
खाकी के कृष्ण… बाकी सब हरे कृष्ण
Sand Smuggling Police Nexus: जिले के पुलिस महकमे में इस वक्त लॉ एंड ऑर्डर से ज्यादा हनुमंत कथा और “हनुमान भक्त” थानेदार की चर्चा हो रही है। असल में 28 मार्च को जब बागेश्वर धाम के आचार्य धीरेंद्र शास्त्री की हनुमंत कथा स्थल पहुंचे ,तब वहां सुरक्षा के लिए पुलिस टीम के साथ थानेदारी के चैंपियन रहे थानेदार जी ड्यूटी पर तैनात थे।
जैसे ही महाराज की नजर उन पर पड़ी, वे मुस्कुरा पड़े“अरे कृष्ण! तुम यहां…? बस फिर क्या था, आशीर्वाद मिल गया…“हनुमान जी तुम्हारा कल्याण करेंगे।” इस वाकये में दोनों ओर से मुस्कान का आदान-प्रदान होने लगा, जिसे देखकर पुलिस वाले भी मुस्कुराए बिना नहीं रह पाए। पुरानी पहचान और आशीर्वाद थानेदारी चमकाने के लिए काफी था।
वैसे भी नेता और मंत्री बागेश्वर धाम के पक्के भक्त हैं। अब इसमें थानेदार भी शामिल हो गए हैं। अगर कभी ट्रांसफर की नौबत आई, तो बाबा का आध्यात्मिक आशीर्वाद काम आएगा। चर्चा तो यह भी है कि कई थानों में थानेदार अपने चैंबर में हनुमान जी की फोटो लगाकर भक्तिभाव से अगरबत्ती जलाने लगे हैं।
लोग भी मजे ले रहे हैं। अब थाने में कोई शरीफ आदमी तो आने से रहा। थाने में वही लोग आते हैं, जो खुद अपनी कथा के कथानक होते हैं। हालात ऐसे हैं कि पहले थानेदार साहब पूछते थे…“किस धारा में मामला दर्ज करूं?” अब शायद पूछते होंगे…“कौन-कौन कथा में शामिल हो रहे हो?” यानी केस डायरी के साथ-साथ “भक्ति डायरी” में भी एंट्री करानी होगी। क्लियर मैसेज है अरे कृष्ण… बाकी सब हरे कृष्ण।
रेत तस्करी के असली धुरंधर…
Sand Smuggling Police Nexus फिल्म धुरंधर के अजय सान्याल का एक डायलॉग बड़ा चर्चित है…“आदमी का फर्ज है लड़ना… अपने मकसद, सपनों, हक और अपनों के लिए।” अब ये डायलॉग सिनेमा हॉल से निकलकर सीधे कोरबा की रेत घाटों तक पहुंच गया है और वहां कुछ लोग इसे जीवन का सिद्धांत बता रहे है। ये बात अलग है कि उनका उसूल सिर्फ चोरी के रेत से इमारत खड़ा करना है। जहां एक तरफ लोग UPSC की किताबों में सिर खपाते हैं, वहीं सीतामणी घाट के विद्वान सीधे “नदी विज्ञान” में पीएचडी कर रहे हैं।
कहानी सीतामणी रेत घाट के डॉन कहे जाने वाले सरताज की है जो कभी एक ट्रैक्टर से रेत चोरी कर रोजी-रोटी का जुगाड़ करता था … आज रेत चोरी की दुनिया का धुरंधर बनकर फॉर्चूनर का सफर तय करते हुए इठलाते घूम रहा है। उनके तस्करी को देख जनमानस कहने लगी है मेहनत रंग लाए या न लाए लेकिन चोरी की रेत जरूर रंग लाती है , तभी तो इस रेत से तेल निकालने के खेल में मेयर से लेकर मंत्री के मित्र मंडल तक का पसंदीदा कारोबार बना है।
इसीलिए अब ये बात करती बोर है – “मेहनत करोगे तो फल मिलेगा”
अब तो गली गली में शोर है “मेहनत छोड़ो, ट्रैक्टर जोड़ो, फल अपने आप फॉर्च्यूनर में बदल जाएगा ”
खबरीलाल की माने तो सरकार बदलने के बाद भी रेत से तेल निकालने सरताज गिरोह का खेल जारी है। सीतामणी घाट से दिनभर उड़ती रेत की धूल, माइनिंग विभाग और पुलिस दोनों की इमेज को धूल चटा रही है। ट्रैक्टर ऐसे दौड़ते हैं जैसे रोड नहीं, रनवे हो। दिन भर फर्राटे भरते ट्रैक्टर और सिंडिकेट गिरोह की दबंगई से ऐसा लगता है सरकार भले ही भाजपा की है लेकिन, राज अभी भी रेत सिंडीकेट सरताज का ही है। कहा तो यह भी जा रहा कि रेत कारोबार से जुड़े कारोबारियों को न्यू फार्चूनर में बैठकर सरताज अजय देवगन के डायलॉग को दोहराते हुए कहने लगा है ” धंधे के लिए मुझे जमीन की जरूरत नहीं है, हसदेव नदी है न मेरे पास..!
एक टिकट में दो पिक्चर…
नगर निगम का ये “एक टिकट में दो पिक्चर” अब साधारण शो नहीं रहा, ये तो पूरी तरह पॉलिटिकल थ्रिलर बन चुका है, जिसमें स्क्रिप्ट भी अंदर की, डायरेक्शन भी अंदर का… और क्लाइमैक्स?
हालत ये है कि इंटरवल का इंतजार किए बिना ही कहीं तालियां बज रही हैं तो कहीं कुर्सियां खिसकने की आवाज आ रही है। निगम के कामकाज की समीक्षा करते हुए जनमानस भी कहने लगे है, ये तो सच में “एक टिकट में दो पिक्चर” वाली सरकार है।
असल में मेयर मैडम के निज सचिव की एंट्री अभिनेता गोविंदा के डबल रोल जैसे हुई है… पहले रोल में मेयर के साथ कदम से कदम, और अगले ही फ्रेम में निगम की संपत्ति के इर्द-गिर्द की भूमिका का निर्वहन कर रहे है। यानी एक ही टिकट में “सत्ता” और “संपत्ति” का डबल रोल। अब दर्शक कन्फ्यूज हैं कि सीटी किस सीन पर बजाएं और पॉपकॉर्न किस मोड़ पर खत्म करें।निगम के गलियारों में इस “मल्टीप्लेक्स मॉडल” की खूब चर्चा है। एक कलाकार, दो किरदार… और दोनों में दबदबा बरकरार..!
दीवारों पर “जीरो टॉलरेंस” के पोस्टर ऐसे चमक रहे हैं जैसे किसी फ्लॉप फिल्म के बड़े-बड़े कटआउट दूर से दमदार, पास जाओ तो कहानी गायब। नियम-कायदे अब सिर्फ बैकग्राउंड स्कोर हैं..चलते रहते हैं, सुनाई देते हैं, पर कहानी में कोई बदलाव नहीं आता। असली सस्पेंस यही है कि ये फिल्म आखिर कितने दिन चलेगी। क्योंकि दर्शक अब सिर्फ तमाशा नहीं देख रहे… कहानी समझने लगे हैं। और जब दर्शक समझदार हो जाएं, तो क्लाइमैक्स खुद ही रास्ता बना लेता है।
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”फसल चक्र परिवर्तन”
पहले-पहले जब छत्तीसगढ़ बना, तो कुछ योजनाएँ जबरदस्त चर्चा में थीं..”अमीर धरती के गरीब लोग” और “फसल चक्र परिवर्तन”। तब जोगी सरकार थी। उनकी सरकार गई तो योजना भी ठंडे बस्ते में चली गईं। फिर 15 साल तक बीजेपी की रमन सरकार रही। तब एक और योजना ज़ोर-शोर से शुरू हुई…”तेल नहीं, अब खाड़ी से पैदा होगी बाड़ी से”। इसमें छत्तीसगढ़ में रतनजोत की खेती से बायोडीज़ल उत्पादन होना था। 15 साल में सरकार ने सैकड़ों करोड़ खर्च कर दिए, मगर जब सरकार चली गई, तब बाड़ी तो बची नहीं, उल्टे योजना का ही “तेल निकल गया”।
ये बात इसलिए याद दिलाना ज़रूरी है क्योंकि मामला फिर फसल चक्र परिवर्तन का है। अब 5 साल आगे बढ़ते हैं भूपेश सरकार की ओर। तब शुरू हुई ..”राजीव गांधी किसान न्याय योजना। अब इसमें किसानों को कितना न्याय मिला, पता नहीं, लेकिन जनता ने सरकार को चलता कर “न्याय” कर दिया।
अभी विष्णुदेव सरकार है। जिसमें कुछ लोग किसानों की जमीन किराये पर लेकर अफीम उगा रहे हैं। तीन जिलों में अफीम के लहलहाते खेत मिले हैं। अब तो कोंडागांव में गांजा के खेत भी मिलने लगे हैं। पूरा सरकारी तंत्र खेतों में उतरकर अफीम और गांजा के पौधे ढूंढ रहा है। अफसर परेशान हैं और नेता.. नेतागिरी चमका रहे हैं।
कांग्रेस पूछ रही है कि देश में छत्तीसगढ़ की बदनामी हो रही है, इसके जिम्मेदार कौन हैं? बीजेपी वाले कह रहे हैं कि…”कांग्रेस के कुशासन में छत्तीसगढ़ को नशे का गढ़ बनाया गया”। मगर खेतों का सर्वे करने वाले और हर साल गिरदावली तैयार करने वाले विभाग से कोई ये सवाल क्यों नहीं पूछता कि उन्होंने क्या किया? कायदे से अगर इसकी जांच हो जाए, तो “फसल चक्र परिवर्तन” के कई और मामले खेतों में दबे मिल जाएंगे।
उड़न खटोला बार बार डोला!
छत्तीसगढ़ के लिए दो अच्छी खबरें आई हैं..एक बिलासपुर से, दूसरी अंबिकापुर से। बिलासपुर के बिलासा देवी एयरपोर्ट से पहली बार नाइट फ्लाइट शुरू हुई है। माना एयरपोर्ट के बाद बिलासा देवी एयरपोर्ट प्रदेश का दूसरा ऐसा एयरपोर्ट होगा, जहां नाइट फ्लाइट की सुविधा होगी। मुख्यमंत्री खुद पहली नाइट फ्लाइट से रायपुर लैंड करेंगे।
दूसरी खबर अंबिकापुर से आई है, जहां आज मां महामाया एयरपोर्ट, दरिमा से एलायंस एयर की दिल्ली एवं कोलकाता के लिए नियमित विमान सेवा शुरू होगी। मुख्यमंत्री रायपुर से वर्चुअली इस विमान सेवा का शुभारंभ करेंगे। बात करें जगदलपुर की, तो यहां से हैदराबाद की फ्लाइट शुरू तो हुई, मगर वह नियमित नहीं हो पाई।
सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद इन तीनों शहरों से उड़ने वाला “उड़न खटोला” बार-बार डोलता रहा..कभी यात्रियों की कमी, कभी फ्लाइट का किराया, कभी डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन का क्लीयरेंस, तो कभी एविएशन कंपनियों की अपनी परेशानियां।
कुल मिलाकर प्रदेश के तीन बड़े शहर..अंबिकापुर, बिलासपुर और जगदलपुर का हवाई कनेक्टिविटी से जुड़ना छत्तीसगढ़ के विकास के लिए बूस्टर डोज है। मगर सवाल ये नहीं है कि ये तीनों शहर हवाई कनेक्टिविटी से जुड़ गए, सवाल ये है कि ये सुविधा कब तक नियमित रहेगी।
इससे पहले जो एविएशन कंपनियां यहां घरेलू उड़ानें संचालित करने आई थीं, उन्होंने बड़े-बड़े सब्ज़बाग दिखाए। सरकार को चाहिए कि वह ऐसी कंपनियों को मौका दे, जो नियमित उड़ान संचालित करें, न कि उन्हें जिनका “उड़न खटोला” बार-बार डोलता रहे।




