
Korba Nagar Nigam Tridev controversy : वर्ष 1989 की फिल्म त्रिदेव में तीन चेहरे थे, एक्शन, ईमानदारी और न्याय के प्रतीक। लेकिन शहर के इस नए “रीमेक” में तीन चेहरे जरूर हैं, पर रोल कुछ अपडेटेड हैं। एक प्लान बनाता है, दूसरा उसे “मैनेज” करता है और तीसरा क्लाइमैक्स आने से पहले ही एंड क्रेडिट लिख देता है।

Korba Nagar Nigam Tridev कहा जा रहा है कि शहर के विकास की नई गाथा पंचवटी मे रची जा रही है। फाइलें बन रही हैं, योजनाएँ पक रही हैं और फैसलों का तड़का भी लग रहा है। मगर जो लोग किचन के भीतर झांककर आए हैं, उनका कहना है कि ये खिचड़ी कुछ ज्यादा ही गाढ़ी है। मसाले इतने हैं कि असली स्वाद, यानी जनता का हित, कहीं नीचे दब गया है। इस ‘किचन ड्रामा’ के मास्टरशेफ बताए जाते हैं एक बिलासपुरिहा अफसर, जिनका पंचवटी में स्थायी डेरा है। उनके साथ दो और स्थायी सदस्य हैं, जो हर बैठक को मीटिंग कम और कुकिंग सेशन ज्यादा बना देते हैं। एजेंडा कागज पर शहर विकास का होता है, लेकिन प्लेट में जो परोसा जाता है, उसका स्वाद कुछ और ही कहानी कहता है। पंचवटी की पहचान भी धीरे-धीरे बदल रही है। पहले यह रेस्ट हाउस था, अब ‘स्ट्रैटेजी किचन’ बन चुका है। यहाँ फाइलों से ज्यादा ढक्कन खुलते हैं, और हर बार उम्मीद की जाती है कि इस बार कुछ नया और अच्छा निकलेगा। लेकिन नतीजा वही पुराना अधपका विकास और जरूरत से ज्यादा पकी सेटिंग। शहर के लोग भी अब इस खिचड़ी की खुशबू पहचानने लगे हैं। उन्हें पता है कि अंदर क्या पक रहा है, कैसे पक रहा है और किसके लिए पक रहा है। फर्क बस इतना है कि उन्हें इसका स्वाद कभी नहीं मिलता, सिर्फ उसका असर झेलना पड़ता है। व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन सवाल अब भी सीधा है अगर पंचवटी में ही शहर का किचन शिफ्ट हो गया है, तो असली नगर निगम आखिर किसके भरोसे चल रहा है? और जो ‘त्रिदेव’ स्क्रिप्ट लिख रहे हैं, वो क्लाइमैक्स शहर के लिए होगा या सिर्फ अपने लिए?



