह गया।

मामला टीपी नगर जोन का है, जहाँ एक भवन निर्माण कार्य को साहब ने ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ बताकर टेंडर चहेते को उपकृत करने ठेकेदारों पर निविदा से पीछे हटने का दबाव बनाया। लाख समझाइश’ के बाद भी दाल नहीं गली और ठेकेदार भी सरकारी टेंडर के पुराने खिलाड़ी निकले। उन्होंने नियमों के मुताबिक सबसे कम और वैध दर भरी और टेंडर अपने नाम कर लिया।विलक्षण प्रतिभा के धनी वाले साहब के मर्जी के खिलाफ जाकर टेंडर हासिल करना उनको नागवार गुजरा। साहब ने खीझ मिटाने और ठेकेदार को सबक सिखाने के लिए 13 अलग-अलग प्रकार के तकनीकी टेस्ट कराने का पत्र थमा दिया।

साहब की पूरी कोशिश थी कि ठेकेदार नियमों के ऐसे चक्रव्यूह में उलझे कि काम भूल जाए। मगर किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। ठेकेदार का टेस्ट पूरा होने के पहले ही विभाग ने साहब का टेस्ट ले लिया और ट्रांसफर नोटिस थमा दिया। देखते-देखते साहब को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ गया

इस पूरे घटनाक्रम ने सुशासन के दावों के बीच चल रहे टेंडर मैनेज और चहेतों को उपकृत करने वाले खेल को उजागर कर दिया है। अब साहब के जाते ही ठेकेदार और निगम के अन्य कर्मचारी चुटकी लेते हुए कह रहे हैं साहब ठेकेदार का टेस्ट लेते रह गए, और विभाग ने उनका खुद का ट्रांसफर टेस्ट ले लिया! इसे ही कहते हैं खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।

 

 

महादेव और सावन

 

 

भगवान महादेव और सावन महीने का गजब का इंटरलिंक है। दस दिन बाद 30 जुलाई से सावन शुरू हो जाएगा… महादेव प्रसन्न हो जाएंगे! मगर यह बीते हुए युगों की बात है। कलयुग की रीति उल्टी है। सावन में जैसे महादेव प्रसन्न होंगे, वैसे ही उनके कुछ भक्तों की परेशानी भी बढ़ सकती है। दरअसल, महादेव सट्टा मामले की जांच में एजेंसी के हाथ कुछ ऐसा लगा है, जो कुछ लोगों की मुश्किलें बढ़ाने वाला है।

असल में महादेव ऑनलाइन सट्टा घोटाले में सीबीआई ने हाल ही में विशेष अदालत में छह नए आरोप पत्र पेश किए हैं। इनमें एक बात सामने आई है कि डेढ़ साल की लंबी जांच के बाद भी उन अधिकारियों के नाम चार्जशीट में शामिल नहीं हैं, जिनके ठिकानों पर रेड के बाद लंबी पूछताछ हुई थी। इनमें कुछ आईपीएस अधिकारी भी शामिल हैं। जांच एजेंसी के हाथ प्रोटेक्शन मनी के लेन-देन का हिसाब-किताब भी लगा है।

खबरीलाल की मानें तो जिन अफसरों ने महादेव के नाम पर प्रोटेक्शन मनी लेकर जमकर चांदी काटी है, उनके नाम भी चार्जशीट में शामिल हो सकते हैं। बताया जा रहा है कि इन आईपीएस अधिकारियों तक विभाग के कुछ लिंकमैन प्रोटेक्शन मनी पहुंचाते थे। जांच के दौरान इन अफसरों का नाम सामने आया था, लेकिन फिलहाल वे कार्रवाई से बाहर हैं।

सीबीआई अगले महीने इन अधिकारियों से दोबारा पूछताछ के लिए तलब कर सकती है। जांच एजेंसी के हाथ लगे बहीखाते में किन अफसरों को कितनी प्रोटेक्शन मनी मिली, इसका पूरा हिसाब खंगाला जाना है। अब देखना यह होगा कि उनके नाम पर प्रोटेक्शन मनी लेने वाले भक्तों पर सावन महीने में महादेव का आशीर्वाद कितना बरसता है।

 

 

पीसीसी में अल्प विराम

 

 

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में दीपक बैज का कार्यकाल खत्म होने के बाद पीसीसी में बदलाव की अटकलों पर फिलहाल अल्प विराम लग गया है। पहले खबर आई थी कि बैज की जगह पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव का प्रदेश अध्यक्ष बनना तय हो चुका है। मगर इन अटकलों पर अब खुद सिंहदेव ने अल्प विराम लगा दिया।

इसी बीच कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम की पार्टी डिप्लोमेसी की भी खासी चर्चा रही। लेकिन खबरीलाल के सूत्रों ने जो अंदर की बात बताई, उससे यह साफ हो गया कि चाहे बैज आलाकमान के आशीर्वाद से पीसीसी चीफ बने रहें, मगर पीसीसी की कमान अभी बस्तर के पास ही रहने वाली है।

खुद सिंहदेव भी मान चुके हैं कि अभी तक दिल्ली में प्रदेश नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। लेकिन संगठनात्मक फैसलों में बहुत अधिक देरी भी नहीं होनी चाहिए। यानी पीसीसी में बदलाव की चर्चा फिलहाल अल्प विराम पर अटकी हुई है।

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल अगले साल खत्म हो रहा है। यानी अगले साल मार्च-अप्रैल तक दीपक बैज की कुर्सी बनी रह सकती है। उसके बाद, छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले पीसीसी में बदलाव की गुंजाइश बन सकती है। तब तक पीसीसी अध्यक्ष बनने की दौड़ में शामिल नेताओं को इस अल्प विराम के हटने का इंतजार करना होगा।

 

✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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