खाकी की ‘हाई-फ्लाई’ उड़ान और नकाब के पीछे का ‘सच’!
Weekly Column Kataksh “दामन में दाग लगे तो अपनों को भी नहीं बख्शते हुक्मरान, ये पुलिस है हुज़ूर… जहाँ अपने भी बेगाने नज़र आते हैं!” यह महज़ कोई शेरो-शायरी नहीं, बल्कि उस ताज़ा प्रशासनिक भूचाल की बानगी है, जहाँ आठ पुलिसकर्मियों को महकमे ने रातों-रात निलंबित कर दिया। इनका गुनाह बस इतना था कि ये ट्रेन की पटरियों को दरकिनार कर सीधे बादलों में सैर करने यानी फ्लाइट से आरोपी को पकड़ने निकल पड़े।
अब जनता इस पूरी पटकथा के असली डायरेक्टर की तलाश में है, क्योंकि पर्दे के पीछे कुछ तो ऐसा है जिसे छिपाने की पुरजोर कोशिश हो रही है। इस हड़बड़ी में हुई कार्रवाई पर कानून के जानकार भी चुटकी लेते हुए कह रहे हैं “चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में, लग जाती वरना आग उनके शबाब में…”
वैसे, बिना अनुमति के ट्रेन की जगह हवाई यात्रा करना नियम-विरुद्ध ज़रूर है, पर सवाल यह उठता है कि क्या इस पूरे प्रदेश में सिर्फ कटघोरा की खाकी ने ही आसमान छुआ है? उन रसूखदार साहबों का क्या जो हर साल विदेश सैर पर निकल जाते हैं, उनका हिसाब कौन रखेगा? अंदरखाने के सूत्र तो यही इशारा कर रहे हैं कि यह निलंबन दरअसल बड़े और ताक़तवर अफ़सरों की कुर्सी बचाने के लिए आठ मोहरों की बली देने का एक सोचा-समझा शिगूफा है।
फिलहाल निलंबन का फरमान हवा में तैर रहा है, लेकिन असली तस्वीर अभी भी कोहरे में लिपटी है। यही अधूरापन इस ‘हाई-फ्लाई’ सफर को शहर की सबसे दिलचस्प चर्चा बनाए हुए है। अब देखना यह है कि जांच की यह उड़ान महज़ इन आठ जवानों पर आकर दम तोड़ती है या उस ‘ग्राउंड जीरो’ तक पहुँचती है जहाँ से इस पूरे हवाई सफर की असली स्क्रिप्ट लिखी गई थी। आख़िरकार, सवाल सिर्फ आसमान में उड़ने वालों का नहीं, बल्कि उड़ान की मंजिल और रूट तय करने वाले ‘मास्टमाइंड्स’ का भी है!
नेताओं ने चढ़ाया गाड़ी का शीशा और… हवा हुए वादे,
कोरबा की सड़कों पर इन दिनों धूल सिर्फ हवा में नहीं उड़ रही, वह व्यवस्था के दावों और राजनीतिक वादों की परतें भी उड़ा रही है।
“नेताओं ने गाड़ी का शीशा चढ़ाया और निकल गए, जनता धूल फाँकती रही और वादे पिघल गए।” यह पंक्तियां इन दिनों आम जनता के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। चर्चा लाजमी भी है। पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में जो भाजपा नेता सड़कों की दुर्दशा को लेकर महापौर की टेबल पर गिट्टी इकट्ठा करते थे और सरकार को कोसते नहीं थकते थे, आज वही नेता राज्य में ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार होने के बावजूद अपनी गाड़ियों के शीशे चढ़ाकर जनता की समस्याओं से अनजान बने हुए हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि विपक्ष में रहते हुए जो सवाल बेहद जरूरी लगते हैं, वे सत्ता में पहुंचते ही अक्सर असुविधाजनक हो जाते हैं।
औद्योगिक नगरी कोरबा के पास नगर निगम का अपना लगभग 900 करोड़ रुपये का बजट है। इसके अलावा, जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) से भी जिले को करीब 600 करोड़ रुपये की भारी-भरकम रॉयल्टी मिलती है। सच कहा जाए तो इस ऊर्जाधानी के पास जितना फंड है, अगर सही नीयत से काम हो तो सड़कों को चमकाया जा सकता है। इसके विपरीत, शहर का मुख्य मार्ग हो या अंदरूनी संपर्क सड़कें, सभी की बदहाली यहां के जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
अगर बात निगम के इंजीनियरों और तकनीकी विंग की करें, तो ऐसा लगता है कि उन्हें सड़क निर्माण के तय मानकों (रेशियो) से ज्यादा दिलचस्पी कमीशनखोरी में है। यही कारण है कि यदि कोरबा में पदस्थ तकनीकी विंग के अधिकारियों की संपत्ति की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।
हालांकि, कड़वा सच यह भी है कि जब खुद राजनेता अपनी जेबें भरने के लिए गुणवत्ता से समझौता करने की छूट दे देते हैं, तो प्रशासनिक अमला भी बहती गंगा में हाथ धोने से पीछे नहीं हटता।
इस पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक गठजोड़ के बीच पिसने के लिए सिर्फ आम जनता रह गई है। आज कोरबा की जनता के पास धूल के गुबार झेलने और इस तंज को दोहराने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है कि “नेताओं ने गाड़ी का शीशा चढ़ाया और निकल गए, जनता धूल फाँकती रही और वादे पिघल गए।”
शहर में सट्टा और खाकी की खामोशी!
“करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है… मेरी आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है!” भजन की यह पंक्तियाँ इन दिनों शहर के सटोरियों की जुबां पर पूरी तरह मुफीद बैठ रही हैं। शहर में सट्टे का काला कारोबार एक बार फिर तेजी से सिर उठा रहा है। चर्चा है कि इस अवैध खेल को किसी ‘अदृश्य महाशक्ति‘ का वरदहस्त प्राप्त है। चाय की टपरियों से लेकर चौक-चौराहों तक लोग यही पूछ रहे हैं कि आखिर वह कौन सा ‘मास्टरमाइंड’ है, जिसके इशारे पर यह पूरा नेटवर्क फल-फूल रहा है?
सट्टा केवल अंकों का खेल नहीं है। इसके पीछे बहता धन, टूटते परिवार और अपराध की ओर बढ़ते कदम समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। ऐसे में जब शहर में इस अवैध कारोबार की चर्चाएं खुलेआम होने लगें, तो सबसे बड़ा सवाल कानून-व्यवस्था की निगरानी पर ही उठता है।
फिल्म सिंघम का एक मशहूर डायलॉग “पुलिस की एंट्री भले ही लेट होती है, पर सबसे बेस्ट होती है।” मगर शहर के मौजूदा हालात इस संवाद पर भी जैसे व्यंग्य कर रहे हैं।
आम जनता को तो अपनी गली में खड़ी एक संदिग्ध बाइक भी खटकने लगती है, लेकिन खाकी की दूरबीन में न जाने कौन सी धुंध छा गई है कि उसे पूरा का पूरा सट्टा बाजार ही ओझल नजर आता है। इसे देखकर तो बस यही कहा जा सकता है “कानून के हाथ लंबे जरूर होते हैं, लेकिन कभी-कभी वो कुछ खास जेबों तक ही सिमट कर रह जाते हैं।”
सूत्रधार तो दबी जुबान में यह भी कह रहे हैं कि मामला कुछ और नहीं बल्कि, “नजर तो सब पर है साहब, बस कुछ खास जगहों पर चश्मा थोड़ा धुंधला कर लिया जाता है।” अब देखना यह है कि शहर की कप्तान और उनकी टीम इस धुंधले चश्मे को साफ करके सटोरियों पर कानूनी हंटर चलाती है, या फिर सट्टे का यह बाजार ‘अदृश्य आशीर्वाद’ के सहारे यूं ही सरपट दौड़ता रहेगा।
जुगाड़ तंत्र की एपीएआर रिपोर्ट
मंत्रालय में बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम लागू होने से सुबह 10 बजे से ही कुर्सियाँ भरी नजर आने लगी हैं। प्रशासन के मुखिया विकास शील द्वारा ऑफिस वर्किंग टाइम को लेकर सख्ती दिखाने से टेबल पर समय से फाइलें खिसकने लगी हैं। लेकिन मंत्रालय के वर्क कल्चर का असर कुछ जिलों में ही दिखाई दे रहा है। ज्यादातर जिलों में काम अभी भी पटरी पर नहीं आ पाया है।
पिछले सप्ताह खबर आई थी कि राज्य सेवा और जिलों में पदस्थ शासकीय सेवकों के वार्षिक कार्य-निष्पादन मूल्यांकन प्रतिवेदन (एपीएआर) प्रशासन तक नहीं पहुँचे हैं। इसके लिए सामान्य प्रशासन विभाग ने विभाग प्रमुखों, संभागायुक्तों और कलेक्टरों को तय समय-सीमा में रिपोर्ट भेजने के लिए पत्र लिखा है। इससे पहले भी सामान्य प्रशासन विभाग तीन बार रिपोर्ट तलब कर चुका है, मगर विभाग प्रमुखों की ओर से जानकारी नहीं आई।
असल में जिलों में जुगाड़ तंत्र, शासन तंत्र पर भारी है। मलाईदार टेबल पर सीनियर की जगह जूनियर अफसरी कर रहे हैं। जहाँ इंजीनियर होना चाहिए, वहाँ ड्राफ्ट्समैन बैठे हुए हैं। सभी विभागों में जुगाड़ू लोगों की ऐसी फौज बैठी है कि वार्षिक कार्य-निष्पादन मूल्यांकन प्रतिवेदन भेजने में विभाग प्रमुखों, संभागायुक्तों और कलेक्टरों का भी पसीना निकल जाएगा।
असल में सरकारी तंत्र में कार्य-निष्पादन मूल्यांकन का मतलब होता है खोखा-पेटी और बटुआ। इसी से उनका मूल्यांकन होता है। सामान्य प्रशासन विभाग हर साल वार्षिक कार्य-निष्पादन मूल्यांकन प्रतिवेदन भेजने की रस्म अदायगी करता है। आखिर सामान्य प्रशासन विभाग को भी अपने काम की रिपोर्टिंग मुख्य सचिव (सीएस) को करनी होती है।
अब देखने वाली बात होगी कि जिलों से एपीएआर रिपोर्ट कब तक मंत्रालय पहुँचती है या फिर समय-सीमा बढ़ाकर रस्म की अदायगी की जाएगी।
“पवन सायजी पधारो म्हारे देश“…
“पधारो म्हारे देश” राजस्थान का मांड शैली का लोकगीत “केसरिया बालम आवोनी, पधारो म्हारे देश” सावन में छत्तीसगढ़ में हिट हो रहा है। कहीं करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई सड़क पर विपक्ष धान का रोप लगा रहा तो कही लोग बैनर पोस्टर लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
मगर इस मामले में अंबिकापुर लक्की निकला। जहां पिछले सप्ताह बीजेपी के प्रदेश संगठन मंत्री पवन साय की कार सड़क पर बन गढ्ढे में ऐसी फंसी की उसे निकालने के लिए मैकेनिक बुलाने पड़े। ले देकर किसी प्रकार 2 घंटे में कार निकल पाई।
जिसके बाद संगठन मंत्री ने जिस तरह से मंत्रियों को फटकार लगाई,उसकी दिल्ली तक चर्चा है। जनता अगर परेशान हो रही है तो हमारी नेतागिरी का क्या फायदा? जिसके बाद रोड रिपेयरिंग का काम शुरु हो गया। अब बाकी जिलों से भी यही मांग उठने लगी है..पवन सायजी “पधारो म्हारे देश”……कम से कम सड़क तो बन जाएगी।












