
कोरबा। नगर निगम का गलियारा इन दिनों सरकारी दफ्तर कम और किसी मार्केटिंग कंपनी का शो-रूम ज्यादा नजर आने लगा है। अंतर बस इतना है कि यहां साबुन-तेल या मोबाइल नहीं बिक रहे, बल्कि कुर्सियों का “स्पेशल ऑफर” चल रहा है और ऑफर भी ऐसा कि बड़े-बड़े मार्केटिंग गुरु भी माथा पकड़ लें। नारा साफ है….“प्रभारी अधिकारी बनाओ, मनचाहा मुनाफा कमाओ।”
बाजार में सामान बेचने के लिए कंपनियां तरह-तरह के विज्ञापन चलाती हैं। कहीं लिखा होता है “कम गले, ज्यादा चले”, तो कहीं “एक के साथ एक फ्री”। निगम के गलियारे में भी कुछ ऐसा ही ऑफर चल पड़ा है। फर्क बस इतना है कि पहले काम की वजह से चर्चा होती थी, अब कुर्सियों की अदला-बदली से। जिसे जहां फिट कर दो, वही उस विभाग का प्रभारी बन बैठता है।
कोरबा प्रशासन वैसे भी चर्चा में रहने का पुराना शौकीन रहा है। लेकिन अब हालात कुछ अलग हैं। जिले के कई अधिकारी इन दिनों “उधारी की कुर्सियों” पर फल-फूल रहे हैं। ऊपर से आशीर्वाद मिले तो नियम-कायदे अपने आप हल्के हो जाते हैं। नतीजा यह कि व्यवस्था सुधरने के बजाय और उलझती जा रही है।
कुछ बोलबच्चन टाइप अधिकारी तो पहले भी अपनी काबिलियत का नमूना दिखा चुके हैं। मूल विभाग की जिम्मेदारी छोड़कर ट्राइबल अटैचमेंट का रास्ता पकड़ लिया, क्योंकि वहां काम कम और संभावनाएं ज्यादा दिखाई देती थीं। शुक्र मनाइए उस शख्स का जिसने समय रहते उन्हें वापस मूल विभाग की राह दिखा दी, नहीं तो डीएमएफ की कहानी शायद अभी और कई एपिसोड दिखाती।
इधर छात्रावास अधीक्षक साहब ने भी नियमों को किनारे रखकर संपत्तिकर अधिकारी की कुर्सी संभाल ली। लेकिन अब हवा का रुख थोड़ा बदलता दिख रहा है, इसलिए अटैचमेंट खत्म होने का डर उन्हें भी सता रहा है। आखिर उधार की कुर्सी कब वापस मांग ली जाए, इसका भरोसा किसे है। शहर के लोग भी सब समझ रहे हैं। गलियारों में एक ही तंज तैर रहा है “घोड़े को घास नहीं मिली और… कुछ लोग च्यवनप्राश चट कर रहे हैं।”कुल मिलाकर निगम में इन दिनों प्रशासन कम, कुर्सी प्रबंधन ज्यादा चल रहा है।



