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तीन महीने, तीन गोलियां… कोरबा में हथियारों की आसान पहुंच ने बढ़ाई चिंता

कोरबा। Korba Firing Case बीते तीन महीनों में जिले के अलग-अलग हिस्सों में हुई तीन फायरिंग की घटनाएं किसी एक मोहल्ले या एक कारण तक सीमित नहीं रहीं। एकतरफा प्रेम, अंतरजातीय विवाह और इंटरनेट मीडिया से बनी पहचान… वजहें अलग थीं, लेकिन अंजाम एक जैसा रहा। हाथ में पिस्टल, जुबान पर धमकी और कानून का भय लगभग न के बराबर।

 

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन घटनाओं में शामिल लोग पेशेवर अपराधी नहीं थे। वे छोटे-मोटे मामलों में पहले संलिप्त रहे हों, लेकिन संगठित गिरोह का हिस्सा नहीं माने जाते। इसके बावजूद उनके पास अवैध हथियार पहुंच गए। यही वह बिंदु है जो पूरे मामले को गंभीर बनाता है। अगर हथियार तक पहुंच आसान है और सजा का डर सीमित समझा जा रहा है, तो यह समाज के लिए खतरनाक संकेत है।

प्रेम के नाम पर गोली

Korba Firing Case 18 फरवरी की रात बालको थाना क्षेत्र के संगम नगर में एकतरफा प्रेम ने हिंसक रूप ले लिया। नाबालिग पर शादी का दबाव बनाने पहुंचे 22 वर्षीय युवक ने विरोध करने पर पिता पर फायर कर दिया। गोली शटर में धंसी, जान बच गई। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर हथियार जब्त किया। लेकिन बड़ा सवाल वहीं है, पिस्टल उसे मिली कैसे?

अंतरजातीय विवाह पर हमला

25 दिसंबर 2025 की रात कटघोरा क्षेत्र में अंतरजातीय विवाह से नाराज लोगों ने एक परिवार के घर के बाहर फायरिंग की। चार आरोपित गिरफ्तार हुए। गिरफ्तारी हुई, लेकिन हथियार की सप्लाई किस चैनल से हुई, यह स्पष्ट नहीं हो सका। निजी असहमति का हिंसा में बदलना और संवैधानिक अधिकारों पर हमला, दोनों चिंताजनक हैं।

इंटरनेट दोस्ती और 17 कारतूस

जनवरी के पहले सप्ताह में पथरीपारा इलाके में इंटरनेट मीडिया से दोस्ती के बाद मिलने पहुंचे युवक ने युवती को बंदूक दिखाकर धमकाया। पुलिस ने उसे 17 जिंदा कारतूस के साथ गिरफ्तार किया। कार्रवाई त्वरित रही, पर सवाल वही है, इतनी मात्रा में कारतूस आए कहां से?

कार्रवाई एक जैसी, जवाब अधूरा

तीनों मामलों में पुलिस की प्रक्रिया लगभग समान रही। आरोपित गिरफ्तार, हथियार जब्त, फिर जांच की गति धीमी। सप्लाई नेटवर्क, स्रोत और रास्तों पर ठोस कार्रवाई सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आई। यही अधूरापन अपराधियों का मनोबल बढ़ाता है और आम लोगों के भीतर असुरक्षा की भावना गहरी करता है।
अब जरूरत केवल घटनाओं की सूची बनाने की नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन की है। अवैध हथियार कोरबा तक कैसे पहुंच रहे हैं? युवाओं में हिंसा को स्वीकार्यता क्यों मिल रही है? क्या जांच केवल आरोपी तक सीमित रहेगी या सप्लाई चेन तक पहुंचेगी?
समाज, प्रशासन और कानून को मिलकर यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि असहमति का जवाब गोली नहीं, संवाद और न्याय है। यही समय की मांग है और यही सबसे बड़ी चेतावनी भी।

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