Featuredकटाक्ष

Who is the dark horse of Congress? थानेदार पर एसआई भारी,सीएसआर एक रहस्य..उजाले का ठेका और अंधेरे की शासन–कला,ढाई साल का टोटका…

🟠थानेदार पर एसआई भारी…

जिले के एक खास थाने में इन दिनों कानून नहीं, “कमान” चर्चा में है। कुर्सी पर नाम थाना प्रभारी का लिखा है, मगर रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में है। थानेदार साहब की उपस्थिति अब सरकारी फाइलों की तरह हो गई है, दर्ज तो रहती है, दिखती कम है।

सूत्रधार की माने तो थानेदार  साहब की ड्यूटी अक्सर थाने से बाहर “समायोजित” रहती है। अनुभव का वजन ऐसा कि कुर्सी हल्की पड़ गई है। पुराने खिलाड़ी मैदान में डटे हैं और सिस्टम अपनी सुविधा से ‘ऑटो मोड’ पर चल रहा है।

इस बीच साइबर ठगी के पीड़ित रोज दस्तक दे रहे हैं। अद्भुत है कि कार्रवाई की चाल बैलगाड़ी जैसी, आश्वासन की रफ्तार बुलेट ट्रेन जैसी।जनमानस के जहन में सवाल यह नहीं कि कितने केस दर्ज हुए, सवाल यह उठा रहे  कि फैसले कौन ले रहा है और जवाबदेही किसकी है..??

जब थाना प्रभारी की मौजूदगी प्रतीकात्मक हो जाए और संचालन अनौपचारिक, तो व्यवस्था पर उंगली उठना तय है। पुलिस महकमे के जानकार भी कह रहे हैं कि जहां पद से ज्यादा व्यक्ति भारी हो जाए, वहां संतुलन बिगड़ना लाजमी  है। विभागीय अधिकारियों की नजर इस बात पर है कि जिले का यह प्रयोग कब तक चलता रहेगा और क्या वाकई थाने में असली कप्तान नाम के रहेंगे और जूनियर दमदारी दिखाएंगे। जिले में चल रहे थानेदारी के प्रयोग को  देखते हुए जनमानस कहने लगे है भाई यहां तो थानेदार पर एसआई भारी है तो पुलिसिंग में धार कैसे होगी..!

Munna Bhai: गिरफ्तारी और थानेदारी,कलेक्टर साहब, दफ्तर को आग लगने से बचाना..बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले,राज्य सभा का राज…

🟠कांग्रेस का डार्क हॉर्स कौन..

छत्तीसगढ़ की राज्य सभा दो रिक्त सीटों पर इसी सप्ताह नामांकन होगा और अगले महीने चुनाव..। विधानसभा में संख्याबल के अनुपात में एक एक सीट बीजेपी और कांग्रेस को मिलना तय है। दोनों दलों में राज्य सभा के योग्य उम्मीदवार की तलाश हो रही है, बैठकों का दौर चला रहा है। कुछ मीडिया में कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार के नाम की चर्चा भी शुरु हो गई। कुछ हां कुछ न …वाले अंदाज में नेता इसका जवाब भी दे रहे हैं।
मगर, कांग्रेस के लिए परेशानी वाली बात ये है​ कि कुछ ही राज्यों में उसकी सत्ता बची है। राज्यसभा में कांग्रेस कोटे से संसद रहे अभिषेक मनु सिंघवी जैसे अनुभवी नेता भी अगले महीने रिटायर्ड हो रहे हैं। कर्नाटक गुटबाजी में फंसा है..असम बेहाल है। राजस्थान और मध्यप्रदेश बड़े राज्य तो हैं मगर वहां कई दावेदार हैं।
वैसे भी छत्तीसगढ़ कोर्ट से कांग्रेस में बाहरी उम्मीदवार को राज्यसभा भेजती रही है। इस लिहाज से छत्तीसगढ़ पार्टी आलाकमान के लिए ज्यादा सेफ होगा। वैसे भी प्रदेश का कोई बड़ा नेता राज्य सभा में अपनी मर्जी से जाने को तैयार होगा.. इसके आसार कम हैं। अगर ऐसा हुआ भी तो एक राय बनाना मुश्किल होगा। सूत्रों की माने तो इस वक्त कांग्रेस के दो सत्ता केंद्र हैं, एक सरगुजा दूसरा दुर्ग..। मगर इस बार इन दोनों जिलों के कोई युवा Congress dark horse डार्क हॉर्स बनने जा रहा है। वो कौन होगा..जल्द पता चल जाएगा।

Rahul’s class : 3 दिन 3 सवाल पुलिसिंग किंग बेहाल,सोने की दुकान के लिए चांदी का गार्डन..राख का संविधान “ऊपर से बात हो चुकी है” भ्रष्टाचार की आग…

🟠सीएसआर एक रहस्य…

जैसे दृश्यम में सच सीधे सामने नहीं आता, बल्कि परत दर परत खुलता है, वैसे ही इन दिनों बालको का सीएसआर CSR भी रहस्य-रोमांच की पटकथा बन चुका है। फर्क बस इतना है कि वहां पुलिस सुराग ढूंढ रही थी, यहां जनता हिसाब।
कंपनी की ओर से औपचारिक जवाब जरूर आते हैं, मगर ठोस सूची, स्पष्ट आंकड़े और जमीन पर दिखने वाले बड़े काम नदारद हैं। जबकि जिले में सक्रिय NTPC और SECL समय समय पर अपने कार्यों की सार्वजनिक जानकारी देते रहे हैं। सड़क बने तो फोटोशूट, अस्पताल सुधरे तो रिपोर्ट, स्कूल सजे तो प्रेस नोट। पारदर्शिता की यही आदत भरोसा जगाती है।
बालको के मामले में तस्वीर धुंधली है। अगर काम हुए हैं तो खुलकर सामने क्यों नहीं। और अगर नहीं हुए तो दो प्रतिशत का हिसाब किस खाते में दर्ज है। विडंबना यह भी है कि जिस औद्योगिक समूह के शीर्ष उद्योगपति ने दान की बड़ी घोषणाओं से राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हों, वहां स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता पर सवाल उठना और भी असहज करता है। शहर के जनमानस को कैफ़ी आज़मी की लिखी और जगजीत सिंह की आवाज में अमर पंक्ति याद आती है, “तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या बात है जिसको छुपा रहे हो…”

🟠उजाले का ठेका और अंधेरे की शासन–कला

“उजाले उनकी यादों के साथ रहने दो… न जाने किस घड़ी में ज़िंदगी की शाम हो जाए।” नगर निगम के गलियारों में इन दिनों यही भाव तैर रहा है। फर्क बस इतना है कि इस बार शाम से पहले ही रोशनी लगा दी गई और सुबह होते-होते कागज़ तलाशने पड़े।

बात शहर में लगे रोप लाइट की है। सड़कों पर लाइटें ऐसे लटक रही हैं जैसे विकास ने अचानक प्रीपेड रिचार्ज करा लिया हो। गली-चौराहे जगमगा उठे। तस्वीरें खिंचीं। वाहवाही भी आई। बस एक चीज़ थोड़ी देर से पहुँची… टेंडर। वह शायद किसी फाइल की सुरंग में TORCH लेकर रास्ता खोज रहा था।
कभी दौर था जब अंधेरे का डर दिखाकर टॉर्च बेची जाती थी। अब तरकीब बदली है। पहले उजाला कर दीजिए, फिर कागज़ों से साबित कीजिए कि अंधेरा था ही नहीं। काम पहले, प्रक्रिया बाद में। नियमों को समझा दिया गया है कि घबराने की ज़रूरत नहीं, सब समायोजित हो जाएगा। मैन्युअल निविदा निकली, गोपनीयता ने चुप्पी साधी और कागज़ी औपचारिकताएँ हांफती हुई काम के पीछे भागती रहीं।
फिर विधानसभा में सवाल गूंजा। और जैसे ही सवाल उठा, भुगतान की रोशनी ने भी नया रास्ता खोज लिया। गार्डन मद से आठ लाख की किरणें निकलीं और फूल-पौधों की फाइल में रोप लाइट का हिसाब समा गया। बागवानी विभाग शायद सोच रहा होगा कि अगली बार गुलाब की जगह एलईडी की नर्सरी ही डाल दी जाए। कम से कम हिसाब तो सीधा रहेगा।
अधिकारियों का कहना है सब कुछ नियमों के भीतर हुआ। जनता पूछ रही है, क्या अब नियम काम के बाद आते हैं। अगर प्रक्रिया सच में साथ थी तो वह शुरू से दिखाई क्यों नहीं दी। और अगर नहीं थी, तो बाद में जोड़ी गई रोशनी किसके लिए थी।
शहर सचमुच चमक रहा है। तस्वीरों में उजाला है। मगर फाइलों की परछाइयाँ लंबी हैं और सवालों की छाया उससे भी लंबी। यह उजाले का समय है। बस देखना इतना है कि अगली बार स्विच पहले दबेगा या नियम पहले जलेंगे।

🟠ढाई साल का टोटका…

आज से छत्तीसगढ़ का विधानसभा सत्र शुरु होना है। उसके ठीक पहले दिल्ली के एआईसीसी दफ्तर से बंद लिफाफ में मिला पैगाम कि बस्तर विधायक लखेश्वर बघेल को उप नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है। डोंगरगांव विधायक दलेश्वर साहू मुख्य सचेतक और मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया उप सचेतक होंगे।
ये खबर ढाई साल बाद तब आई जब नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत राजीव भवन में कांग्रेस विधायक दल की बैठक ले रहे थे। जिसके बाद पार्टी के अंदरखाने में ढाई साल बाद दिल्ली ​दरबार से मिले फरमान की जोरदार चर्चा रही। चर्चा है कि ढाई साल वाला टोटका छत्तीसगढ़ कांग्रेस के बड़े नेताओं के लिए अनलक्की रहा है।
पहले ढाई साल के सीएम वाली लड़ाई ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया और अब जिस तरीके से तीन विधायकों को कद बढ़ाया गया है, उससे सत्ता के नए समीकरण बनते दिख रहे हैं। कांग्रेस में इस बात की जोरदार चर्चा है कि दिल्ली दरबार कांग्रेस की गुटबाजी से उकता गया है और नये लीडरशिप की तलाश कर रहा है।
तीन विधायकों का कद बढ़ाने में जातिगत संतुलन का भी खास ख्याल रखा गया है। लखेश्वर बघेल आदिवासी समाज से हैं और दलेश्वर साहू समाज से वहीं दिलीप लहरिया अनुसूचित जाति समाज से। कुल मिलाकर दिल्ली से अब संतुलन की राजनीति की शुरुआत हो रही है।
कांग्रेस के अंदरखाने में चर्चा है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का चेहरा बने बड़े चेहरों को अब दूसरी जिम्मेदारी में लगाया जा सकता है, और इसका असर अगले महीने वाले राज्यसभा चुनाव में दिख सकता है।

✍️अनिल द्विवेदी , ईश्वर चंद्रा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button