
थानेदार.. सिफारिश और चढ़ावा
Thanedar sifarish chadhawa Korba कहते हैं, बिना सिफारिश के बढ़िया थाना तो क्या, जिले में पोस्टिंग भी नहीं मिलती। और जब बात मनचाही जगह ड्यूटी की हो, तो सिद्धांत से समझौता करना ही पड़ता है। कोरबा में इसी सिद्धांत पर काम हो रहा है। यहां थानेदार धड़ाधड़ ड्यूटी करने के लिए आकाओं से सिफारिश करा रहे हैं।
अभिनेता प्राण पर फिल्म उपकार में एक गीत फिल्माया गया था..कसमे वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या…। इस गीत का एक अंतरा है.. “देते हैं भगवान को धोखा, इंसां को क्या छोड़ेंगे…। ऐसा ही हाल जिले की पुलिसिंग का हो गया है।
दरअसल, कोरबा जिले में होने वाले हनुमंत कथा में ड्यूटी करने के लिए थानेदारों में होड़ लग गई है। यह भी कहा जा रहा है कि फ्रंट लाइन ड्यूटी करने के लिए, या यूं कहें कथावाचक के दर्शन के लिए, थानेदार सिफारिश लगवा रहे हैं, जिससे कृपा बरसती रहे और कोरबा की खनिज संपदा में अपने हिस्से की रॉयल्टी वसूलते रहें।
यह भी कहा जा रहा है कि जिले के अधिकांश थाना-चौकियों में बजरंगबली के मंदिर हैं, और थानों में बैठे रामभक्त भी कमाल के हैं। जब आम लोग गुमशुदगी तलाश या एफआईआर दर्ज कराने थाने पहुंचते हैं, तो वे मारीच अवतार में आ जाते हैं। वैसे भी थानों में एफआईआर दर्ज कराने की ‘चढ़ावा रेट लिस्ट’ पहले से बनी हुई है.. यानी जैसा मामला, वैसा चढ़ावा; नहीं तो जय श्रीराम!
काला हीरा… नई सरकार, पुराना खेल!
“डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं… नामुमकिन है।”शहर के काले हीरे के कारोबार पर यह लाइन इन दिनों कुछ ज्यादा ही सटीक लग रही है।
शहर में इन दिनों एक ही फिल्म बार-बार री-रिलीज़ हो रही है, बस पोस्टर बदल जाता है। डायलॉग वही, कलाकार वही, और क्लाइमैक्स भी लगभग तय। फर्क सिर्फ इतना कि इस बार “नई सरकार” का टैगलाइन जोड़ दिया गया है। स्टीम कोयले के खेल में पुराने खिलाड़ी फिर से एक्टिव हो गए हैं। सीन बदला, बैकग्राउंड म्यूजिक बदला… लेकिन एंट्री वही पुराने किरदारों की।
कहानी सीधी है, पर स्क्रिप्ट पूरी फिल्मी..बताया जा रहा है कि बीते दौर में ‘कोल मैनेजमेंट’ का हुनर दिखा चुके एक कारोबारी ने इस बार कोयले के खेल में फिर से बाजी मार ली है। चांपा कोल डिपो से लेकर कुसमुंडा खदान तक “वन टू का फोर” का गणित बड़े सलीके से सेट किया जा चुका है, लोग हंसते हुए कह रहे हैं, “भाई ने ट्रेंड पकड़ने में पीएचडी कर रखी है… सरकार और सुशासन से इनको कोई फर्क नही पड़ता। अवैध कारोबार में महारत हासिल कर चुके खिलाड़ी सरकार बदलने के साथ पाला बदलने में भी माहिर है।लालू राम कॉलोनी से ऑपरेट होने वाला यह खेल ‘पलट पर्ची’ के पुराने लेकिन भरोसेमंद फॉर्मूले पर टिका है। कुसमुंडा से निकला स्टीम कोयला चांपा में उतरता है और कागजों में कहानी बदल जाती है। काला स्टीम, सफेद मुनाफा सब कुछ ऐसे जैसे स्क्रिप्ट पहले से लिखी हो।
याद आता है एक और डायलॉग… “बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं।”बस फर्क इतना है कि यहां ‘छोटी बात’ लाखों-करोड़ों के खेल में बदल चुकी है। लेकिन असली क्लाइमेक्स अभी बाकी है।क्योंकि जैसा कहा गया है… “पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।”फिलहाल पर्दे के पीछे बहुत कुछ चल रहा है।किरदार वही हैं, सेटिंग नई है… और काला हीरा एक बार फिर अपनी चमक दिखाने को तैयार है।
जब निकल पड़े दो यार… शुरू हो जाता है चावल का कारोबार!
चावल कारोबारों के बीच एक नई कहावत चल पड़ी है, लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं, “जब निकल पड़े दो यार… फिर शुरू हो जाता है कारोबार।” फर्क बस इतना है कि यहां दोस्ती कम और ‘डील’ ज्यादा नजर आती है।
कहानी खाद्य विभाग के कुछ जिम्मेदार चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी जोड़ी इन दिनों खास चर्चा में है। जैसे ही ये दोनों ‘दो यार’ एक फ्रेम में आते हैं, नियम-कायदों की फाइलें खुद ही स्लिम ट्रिम हो जाती हैं और जेबें हेल्दी डाइट पर चली जाती हैं। मामला सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है। शहर में गरीबों के हक का चावल खुलेआम बाजार तक पहुंच रहा है। सोसायटी संचालकों से ‘सेवा शुल्क’ की चर्चा आम है और बड़े तस्करों तक माल पहुंचाने की व्यवस्था भी मानो सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है।
शिकायत करने वाले बताते हैं कि छापे की कहानी तो और भी अद्भुत है, यहां “रेड” कम और “रेडी” ज्यादा होता है। सूचना इतनी तेजी से लीक होती है कि लगता है सिस्टम में नहीं, वाई-फाई में बैठी है। छापा पड़ने से पहले ही सब कुछ सेट जैसे परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र मिल जाए। शारदा विहार जैसे इलाकों में हालात कुछ ज्यादा ही दिलचस्प बताए जा रहे हैं। यहां की राशन दुकानों की अगर निष्पक्ष जांच हो जाए, तो कई परतें खुल सकती हैं। लेकिन जांच की फाइलें शायद रास्ता भटक जाती हैं या फिर जानबूझकर भटका दी जाती हैं। चावल का यह खेल अब छोटे स्तर से निकलकर एक संगठित नेटवर्क बन चुका है। कुछ परिवारों का इस धंधे पर मजबूत पकड़ बताया जा रहा है, और नतीजा यह कि गरीब की थाली से निकला अनाज किसी और की गाड़ी में ईंधन बन रहा है।
लोग अब खुलकर तंज कस रहे हैं। कहते हैं, “यहां नियम नहीं, रिश्ते चलते हैं… और जब ‘दो यार’ साथ हों, तो कारोबार अपने आप चल पड़ता है।”व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन सच्चाई थोड़ी कड़वी है,जब रक्षक ही नेटवर्किंग में बिज़ी हो जाएं, तो फिर भूख और भरोसा.. दोनों ही लाइन में खड़े रह जाते हैं।
ड्रोन दीदी… ड्रोन भइया
छत्तीसगढ़ के तीन जिलों में अफीम के खेत मिलने के बाद सीएम ने आंखें क्या तरेरीं, सभी जिलों में भागमभाग शुरू हो गई। पटवारी से लेकर कलेक्टर और एसपी, सभी अफीम के खेत ढूंढने में लग गए। पटवारी, एआरओ और सिपाही के लिए तो खेत-खलिहान में उतरना कोई नई बात नहीं है। सिपाही सबूत जुटाने और पटवारी व एआरओ जुगाड़ जुटाने के लिए पहले से खेतों में उतरते रहे हैं और वहां लगी फसलों से भी परिचित होते हैं।
मगर अफसरों के लिए किस खेत में क्या फसल लगी है, कौन फूल है और किसे फल माना जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा है। लेकिन, जब सीएम ने कहा है, तो चाकरी बजानी पड़ेगी, फिर चाहे इसके लिए गूगल मैप, गूगल अर्थ या ड्रोन सर्विलांस की मदद ही क्यों न लेनी पड़े… इसी को अफसरी कहते हैं।
असल में बेमेतरा जिले का वीडियो इस वक्त काफी वायरल हो रहा है, जिसमें पुलिस वाले एक खेत की जांच कर रहे हैं और खेत के ऊपर ड्रोन मंडरा रहा है। पास में कुछ किसान भी खड़े हैं। खेत में भाटा (बैंगन) और टमाटर की फसल लहरा रही है।असल में बैंगनी भाटा और लाल टमाटर को देखकर पुलिस वाले साहब को अफीम के फूल होने का शक हो गया, और पास खड़े किसान उन्हें समझा रहे हैं “माई-बाप, बैंगनी वाला भाटा है और लाल वाला टमाटर.. और पुलिस वाले साहब सिर खुजा रहे हैं!
भला वो भी क्या करें, एसपी साहब का आदेश है, कोई भी खेत छूटना नहीं चाहिए। बड़े साहब का कहना है कि यहां सैकड़ों एकड़ में फसल लगी हुई है, तो निरीक्षण कैसे होगा? इसलिए ड्रोन से अफीम खोजी जा रही है।
मगर यहां अफसरों से ज्यादा भाटा और टमाटर उगाने वाले किसान परेशान हैं। किसानों का कहना है “भाई, इससे पहले तो खेत-खार में ‘ड्रोन दीदी’ देखे थे, मगर पहली बार ‘ड्रोन भइया’ Drone Didi Drone Bhaiya Korba देख रहे हैं!
मंत्री, नेता और शनि की अढ़ैया चाल
विधानसभा निपटने के बाद मंत्री सोच रहे थे कि नवरात्रि में देवी दर्शन कर मातारानी का आशीर्वाद लें, ताकि बाकी बचे ढाई साल आराम से गुजर जाएं। मगर मंत्रीगिरी करने के लिए बाकी बचा ढाई साल उन्हें परेशान कर रहा है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में शनि की अढ़ैया चाल में पिछली कांग्रेस निपट गई और सरकार के मंत्रियों के भी ढाई साल पूरे हो गए हैं। ऐसे में मंत्रियों को भरोसा था कि मातारानी का आशीर्वाद उन्हें इससे बचा लेगा।
मगर, बीजेपी ने बिना मौका दिए सभी को काम पर लगा दिया। सत्र खत्म होने के दूसरे ही दिन वित्त मंत्री ओपी चौधरी असम निकल गए। दोनों डिप्टी सीएम और कुछ निगम-मंडल के अध्यक्ष एक-दो दिनों में असम और बंगाल के लिए रवाना होने वाले हैं। खुद सीएम विष्णुदेव साय इस वक्त केरल में हैं, जहां वे अलग-अलग जिलों में पार्टी उम्मीदवारों के नामांकन रैलियों में शामिल होंगे और बीजेपी के लिए चुनावी माहौल तैयार करेंगे। केरल में किए गए काम की रिपोर्ट लेकर वे देर शाम दिल्ली में हाजिरी देंगे।
कुल मिलाकर अप्रैल का महीना छत्तीसगढ़ सरकार के लिए फिफ्टी-फिफ्टी होने वाला है। यानी आधे मंत्री यहां रहेंगे और बाकी चुनावी राज्यों में। दिल्ली में ही यह तय होगा कि और किन-किन मंत्रियों और नेताओं को कहां भेजना है। सभी को अपना बोरिया-बिस्तर तैयार रखने को कहा गया है। जिसका काम ठीक… उसके लिए मौका और जो फेल हुआ उसके लिए शनि की अढ़ैया चाल पहले से तैयार है।



