Korba : .. जब नेताजी ने ली चुटकी और कहा अफसरो को होटल का चिकन पसंद.. विकास हार गया, चिकन जीत गया

News Power Zone
2 Min Read

कोरबा।शहर के विकास की बात जब भी होती है, अफसरशाही बड़े भारी-भरकम शब्दों में “विजन” और “प्लानिंग” गिनाने लगती है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि कई बार शहर का भविष्य ड्राइंग बोर्ड पर नहीं, बल्कि डाइनिंग टेबल पर तय हो जाता है।

ताज़ा मामला दर्री रोड का है, जहां अग्रसेन तिराहा से राताखार जोड़ा पुल तक सड़क चौड़ीकरण के लिए दो करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली थी। मकसद साफ था, जाम से राहत और शहर को गति। लेकिन यह फाइल उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ी, जितनी तेजी से एक चर्चित होटल में प्लेट आगे बढ़ती है।

आरोप यह है कि विकास की इस सड़क पर एक निजी रिसॉर्ट आड़े आ गया। अफसरों को सड़क से ज्यादा रिसॉर्ट प्यारा लगा। नतीजा यह हुआ कि शहर की जरूरतों को साइड में रख दिया गया और विकास की गाड़ी ब्रेक पर खड़ी कर दी गई।
पूर्व सरकार के एक मंत्री ने खुले मंच से यह बात कहकर सिस्टम की पोल खोल दी। उनका कहना है कि दो करोड़ रुपये स्वीकृत होने के बावजूद सड़क नहीं बनी। पैसे फाइलों में ही घूमते रहे और जनता जाम में फंसी रही। सवाल यह है कि अगर सड़क चौड़ी होती तो नुकसान किसका होता, शहर का या रिसॉर्ट का?
कटाक्ष यहीं खत्म नहीं होता। मौजूदा सरकार के दो साल पूरे हो गए, लेकिन सड़क तो दूर, सीएसआर मद से स्वीकृत राशि का टेंडर तक नहीं निकल पाया। यानी विकास अब सिर्फ घोषणाओं में ज़िंदा है, जमीन पर नहीं।
शहर के लोग अब यह पूछने लगेg हैं कि जब जिन अफसरों पर विकास की जिम्मेदारी है, वे निजी मेहमाननवाज़ी के आगे नतमस्तक हो जाएं, तो शहर का भविष्य कौन तय करेगा। अगर फाइलों से पहले प्लेटों की प्राथमिकता तय होगी, तो विकास हर बार भूखा ही रहेगा।

Share This Article